भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 469

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४६५


| देवयानं पितृयाणं वा पन्थानं प्रतिपत्स्यत इत्येतत्प्रयोजनमुररीकृत्य महत्त्वप्रेप्सोरिदं कर्म न विषयोपभोगकामस्य। तस्यायं कालादिविधिरुच्यते—<br><br>अमावास्यायां दीक्षित्वा दीक्षित इव भूमिशयनादिनियमं कृत्वा तपोरूपं सत्यवचनं ब्रह्मचर्यमित्यादिधर्मवान्भूत्वेत्यर्थः। न पुनर्दैक्षमेव कर्मजातं सर्वमुपादत्ते, अतद्विकारत्वान्मन्थाख्यस्य कर्मणः। “उपसद्व्रती” (बृ० उ० ६।३।१) इति श्रुत्यन्तरात्पयोमात्रभक्षणं च शुद्धिकारणं तप उपादत्ते। पौर्णमास्यां रात्रौ कर्मारभते। सर्वौषधस्य ग्राम्यारण्यानामोषधीनां यावच्छक्त्यल्पमल्पमुपादाय तद्वितुषीकृत्याममेव पिष्टं दधिमधुनोरौदुम्बरे कंसाकारे चम- | देवयान अथवा पितृयाण मार्ग प्राप्त होना सम्भव है—इस उद्देश्यको लक्ष्यमें रखकर ही महत्त्वप्राप्तिकी इच्छावालेके लिये—विषयोपभोगकी कामनावालेके लिये नहीं—यह कर्म आरम्भ किया जाता है। उसकी यह कालादि विधि कही जाती है—<br><br>अमावास्याके दिन दीक्षित हो—दीक्षित पुरुषके समान भूमिशयन आदि नियम कर अर्थात् तपःस्वरूप-सत्यवचन, ब्रह्मचर्य इत्यादि धर्मवाला होकर पूर्णिमाकी रात्रिको इस कर्मका आरम्भ करता है। [इस कर्ममें दीक्षित होनेवाला पुरुष] दीक्षा-सम्बन्धी [मौञ्जीबन्धनादि] समस्त कर्मोंका ग्रहण नहीं करता, क्योंकि यह मन्थाख्य कर्म किसी अन्य कर्मका विकार नहीं है। “उपसद्व्रती भूत्वा” ऐसी अन्य श्रुति होनेके कारण वह शुद्धिका कारणभूत पयोभक्षणमात्र तप स्वीकार करता है। सर्वौषध अर्थात् यथाशक्ति ग्राम्य और वन्य समस्त ओषधियोंका थोड़ा-थोड़ा भाग लेकर उन्हें तुषरहित कर उसकी कच्ची पिट्ठीको एक अन्य श्रुतिके अनुसार दही और मधुके सहित कंसाकार अथवा चमसाकार |