छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 124, कुल 978 में से
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१२० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १
| प्यायैतमुद्गीथदर्शनमुक्त्वोवाच । यावत्ते तव प्रजायां प्रजासंततावित्यर्थः। एनमुद्गीथं त्वत्संततिजा वेदिष्यन्ते ज्ञास्यन्ति तावन्तं कालं परोवरीयो हैभ्यः प्रसिद्धेभ्यो लौकिकजीवनेभ्य उत्तरोत्तरविशिष्टतरं जीवनं तेभ्यो भविष्यति ॥ ३ ॥ | वर्णन करके कहा—'जबतक तेरी प्रजामें अर्थात् तेरी संततिमें तेरे गोत्रज इस उद्गीथको जानेंगे तबतक—उतने समयतक उन्हें इन प्रसिद्ध लौकिक जीवनोंकी अपेक्षा उत्तरोत्तर विशिष्टतर जीवन प्राप्त होगा' ॥ ३ ॥ |
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तथामुष्मिँल्लोके लोक इति । स य एतदेवं विद्वानुपास्ते परोवरीय एव हास्यास्मिँल्लोके जीवनं भवति तथामुष्मिँल्लोके लोक इति लोके लोक इति ॥ ४ ॥
तथा परलोकमें भी उसे [उत्कृष्टसे उत्कृष्ट] लोककी प्राप्ति होती है। जो इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष इसकी उपासना करता है, उसका जीवन निश्चय ही इस लोकमें उत्कृष्टतर होता है तथा परलोकमें भी उसे [उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर] लोक प्राप्त होता है—परलोकमें उसे [उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर] लोक प्राप्त होता है ॥ ४ ॥
| तथादृष्टेऽपि परलोकेऽमुष्मिन्परोवरीयाँल्लोको भविष्यतीत्युक्तवाञ्शाण्डिल्यायातिधन्वा शौनकः। स्यादेतत्फलं पूर्वेषां महा- | 'तथा अदृष्ट परलोकमें भी उसे उत्तरोत्तर उत्कृष्ट लोककी ही प्राप्ति होगी'—ऐसा शौनकपुत्र अतिधन्वा-ने शाण्डिल्यके प्रति कहा। 'यह फल पूर्वकालिक परम भाग्यशाली |
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