भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 122, कुल 978 में से

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पृष्ठ 122
११८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १

| सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि । स्थावरजङ्गमान्याकाशादेव समुत्पद्यन्ते तेजोऽबन्नादिक्रमेण सामर्थ्यात् । आकाशं प्रत्यस्तं यान्ति प्रलयकाले तेनैव विपरीतक्रमेण । हि यस्मादाकाश एवैभ्यः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ज्यायान्महत्तरोज्ञतः स सर्वेषां भूतानां परमयनं परायणं प्रतिष्ठा त्रिष्वपि कालेष्वित्यर्थः।१। | “आत्मन आकाशः सम्भूतस्तत्तेजोऽसृजत” इत्यादि श्रुतियोंके बलसे ये सम्पूर्ण चराचर भूत तेज, जल और अन्न इस क्रमसे आकाशसे ही उत्पन्न होते हैं; और प्रलयकालमें उसी विपरीतक्रमसे आकाशमें ही लीन हो जाते हैं, क्योंकि आकाश ही इन समस्त भूतोंसे बड़ा है। अतः वही समस्त भूतोंका परायण—परम आश्रय अर्थात् तीनों कालोंमें उनकी प्रतिष्ठा है ॥ १ ॥ |

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आकाशसंज्ञक उद्गीथकी उत्कृष्टता और उसकी उपासनाका फल

स एष परोवरीयानुद्गीथः स एषोऽनन्तः परोवरीयो हास्य भवति परोवरीयसो ह लोकाञ्जयति य एतदेवं विद्वान्परोवरीयांसमुद्गीथमुपास्ते ॥ २ ॥

वह यह उद्गीथ परम उत्कृष्ट है, यह अनन्त है । जो इसे इस प्रकार जाननेवाला विद्वान् इस परमोत्कृष्ट ( परमात्मभूत ) उद्गीथकी उपासना करता है उसका जीवन परमोत्कृष्ट हो जाता है और वह उत्तरोत्तर उत्कृष्ट लोकोंको अपने अधीन कर लेता है ॥ २ ॥

| यस्मात्परं परं वरीयो वरीयसोऽप्येष वरः परश्च वरीयांश्च परोवरीयानुद्गीथः परमात्मा संपन्न इत्यर्थः । अत एव स एषोऽनन्तोऽविद्यमानान्तः । | क्योंकि उत्तरोत्तर उत्कृष्ट—श्रेष्ठसे भी श्रेष्ठ अर्थात् पर और उत्कृष्टरूप यह उद्गीथ ही परमात्मभावसे सम्पन्न होता है, इसलिये वह यह उद्गीथ अनन्त—जिसका कोई अन्त नहीं है, ऐसा है । |