छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 127, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| खण्ड १० ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १२३ |
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| ईश्वरो हस्त्यारोहो वा, तस्य ग्राम इभ्यग्रामस्तस्मिन्प्रद्राणकोऽन्नालाभात् । द्रा कुत्सायां गतौ । कुत्सितां गतिं गतोऽन्त्यावस्थां प्राप्त इत्यर्थः । उवासोषितवान् कस्यचिद्गृहमाश्रित्य ॥ १ ॥ | कहते हैं, उसकी पात्रता रखनेवाला व्यक्ति इभ्य—धनी या हाथीवान—कहलाता है, उसके ग्रामको इभ्यग्राम कहते हैं, उसमें अन्न प्राप्त न होनेके कारण प्रद्राणक हो—'द्रा' धातुका प्रयोग कुत्सित गतिके अर्थमें होता है, अतः कुत्सित गति यानी दुरवस्थाको प्राप्त हो किसीके घरका आश्रय लेकर निवास करता था॥१॥ |
स हेभ्यं कुल्माषान्खादन्तं बिभिक्षे तꣳहोवाच ।<br>नेतोऽन्ये विद्यन्ते यच्च ये म इम उपनिहिता इति ॥२॥
उसने घुने हुए उड़द खानेवाले एक महावतसे याचना की। तब उसने उससे कहा—इन जूठे उड़दोंके सिवा मेरे पास और नहीं हैं। जो कुछ एकत्र थे वे सब-के-सब ये मैंने [ अपने भोजनपात्रमें ] रख लिये हैं [ अतः मैं किस प्रकार आपकी याचना पूर्ण करूँ ? ] ॥ २ ॥
| सोऽन्नार्थमटन्निभ्यं कुल्माषान्कुत्सितान्माषान्खादन्तं भक्षयन्तं यदृच्छयोपलभ्य बिभिक्षे याचितवान् । तमुषस्तिं होवाचेभ्यः । नेतोऽस्मान्मया भक्ष्यमाणादुच्छिष्टराशेः कुल्माषा अन्ये न विद्यन्ते । यच्च ये राशौ मे ममोपनिहिताः प्रक्षिप्ता इमे भाजने किं करोमि ? ॥ २ ॥ | अन्नके लिये घूमते-घूमते उसने अकस्मात् एक हाथीवानको घुने उड़द खाते देख उसने याचना की। उस उषस्तिसे हाथीवानने कहा—मेरेद्वारा खाये जाते हुए इन जूठे उड़दोंके समूहके सिवा मेरे पास और उड़द नहीं हैं। जो एकत्रित थे वे सभी मेरे इस पात्रमें गिरा लिये गये हैं, अब मैं क्या करूँ ? ॥ २ ॥ |