छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
११८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १
| ११८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि । स्थावरजङ्गमान्याकाशादेव समुत्पद्यन्ते तेजोऽबन्नादिक्रमेण सामर्थ्यात् । आकाशं प्रत्यस्तं यान्ति प्रलयकाले तेनैव विपरीतक्रमेण । हि यस्मादाकाश एवैभ्यः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ज्यायान्महत्तरोज्ञतः स सर्वेषां भूतानां परमयनं परायणं प्रतिष्ठा त्रिष्वपि कालेष्वित्यर्थः।१। | “आत्मन आकाशः सम्भूतस्तत्तेजोऽसृजत” इत्यादि श्रुतियोंके बलसे ये सम्पूर्ण चराचर भूत तेज, जल और अन्न इस क्रमसे आकाशसे ही उत्पन्न होते हैं; और प्रलयकालमें उसी विपरीतक्रमसे आकाशमें ही लीन हो जाते हैं, क्योंकि आकाश ही इन समस्त भूतोंसे बड़ा है। अतः वही समस्त भूतोंका परायण—परम आश्रय अर्थात् तीनों कालोंमें उनकी प्रतिष्ठा है ॥ १ ॥ |
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आकाशसंज्ञक उद्गीथकी उत्कृष्टता और उसकी उपासनाका फल
स एष परोवरीयानुद्गीथः स एषोऽनन्तः परोवरीयो हास्य भवति परोवरीयसो ह लोकाञ्जयति य एतदेवं विद्वान्परोवरीयांसमुद्गीथमुपास्ते ॥ २ ॥
वह यह उद्गीथ परम उत्कृष्ट है, यह अनन्त है । जो इसे इस प्रकार जाननेवाला विद्वान् इस परमोत्कृष्ट ( परमात्मभूत ) उद्गीथकी उपासना करता है उसका जीवन परमोत्कृष्ट हो जाता है और वह उत्तरोत्तर उत्कृष्ट लोकोंको अपने अधीन कर लेता है ॥ २ ॥
| यस्मात्परं परं वरीयो वरीयसोऽप्येष वरः परश्च वरीयांश्च परोवरीयानुद्गीथः परमात्मा संपन्न इत्यर्थः । अत एव स एषोऽनन्तोऽविद्यमानान्तः । | क्योंकि उत्तरोत्तर उत्कृष्ट—श्रेष्ठसे भी श्रेष्ठ अर्थात् पर और उत्कृष्टरूप यह उद्गीथ ही परमात्मभावसे सम्पन्न होता है, इसलिये वह यह उद्गीथ अनन्त—जिसका कोई अन्त नहीं है, ऐसा है । |
खण्ड ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ११५
| तमेतं परोवरीयांसं परमात्मभूतमनन्तमेवं विद्वान्परोवरीयांसमुद्गीथमुपास्ते; तस्यैतत्फलमाह—परोवरीयः परं परं वरीयो विशिष्टतरं जीवनं हास्य विदुषो भवति दृष्टं फलमदृष्टं च परोवरीयस उत्तरोत्तरविशिष्टतरानेव ब्रह्माकाशान्ताँल्लोकाञ्जयति य एतदेवं विद्वानुद्गीथमुपास्ते ॥ २ ॥ | उस इस परम उत्कृष्ट परमात्मभूत अनन्त उद्गीथको इस प्रकार जाननेवाला जो विद्वान् इस परमोत्कृष्ट उद्गीथकी उपासना करता है, उसके लिये श्रुति यह फल बतलाती है—जो इसे इस प्रकार जाननेवाला विद्वान् उद्गीथकी उपासना करता है उस विद्वान्को यह दृष्ट फल होता है कि उस विद्वान्का जीवन उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर हो जाता है तथा अदृष्ट फल यह होता है कि वह उत्तरोत्तर ब्रह्माकाशपर्यन्त विशिष्ट लोकोंको जीत लेता है ॥२॥ |
<div align="center">—: ० :—</div>तꣳहैतमतिधन्वा शौनक उदरशाण्डिल्यायोक्त्वोवाच यावत्त एनं प्रजायामुद्गीथं वेदिष्यन्ते परोवरीयो हैभ्यस्तावदस्मिँल्लोके जीवनं भविष्यति ॥ ३ ॥
शुनकके पुत्र अतिधन्वाने उस इस उद्गीथका उदरशाण्डिल्यके प्रति निरूपण कर उससे कहा—जबतक मेरी संततिमेंसे [ मेरे वंशज ] इस उद्गीथको जानेंगे तबतक इस लोकमें उनका जीवन उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर होता जायगा ॥ ३ ॥
| किं च तमेतमुद्गीथं विद्वानतिधन्वा नामतः शुनकस्यापत्यं शौनक उदरशाण्डिल्याय शि- | तथा इस उद्गीथको जाननेवाले अतिधन्वा नामक शौनकने—शुनकके पुत्रने अपने शिष्य उदरशाण्डिल्यके प्रति इस उद्गीथविद्याका |
१२० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १
१२० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १
| प्यायैतमुद्गीथदर्शनमुक्त्वोवाच । यावत्ते तव प्रजायां प्रजासंततावित्यर्थः। एनमुद्गीथं त्वत्संततिजा वेदिष्यन्ते ज्ञास्यन्ति तावन्तं कालं परोवरीयो हैभ्यः प्रसिद्धेभ्यो लौकिकजीवनेभ्य उत्तरोत्तरविशिष्टतरं जीवनं तेभ्यो भविष्यति ॥ ३ ॥ | वर्णन करके कहा—'जबतक तेरी प्रजामें अर्थात् तेरी संततिमें तेरे गोत्रज इस उद्गीथको जानेंगे तबतक—उतने समयतक उन्हें इन प्रसिद्ध लौकिक जीवनोंकी अपेक्षा उत्तरोत्तर विशिष्टतर जीवन प्राप्त होगा' ॥ ३ ॥ |
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तथामुष्मिँल्लोके लोक इति । स य एतदेवं विद्वानुपास्ते परोवरीय एव हास्यास्मिँल्लोके जीवनं भवति तथामुष्मिँल्लोके लोक इति लोके लोक इति ॥ ४ ॥
तथा परलोकमें भी उसे [उत्कृष्टसे उत्कृष्ट] लोककी प्राप्ति होती है। जो इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष इसकी उपासना करता है, उसका जीवन निश्चय ही इस लोकमें उत्कृष्टतर होता है तथा परलोकमें भी उसे [उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर] लोक प्राप्त होता है—परलोकमें उसे [उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर] लोक प्राप्त होता है ॥ ४ ॥
| तथादृष्टेऽपि परलोकेऽमुष्मिन्परोवरीयाँल्लोको भविष्यतीत्युक्तवाञ्शाण्डिल्यायातिधन्वा शौनकः। स्यादेतत्फलं पूर्वेषां महा- | 'तथा अदृष्ट परलोकमें भी उसे उत्तरोत्तर उत्कृष्ट लोककी ही प्राप्ति होगी'—ऐसा शौनकपुत्र अतिधन्वा-ने शाण्डिल्यके प्रति कहा। 'यह फल पूर्वकालिक परम भाग्यशाली |
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खण्ड ३] शाङ्करभाष्यार्थ १२१
| भाग्यानां नैदंयुगीनानामित्या- | पुरुषोंको प्राप्त होता होगा, वर्तमान युगके पुरुषोंको नहीं हो सकता' |
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| शङ्कानिवृत्तय आह—स यः | ऐसी आशङ्काकी निवृत्तिके लिये श्रुति कहती है—'इस समय भी इसे |
| कश्चिदेतदेवं विद्वानुद्गीथमेतर्ह्युपा- | इस प्रकार जाननेवाला जो कोई पुरुष उद्गीथकी उपासना करता है |
| स्ते तस्याप्येवमेव परोवरीय एव | उसका भी इस लोकमें उसी प्रकार उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर ही जीवन |
| हास्यास्मिंल्लोके जीवनं भवति | होता है तथा परलोकमें भी उसे उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर लोककी ही |
| तथामुष्मिंल्लोके लोक इति लोके | प्राप्ति होती है ॥ ४ ॥ |
| लोक इति ॥ ४ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमाध्याये नवमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ९ ॥
दशम खण्ड
उषस्तिका आख्यान
| उद्गीथोपासनप्रसङ्गेन प्रस्तावप्रतिहारविषयमप्युपासनं वक्तव्यमितीदमारभ्यते। आख्यायिका तु सुखावबोधार्था। | उद्गीथोपासनाके प्रसङ्गसे यहाँ प्रस्ताव एवं प्रतिहारविषयक उपासना भी बतलायी जानी चाहिये, इसीलिये आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है। यहाँ जो आख्यायिका है, वह सरलतासे समझनेके लिये है— |
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मटचीहतेषु कुरुष्वाटिक्या सह जाययोषस्तिर्ह चाक्रायण इभ्यग्रामे प्रद्राणक उवास ॥ १ ॥
ओले और पत्थर पड़नेसे कुरुदेशके खेतीके चौपट हो जानेपर वहाँ इभ्य ग्रामके भीतर 'आटिकी' (जिसके स्तनादि स्त्रीजनोचित चिह्न प्रकट नहीं हुए हैं ऐसी अल्पवयस्का) पत्नीके साथ चक्रका पुत्र उषस्ति दुर्गतिकी अवस्थामें रहता था ॥ १ ॥
| मटचीहतेषु मटच्योऽशनयस्ताभिर्हतेषु नाशितेषु कुरुषु कुरुसस्येष्वित्यर्थः। ततो दुर्भिक्षे जात आटिक्यानुपजातपयोधरादिस्त्रीव्यञ्जनया सह जाययोषस्तिर्ह नामतश्चक्रस्यापत्यं चाक्रायणः। इभो हस्ती तमर्हतीतीभ्य | [कुरुओंके] मटचीहत होनेपर— मटची ओले और पत्थरको कहते हैं, उनसे कुरुदेशके अर्थात् कुरुदेशकी खेतीके हत-नष्ट हो जाने तथा उसके कारण दुर्भिक्ष हो जानेपर आटिकी यानी जिसके स्तनादि स्त्रीजनोचित चिह्न प्रकट नहीं हुए हैं ऐसी स्त्रीके साथ उषस्तिनामक चाक्रायण—चक्रका पुत्र इभ्य ग्राममें—इभ हाथीको |
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| खण्ड १० ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १२३ |
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| ईश्वरो हस्त्यारोहो वा, तस्य ग्राम इभ्यग्रामस्तस्मिन्प्रद्राणकोऽन्नालाभात् । द्रा कुत्सायां गतौ । कुत्सितां गतिं गतोऽन्त्यावस्थां प्राप्त इत्यर्थः । उवासोषितवान् कस्यचिद्गृहमाश्रित्य ॥ १ ॥ | कहते हैं, उसकी पात्रता रखनेवाला व्यक्ति इभ्य—धनी या हाथीवान—कहलाता है, उसके ग्रामको इभ्यग्राम कहते हैं, उसमें अन्न प्राप्त न होनेके कारण प्रद्राणक हो—'द्रा' धातुका प्रयोग कुत्सित गतिके अर्थमें होता है, अतः कुत्सित गति यानी दुरवस्थाको प्राप्त हो किसीके घरका आश्रय लेकर निवास करता था॥१॥ |
स हेभ्यं कुल्माषान्खादन्तं बिभिक्षे तꣳहोवाच ।<br>नेतोऽन्ये विद्यन्ते यच्च ये म इम उपनिहिता इति ॥२॥
उसने घुने हुए उड़द खानेवाले एक महावतसे याचना की। तब उसने उससे कहा—इन जूठे उड़दोंके सिवा मेरे पास और नहीं हैं। जो कुछ एकत्र थे वे सब-के-सब ये मैंने [ अपने भोजनपात्रमें ] रख लिये हैं [ अतः मैं किस प्रकार आपकी याचना पूर्ण करूँ ? ] ॥ २ ॥
| सोऽन्नार्थमटन्निभ्यं कुल्माषान्कुत्सितान्माषान्खादन्तं भक्षयन्तं यदृच्छयोपलभ्य बिभिक्षे याचितवान् । तमुषस्तिं होवाचेभ्यः । नेतोऽस्मान्मया भक्ष्यमाणादुच्छिष्टराशेः कुल्माषा अन्ये न विद्यन्ते । यच्च ये राशौ मे ममोपनिहिताः प्रक्षिप्ता इमे भाजने किं करोमि ? ॥ २ ॥ | अन्नके लिये घूमते-घूमते उसने अकस्मात् एक हाथीवानको घुने उड़द खाते देख उसने याचना की। उस उषस्तिसे हाथीवानने कहा—मेरेद्वारा खाये जाते हुए इन जूठे उड़दोंके समूहके सिवा मेरे पास और उड़द नहीं हैं। जो एकत्रित थे वे सभी मेरे इस पात्रमें गिरा लिये गये हैं, अब मैं क्या करूँ ? ॥ २ ॥ |
१२४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १
१२४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १
| इत्युक्तः प्रत्युवाचोषस्तिः— | ऐसा कहे जानेपर उषस्तिने उत्तर दिया— |
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एतेषां मे देहीति होवाच तानस्मै प्रददौ हन्तानुपानमित्युच्छिष्टं वै मे पीतँस्यादिति होवाच ॥३॥
तू मुझे इन्हें ही दे दे—ऐसा उषस्तिने कहा। तब महावतने वे उड़द उसे दे दिये और कहा 'यह अनुपान भी लो।' इसपर वह बोला—'इसे लेनेसे मेरेद्वारा निश्चय ही उच्छिष्ट जल पीया जायगा' ॥३॥
| एतेषामेतानित्यर्थः, मे मह्यं देहीति होवाच। तान्स इभ्योऽस्मा उषस्तये प्रददौ प्रदत्तवान्। अनुपानाय समीपस्थमुदकं हन्त गृहाणानुपानमित्युक्तः प्रत्युवाच-उच्छिष्टं वै मे ममेदमुदकं पीतं स्याद्यदि पास्यामि ॥ ३ ॥ | 'एतेषाम्' इस षष्ठ्यन्त पदका अर्थ 'एतान्' (इन्हें) है। अर्थात् 'तू मुझे इन उड़दोंको ही दे' ऐसा उषस्तिने कहा। तब उस महावतने उषस्तिको वे उड़द दे दिये तथा पीनेके लिये पास रखे हुए जलको लेकर बोला—'भाई ! अनुपान भी ले लो।' ऐसा कहे जानेपर उषस्तिने कहा—'यदि मैं इस जलको पीऊँगा तो निश्चय ही मेरेद्वारा यह उच्छिष्ट जल पिया जायगा [अर्थात् मुझे उच्छिष्ट जल पीनेका दोष प्राप्त होगा] ॥ ३ ॥ |
-: ० :-
| इत्युक्तवन्तं प्रत्युवाचेतरः— | इस प्रकार कहनेवाले उस उषस्तिसे दूसरे (महावत) ने कहा— |
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न स्विदेतेऽप्युच्छिष्टा इति न वा अजीविष्यमिमानखादन्निति होवाच कामो म उदकपानमिति ॥४॥
खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ १२५
‘क्या ये (उड़द) भी उच्छिष्ट नहीं हैं?’ उसने कहा—‘इन्हें बिना खाये तो मैं जीवित नहीं रह सकता था, जलपान तो मुझे यथेच्छ मात्रामें मिलता है’॥ ४ ॥
| किं न स्विदेते कुल्माषा अप्युच्छिष्टा इत्युक्त आहोपस्तिर्न वा अजीविष्यं न जीविष्यामीमान्कुल्माषानखादन्नभक्षयन्निति होवाच। काम इच्छातः मे ममोदकपानं लभ्यत इत्यर्थः। <br><br> अतश्चैतामवस्थां प्राप्तस्य विद्याधर्मयशोवतः स्वात्मपरोपकारसमर्थस्यैतदपि कर्म कुर्वतो नागःस्पर्श इत्यभिप्रायः। तस्यापि <br><br> जीवितं प्रत्युपायान्तरेऽजुगुप्सिते सति जुगुप्सितमेतत्कर्म दोषाय। ज्ञानावलेपेन कुर्वतो नरकपातः स्यादेवेत्यभिप्रायः, प्रद्राणकशब्दश्रवणात् ॥ ४ ॥ | ‘क्या ये उड़द भी उच्छिष्ट नहीं हैं?’ ऐसा कहे जानेपर उषस्तिने कहा—‘इन उड़दोंको बिना खाये-बिना भक्षण किये तो मैं जीवित नहीं रह सकता था। जलपान तो मुझे इच्छानुसार मिल जाता है।’ <br><br> अतः इसका यह अभिप्राय है कि इस अवस्थाको प्राप्त हुए, विद्या, धर्म और यशसे सम्पन्न तथा अपने और दूसरोंके उपकारमें समर्थ पुरुषको ऐसा कर्म करते हुए भी पापका स्पर्श नहीं हो सकता। उसके भी जीवनका यदि कोई अन्य अनिन्द्य उपाय हो तो यह निन्दनीय कर्म दोषके ही लिये होगा। ज्ञानाभिमानवश ऐसा कर्म करनेवाले पुरुषका भी नरकमें पतन होगा ही—यह इसका अभिप्राय है; क्योंकि श्रुतिमें ‘प्रद्राणक’ शब्दका प्रयोग है*॥४॥ |
* चाक्रायणने ‘प्रद्राणक’ अर्थात् अत्यन्त आपद्ग्रस्त होनेपर ही उच्छिष्ट भोजन किया था—इससे यह सिद्ध होता है कि विधिका व्यतिक्रम जीवनरक्षाका कोई वैध साधन न रहनेपर ही किया जा सकता है अन्यथा कदापि नहीं।
१२६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १
| १२६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
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स ह खादित्वातिशेषाञ्जायाया आजहार साग्र एव सुभिक्षा बभूव तान्प्रतिगृह्य निदधौ ॥ ५ ॥
उन्हें खाकर वह बचे हुए उड़दोंको अपनी पत्नीके लिये ले आया। वह पहले ही खूब भिक्षा प्राप्त कर चुकी थी। अतः उसने उन्हें लेकर रख दिया ॥ ५ ॥
| तांश्च स खादित्वातिशेषानतिशिष्टान्जायायै कारुण्यादाजहार। साटिक्यग्र एव कुल्माषप्राप्तेः सुभिक्षा शोभनभिक्षा लब्धाभेत्येतद्बभूव संवृत्ता। तथापि स्त्रीस्वाभाव्यादनवज्ञाय तान्कुल्माषान्पत्युर्हस्तात्प्रतिगृह्य निदधौ निक्षिप्तवती ॥ ५ ॥ | उन्हें खाकर वह बचे हुए उड़दोंको करुणावश अपनी भार्याके लिये ले आया। वह आटिकी उड़दोंके मिलनेसे पूर्व ही सुभिक्षा—शोभनभिक्षा हो चुकी थी अर्थात् अन्न प्राप्त कर चुकी थी। तथापि स्त्रीस्वभाववश, [पतिके दिये हुए] उन उड़दोंकी अवहेलना न करके उन्हें पतिके हाथसे लेकर रख दिया ॥ ५ ॥ |
स ह प्रातः संजिहान उवाच यद्बतान्नस्य लभेमहि लभेमहि धनमात्राँराजासौ यक्ष्यते स मा सर्वैरात्विज्यैर्वृणीतेति ॥ ६ ॥
उसने प्रातःकाल शय्यात्याग करनेके अनन्तर कहा—यदि हमें कुछ अन्न मिल जाता तो हम कुछ धन प्राप्त कर लेते, क्योंकि वह राजा यज्ञ करनेवाला है, वह समस्त ऋत्विक्कर्मोंके लिये मेरा वरण कर लेगा ॥ ६ ॥
| स तस्याः कर्म जानन्प्रातरुषःकाले संजिहानः शयनं निद्रां | वह अपनी पत्नीके उस कार्यको कि इसने उड़द बचा रखे हैं, जानता था, अतः प्रातःसमय—उषःकालमें शय्या अथवा निद्राका त्याग करनेके अनन्तर उस |
खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ १२७
| वा परित्यजन्नुवाच पत्न्याः शृण्वन्त्याः, यद्यदि बतेतिखिद्यमानोऽन्नस्य स्तोकं लभेमहि तद्भुङ्क्तवान्नं समर्थो गत्वा लभेमहि धनमात्रां धनस्याल्पम्। ततोऽस्माकं जीवनं भविष्यतीति।<br><br>धनलाभे च कारणमाह—<br>राजासौ नातिदूरे स्थाने यक्ष्यते। यजमानत्वात्तस्यात्मनेपदम्। स च राजा मा मां पात्रमुपलभ्य सर्वैरात्विज्यैर्ऋत्विकर्मभिर्ऋत्विकर्मप्रयोजनायेत्यर्थो वृणीतेति ॥ ६ ॥ | अपनी पत्नीके सुनते हुए कहा—'यदि [ भूखसे ] खिन्न होते हुए हमें थोड़ा-सा अन्न मिल जाता—यहाँ 'बत' अव्ययका तात्पर्य है 'खिन्न होते हुए'—तो उस अन्नको खाकर सामर्थ्यवान् हो [ कुछ दूर ] जाकर हम धनकी मात्रा अर्थात् थोड़ा-सा धन प्राप्त कर लेते और उससे हमारा जीवन-निर्वाह हो जाता ।<br><br>धनलाभमें कारण बतलाता है—यहाँसे थोड़ी ही दूरपर वह राजा यज्ञ करेगा । यजमान होनेके कारण उसके लिये 'यक्ष्यते' ऐसा आत्मनेपदका प्रयोग किया गया है*। वह राजा मुझे सुपात्र समझकर समस्त आर्त्विज्यों —ऋत्विक्कर्मोंके लिये अर्थात् ऋत्विक्कर्मोंको करानेके प्रयोजनसे वरण कर लेगा ॥ ६ ॥ |
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तं जायोवाच हन्त पत इम एव कुल्माषा इति तान्खादित्वामुं यज्ञं विततमेयाय ॥ ७ ॥
उससे उसकी पत्नीने कहा—'स्वामिन् ! [ आपके दिये हुए ] वे उड़द ही ये मौजूद हैं; [इन्हें लीजिये ] ।' उषस्ति उन्हें खाकर ऋत्विजोंद्वारा विस्तारपूर्वक किये जानेवाले उस यज्ञमें गया ॥ ७ ॥
* क्योंकि यजनरूप क्रियाका फल उस राजाको ही प्राप्त होनेवाला था ।
१२८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १
१२८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १
| एवमुक्तवन्तं जायोवाच— हन्त गृहाण हे पत इम एव ये मद्धस्ते विनिश्क्षिप्तास्त्वया कुल्माषा इति। तान्खादित्वामुं यज्ञं राज्ञो विततं विस्तारितमृत्विग्भिरेयाय ॥ ७ ॥ | इस प्रकार कहते हुए उषस्तिसे उसकी पत्नीने कहा—'हे स्वामिन्! आप इन उड़दोंको ही लीजिये जिन्हें आपने मेरे हाथमें दिया था। उषस्ति उन्हें खाकर राजाके उस वितत-ऋत्विजोंद्वारा विस्तारपूर्वक सम्पादित होनेवाले यज्ञमें गया ॥ ७ ॥ |
राजयज्ञमें उषस्ति और ऋत्विजोंका संवाद
तत्रोद्गातॄनास्तावे स्तोष्यमाणानुपोपविवेश स ह प्रस्तोतारमुवाच ॥ ८ ॥
वहाँ [जाकर वह] आस्ताव (स्तुति) के स्थानमें स्तुति करते हुए उद्गाताओंके समीप बैठ गया और उसने प्रस्तोतासे कहा—॥ ८ ॥
| तत्र च गत्वोद्गातॄनुद्गातृपुरुषानागत्य स्तुवन्त्यस्मिन्नित्यास्तावस्तस्मिन्नास्तावे स्तोष्यमाणानुपोपविवेश समीप उपविष्टस्तेषामित्यर्थः। उपविश्य स ह प्रस्तोतारमुवाच ॥ ८ ॥ | और वहाँ जाकर वह उद्गाता लोगोंके पास आ आस्तावमें—जिस स्थानमें (प्रस्तोतागण) स्तुति करते हैं, उसे आस्ताव कहते हैं, उसमें—स्तुति करते हुए उद्गाताओंके समीप बैठ गया। तथा वहाँ बैठकर उसने प्रस्तोतासे कहा—॥ ८ ॥ |
प्रस्तोतर्या देवता प्रस्तावमन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रस्तोष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति ॥ ९ ॥
हे प्रस्तोतः! जो देवता प्रस्ताव-भक्तिमें अनुगत है यदि तू उसे बिना जाने प्रस्तवन करेगा तो तेरा मस्तक गिर जायगा ॥ ९ ॥
खण्ड १०] शाङ्करभाष्यार्थ १२९
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| हे प्रस्तोतरित्यामन्त्र्याभिमुखीकरणाय । या देवता प्रस्तावं प्रस्तावभक्तिमनुगतान्वायत्ता तां चेद्देवतां प्रस्तावभक्तेरविद्वान्सन् प्रस्तोष्यसि विदुषो मम समीपे । | ‘हे प्रस्तोतः !’—इस प्रकार अपनी ओर लक्ष्य करानेके लिये सम्बोधन करते हुए [वह बोला—] ‘जो देवता प्रस्तावमें—प्रस्तावभक्तिमें अन्वायत्त यानी अनुगत है, यदि उस प्रस्तावभक्तिके देवताको बिना जाने ही तू उसका, उसे जाननेवाले मेरे समीप, प्रस्तवन करेगा तो तेरा मस्तक गिर जायगा ।’ |
| तत्परोक्षेऽपि चेद्विपतेत्तस्य मूर्धा कर्ममात्रविदामनधिकार एव कर्मणि स्यात् । तच्चानिष्टम्, अविदुषामपि कर्मदर्शनात्, दक्षिणमार्गश्रुतेश्च । अनधिकारे चाविदुषामुत्तर एवैको मार्गः श्रूयेत । न च स्मार्तकर्मनिमित्त एव दक्षिणः पन्थाः, “यज्ञेन दानेन” इत्यादिश्रुतेः । 'तथोक्तस्य मया' इति च विशेषणाद्विद्वत्समक्षमेव कर्मण्यनधिकारो न सर्वत्राग्नि- | यदि यह माना जाय कि देवतां-ज्ञानियोंके परोक्षमें भी मस्तक गिर जायगा तो केवल कर्मका ही ज्ञान रखनेवालोंका कर्ममें अनधिकार ही सिद्ध होगा । और यह बात माननीय नहीं है, क्योंकि कर्म तो अविद्वानोंको भी करते देखा जाता है और दक्षिणमार्गका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतिसे भी यही सिद्ध होता है । और यदि उनका अधिकार न होता तो श्रुतिमें एकमात्र उत्तरमार्गका ही प्रतिपादन किया होता, क्योंकि दक्षिण मार्ग केवल स्मार्त कर्मके ही कारण प्राप्त होनेवाला नहीं है, जैसा कि “यज्ञसे दानसे” इत्यादि श्रुतिसे भी सिद्ध होता है । तथा ‘मेरेद्वारा इस प्रकार कहे हुए’ इस वाक्यद्वारा विशेषरूपसे निरूपण किये जानेके कारण भी विद्वान्के सामने ही उसे कर्मका अधिकार नहीं है । अग्निहोत्र |
१३० | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय १
| १३० | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय १ |
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| होत्रस्मार्तकर्ममध्ययनादिषु च, अनुज्ञायास्तत्र तत्र दर्शनात् । कर्ममात्रविदामप्यधिकारः सिद्धः कर्मणीति । मूर्धा ते विपतिष्यतीति ॥ ९ ॥ | स्मार्त्त कर्म और अध्ययनादि समस्त कर्मोंमें ऐसा नियम नहीं है, क्योंकि जहाँ-तहाँ [ अविद्वान्के लिये भी ] कर्मानुष्ठानकी आज्ञा देखी जाती है। अतः यह सिद्ध हुआ कि केवल कर्ममात्रका ज्ञान करनेवालोंका भी कर्ममें अधिकार है ॥ ९ ॥ |
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एवमेवोद्गातारमुवाचोद्गातर्या देवतोद्गीथमन्वायत्ता तां चेदविद्वानुद्गास्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति ॥ १० ॥ एवमेव प्रतिहर्तारमुवाच प्रतिहर्तर्या देवता प्रतिहारमन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रतिहरिष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति ते ह समारतास्तूष्णीमासांचक्रिरे ॥११॥
इसी प्रकार उसने उद्गातासे भी कहा—'हे उद्गातः ! जो देवता उद्गीथमें अनुगत है यदि तू उसे बिना जाने उद्गान करेगा तो तेरा मस्तक गिर जायगा' ॥ १० ॥ इसी प्रकार प्रतिहर्तासे भी कहा—'हे प्रतिहर्तः ! जो देवता प्रतिहारमें अनुगत है यदि तू उसे बिना जाने प्रतिहरण करेगा तो तेरा मस्तक गिर जायगा।' तब वे प्रस्तोता आदि अपने-अपने कर्मोंसे उपरत हो मौन होकर बैठ गये ॥ ११ ॥
| एवमेवोद्गातारं प्रतिहर्तारमुवाचेत्यादि समानमन्यत् । ते प्रस्तोत्रादयः कर्मभ्यः समारता उपरताः सन्तो मूर्धपातभयात्तूष्णीमासांचक्रिरेऽन्यच्चाकुर्वन्तः, अर्थित्वात् ॥ १०-११ ॥ | इसी प्रकार उद्गातासे तथा प्रतिहर्तासे कहा—इत्यादि शेष अर्थ पूर्ववत् है। तब वे प्रस्तोता आदि कर्मसे समारत अर्थात् उपरत हो मस्तक गिर जानेके भयसे चुप होकर बैठ गये और अर्थी होनेके कारण उन्होंने कुछ और नहीं किया ॥ १०-११ ॥ |
-: * :--
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमाध्याये दशमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १० ॥
एकादश खण्ड
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राजा और उषस्तिका संवाद
अथ हैनँ यजमान उवाच भगवन्तं वा अहं विविदिषाणीत्युषस्तिरस्मि चाक्रायण इति होवाच ॥ १ ॥
तब उससे यजमानने कहा—'मैं आप पूज्य-चरणको जानना चाहता हूँ।' इसपर उसने कहा—'मैं चक्रका पुत्र उषस्ति हूँ' ॥ १ ॥
| अथानन्तरं हैनमुषस्तिं यजमानो राजोवाच । भगवन्तं वै पूजावन्तमहं विविदिषाणि वेदितुमिच्छामीत्युक्त उषस्तिरस्मि चाक्रायणस्तवापि श्रोत्रपथमागतो यदीति होवाचोक्तवान् ॥ १ ॥ | तदनन्तर उस उषस्तिसे यजमान राजाने कहा—'मैं भगवान्को—पूजनीयको जानना चाहता हूँ।' ऐसा कहे जानेपर उसने कहा—'यदि तुमने सुना हो तो मैं चक्रका पुत्र उषस्ति हूँ' ॥ १ ॥ |
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स होवाच भगवन्तं वा अहमेभिः सर्वैरात्विज्यैः पर्यैषिषं भगवतो वा अहमवित्त्यान्यानवृषि ॥ २ ॥
मैंने इन समस्त ऋत्विक्कर्मोंके लिये श्रीमान्को खोजा था। श्रीमान्के न मिलनेसे ही मैंने दूसरे ऋत्विजोंका वरण किया था ॥ २ ॥
| स ह यजमान उवाच—सत्यमेवमहं भगवन्तं बहुगुणमश्रौषं सर्वैश्च ऋत्विक्कर्मभिरात्विज्यैः पर्यैषिषं पर्येषणं कृतवानस्मि । | उस यजमानने कहा—'यह ठीक ही है, मैंने श्रीमान्को बहुत गुणवान् सुना है। मैंने सम्पूर्ण ऋत्विक्कर्मोंके लिये आपकी खोज |
छा० उ० ५—
१३२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १
| १३२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| अन्विष्य भगवतो वा अहम-<br>वित्त्यालाभेनान्यानिमानवृषि-<br>तवानस्मि ॥ २ ॥ | की थी । ढूँढ़नेपर श्रीमान्के न<br>मिलनेसे ही मैंने इन दूसरे ऋत्विजों-<br>का वरण किया था ॥ २ ॥ |
<div align="center">—: ० :—</div>भगवांस्त्वेव मे सर्वैरात्विज्यैरिति तथेत्यथ तर्ह्येत एव समतिसृष्टाः स्तुवतां यावद्धेभ्यो धनं दद्यास्तावन्मम दद्या इति तथेति ह यजमान उवाच ॥ ३ ॥
मेरे समस्त ऋत्विक्कर्मोंके लिये श्रीमान् ही रहें—ऐसा सुनकर उषस्तिने 'ठीक है' ऐसा कहा—[ और बोला— ] 'अच्छा तो मेरे द्वारा प्रसन्नतासे आज्ञा दिये हुए ये ही लोग स्तुति करें; और तुम जितना धन इन्हें दो उतना ही मुझे देना।' तब यजमानने 'ऐसा ही होगा' यह कहा ॥ ३ ॥
| अद्यापि भगवांस्त्वेव मे मम सर्वैरात्विज्यैर्ऋत्विक्कर्मार्थमस्त्वित्युकस्तथेत्याहोषस्तिः । किं त्वथैवं तर्ह्येत एव त्वया पूर्वं वृता मया समतिसृष्टा मया सम्यक्प्रसन्नेनानुज्ञाताः सन्तः स्तुवताम् । त्वया त्वेतत्कार्यम् , यावद्धेभ्यः प्रस्तोत्रादिभ्यः सर्वेभ्यो धनं दद्याः प्रयच्छसि तावन्मम दद्याः । इत्युक्तस्तथेति ह यजमान उवाच ॥ ३ ॥ | 'अब भी श्रीमान् ही मेरे सम्पूर्ण ऋत्विक्कर्मोंके लिये रहें' ऐसा कहे जानेपर उषस्तिने कहा—'अच्छा, किंतु तुमने पहले जिनका वरण कर लिया है वे ही ऋत्विग्गण मेरे द्वारा समतिसृष्ट हो—प्रसन्नतासे आज्ञा प्राप्त कर स्तवन करें। तुम्हें तो यही करना होगा कि जितना धन तुम इन सम्पूर्ण प्रस्तोता आदिको दोगे उतना ही मुझे देना।' ऐसा कहे जानेपर यजमानने 'ऐसा ही होगा' यह कहा ॥ ३ ॥ |
खण्ड ११ ] शाङ्करभाष्यार्थे १३३
उषस्तिके प्रति प्रस्तोताका प्रश्न
अथ हैनँ प्रस्तोतोपससाद प्रस्तोतर्या देवता प्रस्तावमन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रस्तोष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति मा भगवानवोचत्कतमा सा देवतेति ॥४॥
तदनन्तर उस (उषस्ति) के पास [शिष्यभावसे] प्रस्तोता आया [और बोला—] 'भगवन्! आपने जो मुझसे कहा था कि हे प्रस्तोतः! जो देवता प्रस्तावमें अनुगत है यदि तू उसे बिना जाने प्रस्तवन करेगा तो तेरा मस्तक गिर जायगा—सो वह देवता कौन है?' ॥४॥
| अथ हैनमौषस्त्यं वचः श्रुत्वा प्रस्तोतोपससादोषस्तिं विनयेनोपजगाम। प्रस्तोतर्या देवतेत्यादि मा मां भगवानवोचत्पूर्वम्; कतमा सा देवता? या प्रस्तावभक्तिमन्वायत्तेति ॥४॥ | तदनन्तर उषस्तिका यह वचन सुनकर प्रस्तोता उषस्तिके प्रति उपसन्न हुआ—विनीत भावसे उषस्तिके समीप आया [और बोला—] 'श्रीमान्ने जो पहले 'हे प्रस्तोतः! जो देवता प्रस्तावमें अनुगत है' इत्यादि वाक्य मुझसे कहा था सो वह देवता कौन है, जो कि प्रस्ताव-भक्तिमें अनुगत है?' ॥४॥ |
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उषस्तिका उत्तर---प्रस्तावानुगत देवता प्राण है
प्राण इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि प्राणमेवाभिसंविशन्ति प्राणमभ्युज्जिहते। सैषा देवता प्रस्तावमन्वायत्ता। तां चेदविद्वान्प्रास्तोष्यो मूर्धा ते व्यपतिष्यत्तथोक्तस्य मयेति ॥ ५ ॥
उस (उषस्ति) ने 'वह (देवता) प्राण है' ऐसा कहा 'क्योंकि ये सभी भूत प्राणमें ही प्रवेश कर जाते हैं और प्राणसे ही उत्पन्न होते
१३४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १
| १३४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
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हैं। वह यह प्राण-देवता ही प्रस्तावमें अनुगत है, यदि तू उसे बिना जाने ही प्रस्तवन करता तो मेरेद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर तेरा मस्तक गिर जाता' ॥ ५ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| पृष्टः प्राण इति होवाच। युक्तं प्रस्तावस्य प्राणो देवतेति। कथम् ? सर्वाणि स्थावरजङ्गमानि भूतानि प्राणमेवाभिसंविशन्ति प्रलयकाले प्राणमभि लक्षयित्वा प्राणात्मनैव, उज्जिहते प्राणादेवोद्गच्छन्तीत्यर्थ उत्पत्तिकाले। अतः सैषा देवता प्रस्तावमन्वायत्ता।<br><br>तां चेदविद्वांस्त्वं प्रास्तोष्यः प्रस्तवनं प्रस्तावभक्तिं कृतवानसि यदि मूर्धा शिरस्ते व्यपतिष्यद्विपतितमभविष्यत्तथोक्तस्य मया तत्काले मूर्धा ते विपतिष्यतीति। अतस्त्वया साधु कृतम्, मया निषिद्धः कर्मणो यदुपरममकार्षीरित्यभिप्रायः ॥ ५ ॥ | इस प्रकार पूछे जानेपर उसने 'वह देवता प्राण है' ऐसा कहा। प्राण प्रस्तावका देवता है—यह कथन ठीक ही है। किस प्रकार ? क्योंकि सम्पूर्ण स्थावर-जङ्गम प्राणी प्रलयकालमें प्राणहीमें प्रवेश करते हैं, अर्थात् प्राणकी ओर लक्ष्यकर प्राणरूपसे ही [ उसमें स्थित हो जाते हैं ] और उत्पत्तिकालमें उसीसे उद्गत होते हैं अर्थात् वे प्राणसे ही उत्पन्न होते हैं। अतः वह यह प्राणदेवता ही प्रस्तावमें अनुगत है।<br><br>तू यदि उसे बिना जाने ही प्रस्तवन-प्रस्तावभक्ति करता तो तेरा मूर्द्धा यानी मस्तक गिर जाता। अर्थात् उस समय मेरे इस प्रकार कहनेपर कि 'तेरा मस्तक गिर जायगा' तेरा मस्तक अवश्य गिर जाता। अतः अभिप्राय यह है कि तूने जो मेरे निषेध करनेपर कर्मसे उपरति की वह अच्छा ही किया है ॥ ५ ॥ |
खण्ड ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३५
उद्गाताका प्रश्न
अथ हैनमुद्गातोपससादोद्गातर्या देवतोद्गीथमन्वायत्ता तां चेदविद्वानुद्गास्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति मा भगवानवोचत्कतमा सा देवतेति ॥ ६ ॥
तदनन्तर उसके समीप उद्गाता आया [ और बोला— ] 'भगवन् ! आपने मुझसे जो कहा था कि हे उद्गातः ! जो देवता उद्गीथमें अनुगत है यदि उसे बिना जाने ही तू उद्गान करेगा तो तेरा मस्तक गिर जायगा—सो वह देवता कौन है ?' ॥ ६ ॥
| तथोद्गाता पप्रच्छ कतमा सोद्गीथभक्तिमनुगतान्वायत्ता देवता ? इति ॥ ६ ॥ | इसी प्रकार उससे उद्गाताने भी पूछा कि वह उद्गीथभक्तिमें अनुगत कौन देवता है ? ॥ ६ ॥ |
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उषस्तिका उत्तर-उद्गीथानुगत देवता आदित्य है
आदित्य इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्यादित्यमुच्चैः सन्तं गायन्ति सैषा देवतोद्गीथमन्वायत्ता तां चेदविद्वानुद्गास्यो मूर्धा ते व्यपतिष्यत्तथोक्तस्य मयेति ॥ ७ ॥
उषस्तिने 'वह ( देवता ) आदित्य है' ऐसा कहा, क्योंकि ये सभी भूत ऊँचे उठे आदित्यका ही गान करते हैं । वह यह आदित्य देवता ही उद्गीथमें अनुगत है । यदि तू उसे बिना जाने ही उद्गान करता तो मेरे द्वारा उस तरह कहे जानेपर तेरा मस्तक गिर जाता ॥ ७ ॥
| पृष्ट आदित्य इति होवाच । | इस प्रकार पूछे जानेपर उसने 'वह [ देवता ] आदित्य है' ऐसा | | सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्या- | कहा; क्योंकि ये सभी प्राणी ऊँचे |
१३६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १
| १३६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| दित्यमुच्चैरूर्ध्वं सन्तं गायन्ति शब्दयन्ति स्तुवन्तीत्यभिप्रायः, उच्च्छब्दसामान्यात्; प्रशब्दसामान्यादिव प्राणः । अतः सैषा देवतेत्यादि पूर्ववत् ॥ ७ ॥ | अर्थात् ऊपर विद्यमान आदित्यका ही गान—शब्द अर्थात् स्तवन करते हैं; प्रस्तावसे 'प्र' शब्दमें समानता होनेके कारण जैसे प्राण-प्रस्ताव-देवता था उसी प्रकार यहाँ [उद्गत आदित्य और उद्गीथकी ] 'उत्' शब्दमें समानता होनेसे यह उद्गीथ देवता है, अतः वह यह देवता आदि शेष अर्थ पूर्ववत् है ॥ ७ ॥ |
प्रतिहर्ताका प्रश्न
अथ हैनँ प्रतिहर्तोपससाद प्रतिहर्तर्या देवता प्रतिहारमन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रतिहरिष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति मा भगवानवोचत्कतमा सा देवतेति ॥८॥
फिर प्रतिहर्ता उसके पास आया [और बोला—] 'भगवन् ! आपने जो मुझसे कहा था कि हे प्रतिहर्तः ! जो देवता प्रतिहारमें अनुगत है यदि उसे बिना जाने ही तू प्रतिहरण करेगा तो तेरा मस्तक गिर जायगा—सो वह देवता कौन है ?' ॥ ८ ॥
| एवमेवाथ हैनँ प्रतिहर्तोपससाद कतमा सा देवता प्रतिहारमन्वायत्तेति ? ॥ ८ ॥ | इसी प्रकार फिर उसके पास प्रतिहर्ता आया और बोला कि 'वह प्रतिहारमें अनुगत देवता कौन है ?' ॥ ८ ॥ |
उषस्तिका उत्तर—प्रतिहारानुगत देवता अन्न है
अन्नमिति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्यन्नमेव प्रतिहरमाणानि जीवन्ति सैषा देवता प्रतिहार-
खण्ड ११ ] शाङ्करभाष्याथ १३७
मन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रत्यहरिष्यो मूर्धा ते व्यपतिष्यत्तथोक्तस्य मयेति तथोक्तस्य मयेति ॥ ९ ॥
इसपर उसने 'वह ( देवता ) अन्न है' ऐसा कहा; क्योंकि ये सम्पूर्ण भूत अपने प्रति अन्नका ही हरण करते हुए जीवित रहते हैं । वह यह अन्न देवता प्रतिहारमें अनुगत है । यदि तू उसे बिना जाने ही प्रतिहरण करता तो मेरेद्वारा उस तरह कहे जानेपर तेरा मस्तक गिर जाता ॥ ९ ॥
| शाङ्करभाष्यम् | भाषार्थ |
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| पृष्टोऽन्नमिति होवाच ।<br><br>सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्यन्नमेवात्मानं प्रति सर्वतः प्रतिहरमाणानि जीवन्ति । सैषा देवता प्रतिशब्दसामान्यात्प्रतिहारभक्तिमनुगता । समानमन्यत्तथोक्तस्य मयेति । प्रस्तावोद्गीथप्रतिहारभक्तीः प्राणादित्यान्नदृष्ट्योपासीतेति समुदायार्थः ।<br><br>प्राणाद्यापत्तिः कर्मसमृद्धिर्वा फलमिति ॥ ९ ॥ | इस प्रकार पूछे जानेपर उसने 'वह देवता अन्न है' ऐसा उत्तर दिया, क्योंकि ये सम्पूर्ण भूत सब ओरसे अपनी ओर अन्नका प्रतिहरण करते हुए ही जीवित रहते हैं । वह यह देवता ही 'प्रति' शब्दमें सादृश्य होनेके कारण प्रतिहार भक्तिमें अनुगत है । [ 'तां चेदविद्वान्' यहाँसे लेकर ] 'तथोक्तस्य मया' यहाँतक शेष अर्थ पहलेके समान है । समुदायार्थ ( 'प्राण इति होवाच' इत्यादि सब मन्त्रोंका सारांश ) यह है कि प्रस्ताव, उद्गीथ और प्रतिहार भक्तियोंकी क्रमशः प्राण, आदित्य और अन्नदृष्टिसे उपासना करनी चाहिये । प्राणादिरूपताकी प्राप्ति अथवा कर्ममें समृद्धिलाभ करना यह उस उपासनाका फल है ॥ ९ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमाध्याये एकादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ११ ॥
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