छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 123, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ११५
| तमेतं परोवरीयांसं परमात्मभूतमनन्तमेवं विद्वान्परोवरीयांसमुद्गीथमुपास्ते; तस्यैतत्फलमाह—परोवरीयः परं परं वरीयो विशिष्टतरं जीवनं हास्य विदुषो भवति दृष्टं फलमदृष्टं च परोवरीयस उत्तरोत्तरविशिष्टतरानेव ब्रह्माकाशान्ताँल्लोकाञ्जयति य एतदेवं विद्वानुद्गीथमुपास्ते ॥ २ ॥ | उस इस परम उत्कृष्ट परमात्मभूत अनन्त उद्गीथको इस प्रकार जाननेवाला जो विद्वान् इस परमोत्कृष्ट उद्गीथकी उपासना करता है, उसके लिये श्रुति यह फल बतलाती है—जो इसे इस प्रकार जाननेवाला विद्वान् उद्गीथकी उपासना करता है उस विद्वान्को यह दृष्ट फल होता है कि उस विद्वान्का जीवन उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर हो जाता है तथा अदृष्ट फल यह होता है कि वह उत्तरोत्तर ब्रह्माकाशपर्यन्त विशिष्ट लोकोंको जीत लेता है ॥२॥ |
<div align="center">—: ० :—</div>तꣳहैतमतिधन्वा शौनक उदरशाण्डिल्यायोक्त्वोवाच यावत्त एनं प्रजायामुद्गीथं वेदिष्यन्ते परोवरीयो हैभ्यस्तावदस्मिँल्लोके जीवनं भविष्यति ॥ ३ ॥
शुनकके पुत्र अतिधन्वाने उस इस उद्गीथका उदरशाण्डिल्यके प्रति निरूपण कर उससे कहा—जबतक मेरी संततिमेंसे [ मेरे वंशज ] इस उद्गीथको जानेंगे तबतक इस लोकमें उनका जीवन उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर होता जायगा ॥ ३ ॥
| किं च तमेतमुद्गीथं विद्वानतिधन्वा नामतः शुनकस्यापत्यं शौनक उदरशाण्डिल्याय शि- | तथा इस उद्गीथको जाननेवाले अतिधन्वा नामक शौनकने—शुनकके पुत्रने अपने शिष्य उदरशाण्डिल्यके प्रति इस उद्गीथविद्याका |