भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 125

खण्ड ३] शाङ्करभाष्यार्थ १२१


भाग्यानां नैदंयुगीनानामित्या-पुरुषोंको प्राप्त होता होगा, वर्तमान युगके पुरुषोंको नहीं हो सकता'
शङ्कानिवृत्तय आह—स यःऐसी आशङ्काकी निवृत्तिके लिये श्रुति कहती है—'इस समय भी इसे
कश्चिदेतदेवं विद्वानुद्गीथमेतर्ह्युपा-इस प्रकार जाननेवाला जो कोई पुरुष उद्गीथकी उपासना करता है
स्ते तस्याप्येवमेव परोवरीय एवउसका भी इस लोकमें उसी प्रकार उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर ही जीवन
हास्यास्मिंल्लोके जीवनं भवतिहोता है तथा परलोकमें भी उसे उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर लोककी ही
तथामुष्मिंल्लोके लोक इति लोकेप्राप्ति होती है ॥ ४ ॥
लोक इति ॥ ४ ॥

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमाध्याये नवमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ९ ॥