छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
६१८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ६१८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| ननु वाय्वन्तरिक्षे त्वत्रिवृत्कृते तेजःप्रभृतिष्वनन्तर्भूतत्वादवशिष्येते । एवं गन्धरसशब्दस्पर्शाश्चावशिष्टा इति कथं सता विज्ञातेन सर्वमन्यद्विज्ञातं विज्ञातं भवेत् ? तद्विज्ञाने वा प्रकारान्तरं वाच्यम् ।<br><br>नैष दोषः; रूपवद्द्रव्ये सर्वस्य दर्शनात् । कथम् ? तेजसि तावद्रूपवति शब्दस्पर्शयोरप्युपलम्भाद्वाय्वन्तरिक्षयोस्तत्र स्पर्शशब्दगुणवतोः सद्भावोऽनुमीयते । तथाबन्नयो रूपवतो रसगन्धान्तर्भाव इति । रूपवतां त्रयाणां तेजोऽबन्नानां त्रिवृत्करणप्रदर्शनेन सर्वं तदन्तर्भूतं सद्विकारत्वात्त्रीण्येव रूपाणि विज्ञातं मन्यते श्रुतिः । न हि | **शङ्का—**किंतु वायु और अन्तरिक्ष तो तेज आदिके अन्तर्गत न होनेके कारण अत्रिवृत्कृत ही रह जाते हैं । इसी प्रकार गन्ध, रस, शब्द और स्पर्श भी बच रहते हैं; फिर एकमात्र सत्को जान लेनेपर ही और सब अज्ञात पदार्थोंका ज्ञान किस प्रकार हो सकता है । अथवा उनका ज्ञान होनेके लिये श्रुतिको कोई दूसरा प्रकार बतलाना चाहिये ।<br><br>**समाधान—**यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि रूपवान् द्रव्यमें सब गुण देखे जा सकते हैं । किस प्रकार ? [ सो बतलाते हैं— ] रूपवान् तेजमें शब्द और स्पर्शकी भी उपलब्धि होनेके कारण उसमें स्पर्श और शब्द गुणवाले वायु और आकाशके सद्भावका भी अनुमान किया जाता है । तथा रूपवान् जल और अन्नमें रस एवं गन्धका अन्तर्भाव हो जाता है । इस प्रकार तेज, जल और अन्न—इन तीन रूपवानोंका त्रिवृत्करण प्रदर्शित करनेसे श्रुति ऐसा मानती है कि उनके अन्तर्गत साराका सारा सत्का ही कार्य होनेके कारण तीन रूप ही सत्य जाने गये हैं; |
खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६१९
| मूर्तं रूपवद्द्रव्यं प्रत्याख्याय वाय्वाकाशयोस्तद्गुणयोर्गन्धरसयोर्वा ग्रहणमस्ति ।<br><br>अथवा रूपवतामपि त्रिवृत्करणं प्रदर्शनार्थमेव मन्यते श्रुतिः । यथा तु त्रिवृत्कृते त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम्, तथा पञ्चीकरणेऽपि समानो न्याय इत्यतः सर्वस्य सद्विकारत्वात्सता विज्ञातेन सर्वमिदं विज्ञातं स्यात्सदेकमेवाद्वितीयं सत्यमिति सिद्धमेव भवति । तदेकस्मिन्सति विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति सूक्तम् ॥ २-४ ॥ | क्योंकि रूपवान् मूर्त्त पदार्थोंको छोड़कर वायु और आकाशका तथा उनके गुण एवं गन्ध और रसका ग्रहण ही नहीं हो सकता ।<br><br>अथवा इन रूपवान् पदार्थोंके त्रिवृत्करणको भी श्रुति प्रदर्शनके ही लिये मानती है। जिस प्रकार त्रिवृत्करणमें तीन रूप ही सत्य हैं उसी प्रकार पञ्चीकरणमें भी समान नियम ही समझना चाहिये। इस प्रकार सब कुछ सत्का ही विकार होनेके कारण सत्के ज्ञानसे यह साराका सारा जान लिया जाता है। अतः एकमात्र अद्वितीय सत् ही सत्य है—यह सिद्ध ही है। इसलिये यह ठीक ही कहा है कि उस एकको जान लेनेपर यह सब जान लिया जाता है ॥ २-४ ॥ |
एतद्ध स्म वै तद्विद्वाꣳस आहुः पूर्वे महाशाला महाश्रोत्रिया न नोऽद्य कश्चनाश्रुतममतमविज्ञातमुदाहरिष्यतीति ह्येभ्यो विदाञ्चक्रुः ॥ ५ ॥
इस (त्रिवृत्करण) को जाननेवाले पूर्ववर्ती महागृहस्थ और महाश्रोत्रियोंने यह कहा था कि इस समय हमारे कुलमें कोई बात अश्रुत, अमत अथवा अविज्ञात है—ऐसा कोई नहीं कह सकेगा, क्योंकि इन अग्नि आदिके दृष्टान्तद्वारा वे सब कुछ जानते थे ॥ ५ ॥
६२० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ६२० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
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| एतद्धिद्वांसो विदितवन्तः पूर्वेऽतिक्रान्ता महाशाला महाश्रोत्रिया आहुर्ह स्म वै किल। किमुक्तवन्तः? इत्याह—न नोऽस्माकं कुलेऽद्येदानीं यथोक्तविज्ञानवतां कश्चन कश्चिदप्यश्रुतममतमविज्ञातमुदाहरिष्यति नोदाहरिष्यति, सर्वं विज्ञातमेवास्मत्कुलीनानां सद्विज्ञानवत्त्वादित्यभिप्रायः।<br><br>ते पुनः कथं सर्वं विज्ञातवन्तः? इत्याह—एभ्यस्त्रिभ्यो रोहितादिरूपेभ्यस्त्रिवृत्कृतेभ्यो विज्ञातेभ्यः सर्वमप्यन्यच्छिष्टमेवमेवेति विदाञ्चक्रुर्विज्ञातवन्तो यस्मात्तस्मात्सर्वज्ञा एव सद्विज्ञानात्त आसुरित्यर्थः। अथवैभ्यो विदाञ्चक्रुरित्यग्न्यादिभ्यो दृष्टान्तेभ्यो विज्ञातेभ्यः सर्वमन्यद्विदाञ्चक्रुरित्येतत् ॥ ५ ॥ | इस (त्रिवृत्करण) को जाननेवाले पूर्ववर्ती अर्थात् अतीतकालीन महागृहस्थ और महाश्रोत्रियोंने कहा था। क्या कहा था? सो बतलाते हैं—'उपर्युक्त विज्ञानको जाननेवाले हमलोगोंके कुलमें आज-इस समय कुछ भी अश्रुत, अमत अथवा अविज्ञात हो, ऐसा कोई भी नहीं बता सकेगा। तात्पर्य यह है कि सत्के विज्ञानसे युक्त होनेके कारण हमारे कुटुम्बियोंको सब कुछ ज्ञान ही है।'<br><br>किंतु उन्होंने किस प्रकार सब कुछ जाना है, सो श्रुति बतलाती है—'क्योंकि इन तीन अर्थात् [इस प्रकार] जाने हुए त्रिवृत्कृत रोहितादि रूपोंद्वारा, अन्य अवशिष्ट पदार्थ भी ऐसे ही हैं—इस प्रकार वे जानते हैं, अतः सत्के विज्ञानके कारण वे सब सर्वज्ञ ही हो गये हैं'—ऐसा इसका तात्पर्य है। अथवा 'एभ्यः विदाञ्चक्रुः' इसका यह भी तात्पर्य हो सकता है कि विज्ञात हुए इन अग्नि आदि दृष्टान्तोंद्वारा वे और सबको भी जान गये हैं ॥ ५ ॥ |
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खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६२१
| कथम् ? | किस प्रकार जान गये हैं ? |
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यदु रोहितमिवाभूदिति तेजसस्तद्रूपमिति तद्विदाञ्चक्रुर्यदु शुक्लमिवाभूदित्यपाᳪरूपमिति तद्विदाञ्चक्रुर्यदु कृष्णमिवाभूदित्यन्नस्य रूपमिति तद्विदाञ्चक्रुः ॥ ६ ॥
यद्विज्ञातमिवाभूदित्येतासामेव देवतानाᳪसमास इति तद्विदाञ्चकुर्यथा नु खलु सोम्येमास्तिस्रो देवताः पुरुषं प्राप्य त्रिवृत्त्रिवृदेकैका भवति तन्मे विजानीहीति ॥ ७ ॥
जो कुछ रोहित-सा है वह तेजका रूप है—ऐसा उन्होंने जाना है; जो शुक्ल-सा है वह जलका रूप है—ऐसा उन्होंने जाना है तथा जो कृष्ण-सा है वह अन्नका रूप है—ऐसा उन्होंने जाना है ॥ ६ ॥
तथा जो कुछ विज्ञात-सा है वह इन देवताओंका ही समुदाय है—ऐसा उन्होंने जाना है। हे सोम्य ! अब तू मेरेद्वारा यह जान कि किस प्रकार ये तीनों देवता पुरुषको प्राप्त होकर उनमेंसे प्रत्येक त्रिवृत्-त्रिवृत् हो जाता है ॥ ७ ॥
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| यदन्यरूपेण संदिह्यमाने कपोतादिरूपे रोहितमिव यद्गृह्यमाणमभूत्तेषां पूर्वेषां ब्रह्मविदाम्, <br><br> तत्तेजसो रूपमिति विदाञ्चक्रुः। <br><br> तथा यच्छुक्लमिवाभूद्गृह्यमाणं तदपां रूपम्, यत्कृष्णमिवगृह्यमाणं तदन्नस्येति विदाञ्चक्रुः। एवमेवा- | [अग्नि आदिकी अपेक्षा] अन्य रूपसे संदेह किये जाते हुए कपोतादिरूपमें जो उन पूर्ववर्ती ब्रह्मवेत्ताओंद्वारा रोहित-सा ग्रहण किया जाता था वह तेजका रूप है—ऐसा उन्होंने जाना। तथा जो शुक्ल-सा ग्रहण किया जाता था वह जलका रूप है और जो कृष्ण-सा ग्रहण किया जाता था वह अन्नका रूप है—ऐसा उन्होंने जाना। इसी प्रकार जो अत्यन्त |
६९२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ६
६९२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ६
| त्यन्तदुर्लक्ष्यं यदु अप्यविज्ञात-<br>मिव विशेषतोऽगृह्यमाणमभूत्त-<br>दप्येतासामेव तिसृणां देव-<br>तानां समासः समुदाय इति<br>विदाञ्चक्रुः ।<br>एवं तावद्बाह्यं वस्त्वग्न्या-<br>दिवद्विज्ञातम्, तथेदानीं यथा<br>नु खलु हे सोम्येमा यथोक्ता-<br>स्तिस्रो देवताः पुरुषं शिरः-<br>पाण्यादिलक्षणं कार्यकारण-<br>संघातं प्राप्य पुरुषेणोपयुज्य-<br>मानास्त्रिवृत्त्रिवृदेकैका भवति,<br>तन्मे विजानीहि निगदत<br>इत्युक्तवाह ॥ ६-७ ॥ | दुर्लक्ष्य और अविज्ञात-सा अर्थात्<br>विशेषरूपसे ग्रहण नहीं किया जा<br>सकता था वह भी इन तीन<br>देवताओंका ही समूह है—ऐसा<br>उन्होंने जाना था।<br>इस प्रकार तो बाह्य वस्तुएँ<br>अग्नि आदिके समान जानी गयीं।<br>अब, हे सोम्य ! जिस प्रकार वे<br>उपर्युक्त तीनों देवता मस्तक और<br>हाथ आदि अङ्गोंवाले शरीर एवं<br>इन्द्रियोंके संघातस्वरूप पुरुषको प्राप्त<br>होकर पुरुषसे उपयोग की जाती<br>हुई प्रत्येक त्रिवृत्-त्रिवृत् हो जाती<br>है वह मेरे द्वारा—मेरे कथन<br>करनेपर तू जान। ऐसा कहकर<br>वह कहने लगा ॥ ६-७ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठाध्याये चतुर्थखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ४ ॥
पञ्चम खण्ड
अन्न आदिके त्रिविध परिणाम
अन्नमशितं त्रेधा विधीयते तस्य यः स्थविष्ठो धातुस्तत्पुरीषं भवति यो मध्यमस्तन्मांसं योऽणिष्ठस्तन्मनः ॥ १ ॥
खाया हुआ अन्न तीन प्रकारका हो जाता है । उसका जो अत्यन्त स्थूल भाग होता है, वह मल हो जाता है, जो मध्यम भाग है वह मांस हो जाता है और जो अत्यन्त सूक्ष्म होता है वह मन हो जाता है ॥ १ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-व्याख्या |
|---|---|
| अन्नमशितं भुक्तं त्रेधा विधीयते जाठरेणाग्निना पच्यमानं त्रिधा विभज्यते । कथम् ? तस्यान्नस्य त्रिधा विधीयमानस्य यः स्थविष्ठः स्थूलतमो धातुः स्थूलतमं वस्तु विभक्तस्य स्थूलोऽंशः, तत्पुरीषं भवति; यो मध्यमोऽंशो धातुरन्नस्य, तद्रसादिक्रमेण परिणम्य मांसं भवति; योऽणिष्ठोऽणुतमो धातुः, स ऊर्ध्वं हृदयं प्राप्य सूक्ष्मासु हिताख्यासु नाडीष्वनुप्रविश्य वागादिकरणसंघातस्य | खाया हुआ अन्न तीन प्रकारका हो जाता है अर्थात् जठराग्निद्वारा पचाये जानेपर वह तीन भागोंमें विभक्त हो जाता है । सो किस प्रकार ?—तीन भागोंमें विभक्त होते हुए उस अन्नका जो स्थविष्ठ-स्थूलतम धातु—सबसे स्थूल वस्तु यानी विभक्त हुए अन्नका जो स्थूल अंश होता है वह मल हो जाता है । तथा जो अन्नका मध्यम अंश यानी मध्यम धातु होता है वह रसादि क्रमसे परिणत होकर मांस हो जाता है और जो अणिष्ठ—अणुतम धातु होता है वह ऊपरको ओर हृदयमें पहुँचकर हिता नामकी सूक्ष्म नाड़ीमें प्रवेश कर वायु आदि |
६२४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ६२४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| स्थितिमुत्पादयन्मनो भवति । मनोरूपेण विपरिणमन्मनस उपचयं करोति । | इन्द्रियसमूहकी स्थिति उत्पन्न करता हुआ मन हो जाता है । वह मनरूपसे विपरिणाम (विकार) को प्राप्त होता हुआ मनका उपचय करता है । | | ततश्चान्नोपचितत्वान्मनसो भौतिकत्वमेव; न वैशेषिकतन्त्रोक्तलक्षणं नित्यं निरवयवं चेति गृह्यते । यदपि 'मनोऽस्य दैवं चक्षुः' इति वक्ष्यति तदपि न नित्यत्वापेक्षया; किं तर्हि ? सूक्ष्मव्यवहितविप्रकृष्टादिसर्वेन्द्रियविषयव्यापकत्वापेक्षया । यच्चान्येन्द्रियविषयापेक्षयानित्यत्वम्, तदप्यापेक्षिकमेवेति वक्ष्यामः। “सत् ⋯ एकमेवाद्वितीयम्” (छा०उ० ६।२।१) इति श्रुतेः ॥ १ ॥ | इस कारण भौतिक होना ही सिद्ध होनेसे मनका भौतिक होना ही सिद्ध होता है । वह वैशेषिक दर्शनके कहे हुए लक्षणवाला नित्य और निरवयव है—ऐसा नहीं स्वीकार किया जाता । आगे (छा० ८।१२।५ में) जो कहा जायगा कि 'मन इसका दैव चक्षु है' वह भी मनके नित्यत्वकी अपेक्षासे नहीं है । तो फिर किस दृष्टिसे है ? वह कथन सूक्ष्म, व्यवहित और दूरवर्ती इत्यादि सभी प्रकारके इन्द्रियोंके विषयोंमें व्यापक होनेकी अपेक्षासे है । तथा जो अन्य इन्द्रियोंकी अपेक्षासे उसका नित्यत्व है वह भी आपेक्षिक ही है—ऐसा हम आगे चलकर कहेंगे, क्योंकि “सत् एकमात्र और अद्वितीय है” ऐसी श्रुति है [ अतः उसके सिवा और कोई परमार्थ-सत्य नहीं हो सकता] ॥१॥ |
| तथा— | इसी प्रकार— |
आपः पीतास्त्रेधा विधीयन्ते तासां यः स्थविष्ठो धातुस्तन्मूत्रं भवति यो मध्यस्तल्लोहितं योऽणिष्ठः स प्राणः ॥ २ ॥
खण्ड ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६२५
पीया हुआ जल तीन प्रकारका हो जाता है। उसका जो स्थूलतम भाग होता है वह मूत्र हो जाता है, जो मध्यभाग है वह रक्त हो जाता है और जो सूक्ष्मतम भाग है वह प्राण हो जाता है ॥ २ ॥
| आपः पीतास्त्रेधा विधीयन्ते ।<br><br>तासां यः स्थविष्ठो धातुः,<br><br>तन्मूत्रं भवति। यो मध्यमः,<br><br>तल्लोहितं भवति। योऽणिष्ठः,<br><br>स प्राणो भवति। वक्ष्यति हि<br>'आपोमयः प्राणो न पिबतो<br>विच्छेत्स्यते' इति ॥ २ ॥ | पीया हुआ जल तीन प्रकारका हो जाता है। उसका जो स्थूलतम भाग होता है वह मूत्र हो जाता है, जो मध्यम भाग है वह रक्त हो जाता है और जो सूक्ष्मतम भाग है वह प्राण हो जाता है। आगे श्रुति यह कहेगी भी कि 'प्राण जलमय है, जलपान करते हुए तेरा प्राण विच्छिन्न नहीं होगा' ॥ २ ॥ |
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| तथा— | ऐसे ही— |
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तेजोऽशितं त्रेधा विधीयते तस्य यः स्थविष्ठो धातुस्तदस्थि भवति यो मध्यमः स मज्जा योऽणिष्ठः सा वाक् ॥ ३ ॥
खाया हुआ [ घृतादि ] तेज तीन प्रकारका हो जाता है। उसका जो स्थूलतम भाग होता है वह हड्डी हो जाता है, जो मध्यम भाग है वह मज्जा हो जाता है और जो सूक्ष्मतम भाग है वह वाक् हो जाता है ॥ ३ ॥
| तेजोऽशितं तैलघृतादि भक्षितं त्रेधा विधीयते। तस्य यः स्थविष्ठो धातुः, तदस्थि भवति। | खाया हुआ तेज अर्थात् भक्षण किया हुआ तैल-घृत आदि तीन प्रकारका हो जाता है। उसका जो स्थूलतम अंश होता है वह हड्डी हो |
३२६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
३२६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| यो मध्यमः, स मज्जास्थ्यन्तर्गतः स्नेहः । योऽणिष्ठः, सा वाक् । तैलघृतादिभक्षणाद्धि वाग्विशदा भाषणे समर्था भवतीति प्रसिद्धं लोके ॥ ३ ॥ | जाता है, जो मध्यम भाग है वह मज्जा—हड्डीके भीतर रहनेवाला स्निग्ध पदार्थ हो जाता है और जो सूक्ष्मतम अंश है वह वाक् हो जाता है। तैल-घृत आदिके भक्षणसे ही वाणी विशद अर्थात् भाषणमें समर्थ होती है—ऐसा लोकमें प्रसिद्ध ही है ॥ ३ ॥ |
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| यत एवम्— | । क्योंकि ऐसा है— |
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अन्नमयँ हि सोम्य मन आपोमयः प्राणस्तेजोमयी वागिति भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ४ ॥
[ इसलिये ] हे सोम्य ! मन अन्नमय है, प्राण जलमय है और वाक् तेजोमयी है। ऐसा कहे जानेपर श्वेतकेतु बोला—'भगवन् ! आप मुझे फिर समझाइये।' तब आरुणिने 'अच्छा सोम्य !' ऐसा कहा ॥ ४ ॥
| अन्नमयं हि सोम्य मन आपोमयः प्राणस्तेजोमयी वाक् ।<br><br>ननु केवलान्नभक्षिण आखुप्रभृतयो वाग्ग्मिनः प्राणवन्तश्च तथाब्मात्रभक्ष्याः सामुद्रा मीनमकराप्रभृतयो मनस्विनो वाग्ग्मिनश्च, तथास्नेहपानामपि | [ इसलिये ] हे सोम्य ! मन अन्नमय है, प्राण जलमय है और वाक् तेजोमयी है।<br><br>शङ्का—किंतु केवल अन्न भक्षण करनेवाले चूहे आदि वाक्युक्त और प्राणवान् देखे जाते हैं तथा समुद्रमें रहनेवाले केवल जलमात्र भक्षण करनेवाले मत्स्य एवं मकर आदि मन और वाणीसे युक्त होते हैं; इसी प्रकार घृतादि न खाने- |
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खण्ड ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६२७
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
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| प्राणवत्त्वं मनस्वित्वं चानुमेयम्; | वालोंका भी प्राणवत्त्व और मनस्वित्व अनुमान किया जा सकता है। |
| यदि सन्ति, तत्र कथमन्नमयं हि सोम्य मन इत्याद्युच्यते ? | जब ऐसे भी जीव हैं तो 'हे सोम्य ! मन अन्नमय है, इत्यादि कथन कैसे किया जाता है ? |
| नैष दोषः, सर्वस्य त्रिवृत्कृतत्वात्सर्वत्र सर्वोपपत्तेः; न ह्यत्रिवृतकृतमन्नमश्नाति कश्चित्, आपो वात्रिवृत्कृताः पीयन्ते, तेजो वात्रिवृत्कृतमश्नाति कश्चिदित्यन्नादानामाखुप्रभृतीनां वाग्मित्वं प्राणवत्त्वं चेत्याद्यविरुद्धम् । | **समाधान—**यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि सब कुछ त्रिवृत्कृत होनेके कारण सबका सब वस्तुओंमें होना सम्भव है। कोई भी जीव अत्रिवृत्कृत अन्न भक्षण नहीं करता, न अत्रिवृतकृत जल ही पीया जाता है और न कोई अत्रिवृत्कृत तेजको ही खाता है। इसीसे अन्नादि भक्षण करने वाले चूहे आदिका वाक्युक्त और प्राणयुक्त होना आदि विरुद्ध नहीं है ! |
| इत्येवं प्रत्यायितः श्वेतकेतुराह भूय एव पुनरेव मा मां भगवान्न्नमयं हि सोम्य मन इत्यादि विज्ञापयतु दृष्टान्तेनावगमयतु । नाद्यापि ममास्मिन्नर्थे सम्यङ् निश्चयो जातः। यस्मात्तेजोऽबन्नमयत्वेनाविशिष्टे देह एकस्मिन्नुपयुज्यमानान्न्यन्नाप्स्नेहजातान्य- | इस प्रकार प्रतीति कराये हुए श्वेतकेतुने कहा – 'हे भगवन् ! 'अन्नमयं हि सोम्य मनः' इत्यादि कथनको आप मुझे फिर समझाइये—इसे दृष्टान्त देकर मुझे फिर हृदयङ्गम कराइये। इस विषयमें अभीतक मेरा ठीक निश्चय नहीं हुआ।' क्योंकि तेज, जल और अन्नमयरूपसे एक देहमें कोई विशेषता न होनेपर भी एक ही देहमें उपयोग किये हुए अन्न, जल |
६२८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ६
६२८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ६
| निष्ठधातुरूपेण मनःप्राणवाच उपचिन्वन्ति स्वजात्यनतिक्रमेणेति दुर्विज्ञेयमित्यभिप्रायः; अतो भूय एवेत्याद्याह । <br><br> तमेवमुक्तवन्तं तथास्तु सोम्येति होवाच पिता—शृण्वत्र दृष्टान्तं यथैतदुपपद्यते यत्पृच्छसि ॥ ४ ॥ | और स्नेह आदि अपनी जातिका अतिक्रम न करते हुए सूक्ष्मतम-रूपसे मन, प्राण और वाक्का पोषण करते हैं—यह जानना बहुत कठिन है—ऐसा उसका अभिप्राय है । इसीसे उसने 'भूय एव' इत्यादि कहा है । <br><br> इस प्रकार कहनेवाले उस (श्वेतकेतु) से पिताने कहा—'हे सोम्य ! अच्छा, जो कुछ तू पूछता है वह जिस प्रकार उपपन्न हो सकता है इस विषयमें दृष्टान्त श्रवण कर' ॥ ४ ॥ |
— : ० : —
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठाध्याये पञ्चमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ५ ॥
षष्ठ खण्ड
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अन्न आदिका सूक्ष्म भाग ही मन आदि होता है
दध्नः सोम्य मध्यमानस्य योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति तत्सर्पिर्भवति ॥ १ ॥
हे सोम्य ! मथे जाते हुए दहीका जो सूक्ष्म भाग होता है वह ऊपर इकट्ठा हो जाता है; वह घृत होता है ॥ १ ॥
| दध्नः सोम्य मध्यमानस्य योऽणिमाणुभावः स ऊर्ध्वः समुदीषति संभूयोर्ध्वं नवनीतभावेन गच्छति तत्सर्पिर्भवति ॥ १ ॥ | हे सोम्य ! मथे जाते हुए दहीका जो अणिमा—सूक्ष्मांश होता है वह 'ऊर्ध्वः समुदीषति'—इकट्ठा होकर नवनीतरूपसे ऊपर आ जाता है। वह घृत होता है ॥ १ ॥ |
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| यथायं दृष्टान्तः— | जैसा कि यह दृष्टान्त है— |
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एवमेव खलु सोम्यान्नस्याश्यमानस्य योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति तन्मनो भवति ॥ २ ॥
उसी प्रकार हे सोम्य ! खाये हुए अन्नका जो सूक्ष्म अंश होता है वह सम्यक् प्रकारसे ऊपर आ जाता है, वह मन होता है ॥ २ ॥
| एवमेव खलु सोम्यान्नस्यौदनादेरश्यमानस्य भुज्यमानस्यौदर्येणाग्निना वायुसहितेन खजेनेव मध्यमानस्य योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति;तन्मनो भवति, मनो- | उसी प्रकार हे सोम्य ! अश्यमान अर्थात् भक्षण किये जाते हुए भात आदि अन्नका जो सूक्ष्म भाग होता है वह मथानीके समान वायुसहित जठराग्निद्वारा मथे जानेपर ऊपर आ जाता है, वह |
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६३० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ६
६३० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ६
| ऽवयवैः सह संभूय मन उपचिनोतीत्येतत् ॥ २ ॥ | मन होता है, अर्थात् मनके अवयवोंके साथ मिलकर मनकी पुष्टि करता है ॥ २ ॥ |
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—: ॐ :--
| तथा— | तथा— |
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अपाꣳसोम्य पीयमानानां योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति स प्राणो भवति ॥ ३ ॥
हे सोम्य ! पीये हुए जलका जो सूक्ष्म भाग होता है वह इकट्ठा होकर ऊपर आ जाता है, वह प्राण होता है ॥ ३ ॥
| अपां सोम्य पीयमानानां योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति स प्राणो भवतीति ॥ ३ ॥ | हे सोम्य ! पीये हुए जलका जो सूक्ष्म भाग होता है वह इकट्ठा होकर ऊपर आ जाता है; वह प्राण होता है—ऐसा [ आरुणिने कहा ] ॥३॥ |
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| एवमेव खलु— | ठीक इसी प्रकार— |
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तेजसः सोम्याश्यमानस्य योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति सा वाग्भवति ॥ ४ ॥
हे सोम्य ! भक्षण किये हुए तेजका जो सूक्ष्म भाग होता है वह इकट्ठा होकर ऊपर आ जाता है और वह वाणी होता है ॥ ४ ॥
| सोम्य तेजसोऽश्यमानस्य योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति सा वाग्भवति ॥ ४ ॥ | हे सोम्य ! भक्षण किये हुए तेजका जो सूक्ष्म अंश होता है वह इकट्ठा होकर ऊपर आ जाता है और वह वाणी होता है ॥४॥ |
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खण्ड ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६३१
अन्नमयꣳहि सोम्य मन आपोमयः प्राणस्ते-
जोमयी वागिति भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति
तथा सोम्येति होवाच ॥ ५ ॥
[ इस प्रकार ] हे सोम्य ! मन अन्नमय है, प्राण जलमय है और वाणी तेजोमयी है—ऐसा [ आरुणिने कहा ] । [ तब श्वेतकेतु बोला— ] 'भगवन् ! मुझे फिर समझाइये' इसपर आरुणिने कहा—'सोम्य ! अच्छा' ॥ ५ ॥
| अन्नमयं हि सोम्य मन आपोमयः प्राणस्तेजोमयी वागिति । युक्तमेव मयोक्तमित्यभिप्रायः । अतोऽप्तेजसोरस्त्वेतत्सर्वमेवम्, मनस्त्वन्नमयमित्यत्र नैकान्तेन मम निश्चयो जातः । अतो भूय एव मा भगवान्मनसोऽन्नमयत्वं दृष्टान्तेन विज्ञापयत्विति । तथा सोम्येति होवाच पिता ॥ ५ ॥ | हे सोम्य ! मन अन्नमय है, प्राण जलमय है और वाक् तेजोमयी है—इस प्रकार मेरा यह कथन ठीक ही है—ऐसा इसका अभिप्राय है [ इसपर श्वेतकेतु बोला— ] आपके कथनानुसार जल और तेजके विषयमें तो भले ही सब कुछ ऐसा हो हो; किंतु अभीतक मुझे इस बातका पूरा निश्चय नहीं हुआ कि मन अन्नमय है । अतः हे भगवन् ! मुझे मनका अन्नमयत्व फिर दृष्टान्तद्वारा समझाइये ।' तब पिताने कहा—'सोम्य ! अच्छा' ॥५॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठाध्याये
षष्ठखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ६ ॥
सप्तम खण्ड
षोडशकलाविशिष्ट पुरुषका उपदेश
| अन्नस्य भुक्तस्य योऽणिष्ठो धातुः, स मनसि शक्तिमधात् । सान्नोपचिता मनसः शक्तिः षोडशधा प्रविभज्य पुरुषस्य कलात्वेन निर्दिदिक्षिता । तया मनस्यन्नोपचितया शक्त्या षोडशधा प्रविभक्तया संयुक्तस्तद्वान्कार्यकरणसंघातलक्षणो जीवविशिष्टः पुरुषः षोडशकल उच्यते; यस्यां सत्यां द्रष्टा श्रोता मन्ता बोद्धा कर्ता विज्ञाता सर्वक्रियासमर्थः पुरुषो भवति; हीयमानायां च यस्यां सामर्थ्यहानिः। वक्ष्यति च—"अथान्नस्यायैद्रष्टा" (छा० उ० ७ । ९ । १) इत्यादि । सर्वस्य कार्यकारणस्य सामर्थ्यं मनःकृतमेव । मानसेन हि बलेन | खाये हुए अन्नका जो सूक्ष्मतम अंश था उसने मनमें शक्तिका संचार किया । अन्नद्वारा सम्पन्न हुई उस मनकी शक्तिका सोलह प्रकारसे विभाग कर पुरुषकी कलारूपसे निर्देश करना इष्ट है। मनमें अन्नके द्वारा उपचित तथा सोलह भागोंमें विभक्त हुई उस शक्तिसे संयुक्त उस शक्तिवाला देह और इन्द्रियोंका संघात रूप जीवविशिष्ट पुरुष षोडशकल (सोलह कलाओंवाला) कहा जाता है; जिस शक्तिके रहनेपर ही पुरुष द्रष्टा, श्रोता, मन्ता, बोद्धा, कर्ता, विज्ञाता तथा समस्त क्रियाओंमें समर्थ होता है और जिसके क्षीण होनेपर उसकी शक्तिका ह्रास हो जाता है। आगे चलकर श्रुति यह कहेगी भी कि "जिसको अन्नकी प्राप्ति होती है वही पुरुष [ शक्ति सम्पन्न होनेसे ] द्रष्टा है" सम्पूर्ण भूत और इन्द्रियोंकी शक्ति मनके ही द्वारा है । लोकमें मनोबलसे सम्पन्न |
खण्ड ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६३३
| संपन्ना बलिनो दृश्यन्ते लोके ध्यानाहाराश्च केचित्, अन्नस्य सर्वात्मकत्वात्, अतोऽन्नकृतं मानसं वीर्यम् । | पुरुष बलवान् देखे जाते हैं तथा कोई-कोई केवल ध्यानाहारी भी देखे जाते हैं, क्योंकि अन्न सर्वरूप है; अतः मानसिक बल अन्नसे ही होता है । |
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षोडशकलः सोम्य पुरुषः पञ्चदशाहानि माशीः काममपः पिबापोमयः प्राणो न पिबतो विच्छेत्स्यत इति ॥ १ ॥
हे सोम्य ! पुरुष सोलह कलाओंवाला है । तू पंद्रह दिन भोजन मत कर, केवल यथेच्छ जलपान कर । प्राण जलमय है; इसलिये जल पीते रहनेसे उसका नाश नहीं होगा ॥ १ ॥
| षोडश कला यस्य पुरुषस्य सोऽयं षोडशकलःपुरुषः; एतच्चेत्प्रत्यक्षीकर्तुमिच्छसि पञ्चदशसंख्याकान्यहानि माशीरशनं मा कार्षीः, काममिच्छातोऽपः पिब; यस्मान्न पिबतोऽपस्ते प्राणो विच्छेत्स्यते विच्छेदमापत्स्यते यस्मादापोमयोऽब्विकारः प्राण इत्यवोचाम । न हि कार्यं स्वकारणोपष्टम्भमन्तरेणाविभ्रंशमानं स्थातुमुत्सहते ॥ १ ॥ | सोलह कलाएँ जिस पुरुषकी हैं वह पुरुष सोलह कलाओंवाला है । यदि तू इस बातको प्रत्यक्ष करना चाहता हो तो पंद्रह दिनतक भोजन मत कर, केवल यथेच्छ जलपान कर, क्योंकि जल पीते रहनेसे तेरा प्राण विच्छिन्न नहीं होगा अर्थात् नाशको प्राप्त नहीं होगा, कारण पहले हम कह चुके हैं कि प्राण जलमय यानी जलका विकार है; और कोई भी कार्य अपने कारणके आश्रय बिना अविनष्टरूपसे स्थित नहीं रह सकता ॥ १ ॥ |
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३३४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ३३४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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स ह पञ्चदशाहानि नाशाथ हैनमुपससाद किं ब्रवीमि भो इत्यृचः सोम्य यजूंषि सामानीति स होवाच न वै मा प्रतिभान्ति भो इति ॥ २ ॥
उसने पंद्रह दिन भोजन नहीं किया । तत्पश्चात् वह उस (आरुणि) के पास आया [और बोला—] 'भगवन् ! क्या बोलूँ ?' [पिताने कहा—] हे सोम्य ! ऋक्, यजुः और सामका पाठ करो—तब उसने कहा—'भगवन् ! मुझे उनका प्रतिभान (स्फुरण) नहीं होता' ॥ २ ॥
| स हैवं श्रुत्वा मनसोऽन्नमयत्वं प्रत्यक्षीकर्तुमिच्छन्पञ्चदशाहानि नाशाशनं न कृतवान् । अथ षोडशेऽहनि हैनं पितरमुपससादोपगतवानुपगम्य चोवाच-किं ब्रवीमि भो इति । इतर आह—ऋचः सोम्य यजूंषि सामान्यधीष्वेति । एवमुक्तः पित्राह-न वै मा मामृगादीनि प्रतिभान्ति मम मनसि न दृश्यन्त इत्यर्थो हे भो भगवन्निति ॥ २ ॥ | उसने ऐसा सुनकर मनकी अन्नमयताको प्रत्यक्ष करनेकी इच्छासे पंद्रह दिन भोजन नहीं किया । फिर सोलहवें दिन वह अपने पिताके पास आया और आकर बोला—'पिताजी ! क्या बोलूँ ?' इसपर पिताने कहा—'हे सोम्य ! ऋक्, यजुः तथा सामवेदके मन्त्रोंका पाठ करो ।' पिताके इस प्रकार कहनेपर वह बोला—'हे भगवन् ! मुझे ऋगादिका प्रतिभान नहीं होता; तात्पर्य यह है कि मेरे मनमें उनकी प्रतीति नहीं होती' ॥ २ ॥ |
| एवमुक्तवन्तं पित्राह—शृणु तत्र कारणं येन ते तान्यृगादीनि न प्रतिभान्तीति । | इस प्रकार कहते हुए उस पुत्रसे पिताने कहा--'इस सम्बन्धमें तू कारण सुन, जिससे कि तुझे उन ऋगादिका प्रतिभान नहीं होता ।' |
खण्ड ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६३५
तꣳहोवाच यथा सोम्य महतोऽभ्याहितस्यैकोऽङ्गारः खद्योतमात्रः परिशिष्टः स्यात्तेन ततोऽपि न बहु दहेदेवꣳसोम्य ते षोडशानां कलानामेका कलातिशिष्टा स्यात्तयैतर्हि वेदान्नानुभवस्यशानाथ मे विज्ञास्यसीति ॥ ३ ॥
वह उससे बोला—'हे सोम्य ! जिस प्रकार बहुत-से ईंधनसे प्रज्वलित हुए अग्निका एक जुगनूके बराबर अङ्गारा रह जाय तो वह उससे अधिक दाह नहीं कर सकता, उसी प्रकार हे सोम्य ! तेरी सोलह कलाओंमेंसे केवल एक कला रह गयी है। उसके द्वारा इस समय तू वेदका अनुभव नहीं कर सकता। अच्छा, अब भोजन कर; तब तू मेरी बात समझ जायगा' ॥ ३ ॥
| संस्कृत-भाष्य | भाषानुवाद |
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| तं होवाच यथा लोके हे सोम्य महतो महत्परिमाणस्याभ्याहितस्योपचितस्येन्धनैरग्नेरेकोऽङ्गारः खद्योतमात्रः खद्योतपरिमाणः शान्तस्य परिशिष्टोऽवशिष्टः स्याद्भवेत्, तेनाङ्गारेण ततोऽपि तत्परिमाणादीषदपि न बहु दहेत्; एवमेव खलु सोम्य ते तवान्नोपचितानां षोडशानां कलानामेका कलावयवोऽतिशिष्टावशिष्टा स्यात्, तया त्वं खद्योतमात्राङ्गारतुल्ययैतर्हीदानीं वेदान्नानुभवसि न प्रतिपद्यसे श्रुत्वा च मे मम | उससे आरुणिने कहा—'हे सोम्य ! लोकमें जिस प्रकार ईंधनसे आधान किये हुए—बढ़ाये हुए बहुत बड़े परिमाणवाले अग्निका, उसके शान्त हो जानेपर कोई खद्योतमात्र—खद्योतके बराबर परिमाणवाला अंगारा रह जायगा तो उस अंगारेके द्वारा उससे—उसके परिमाणसे थोड़ा-सा भी अधिक दाह नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार हे सोम्य ! तेरी अन्नसे उपचित हुई सोलह कलाओंमेंसे केवल एक कला—एक भाग रह गयी है। उस खद्योतमात्र अंगारके समान एक कलासे तू इस समय वेदोंका अनुभव नहीं कर सकता—इस समय तुझे उनका ज्ञान |
६३६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ६३६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| वाचमथाशेषं विज्ञास्यस्यशान भुङ्क्ष्व तावत् ॥ ३ ॥ | न हो सकेगा । अब पहले तू भोजन कर तब मेरा वचन सुनकर तू सब जान जायगा ॥ ३ ॥ |
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स हाशाथ हैनमुपससाद तꣳह यत्किं च पप्रच्छ सर्वꣳह प्रतिपेदे ॥ ४ ॥
उसने भोजन किया और फिर उसके (आरुणिके) पास आया । तब उसने जो कुछ पूछा वह सब उसे उपस्थित हो गया ॥ ४ ॥
| स ह तथैवाश भुक्तवान् ।<br><br>अथानन्तरं हैनं पितरं शुश्रूषुरुपससाद । तं होपगतं पुत्रं यत्किंचर्गादिषु पप्रच्छ ग्रन्थरूपमर्थजातं वा पिता, स श्वेतकेतुः सर्वं ह तत्प्रतिपेद ऋगाद्यर्थतो ग्रन्थतश्च ॥ ४ ॥ | उसने उसी प्रकार (पिताके कथनानुसार) भोजन किया ।<br><br>उसके पश्चात् वह सुननेकी इच्छासे उस अपने पिताके समीप आया । उसने पास आये हुए उस पुत्रसे पिताने ऋगादिमें जो कुछ ग्रन्थरूप अथवा अर्थसमूह पूछा वह सब ऋगादि श्वेतकेतुने ग्रन्थतः तथा अर्थतः जान लिया ॥ ४ ॥ |
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तꣳहोवाच यथा सोम्य महतोऽभ्याहितस्यैकमङ्गारं खद्योतमात्रं परिशिष्टं तं तृणैरुपसमाधाय प्राज्वलयेत्तेन ततोऽपि बहु दहेत् ॥ ५ ॥
उससे [आरुणिने] कहा—हे सोम्य ! जिस प्रकार बहुत-से ईंधनसे बढ़े हुए अग्निका एक खद्योतमात्र अङ्गारा रह जाय और उसे तृणसे सम्पन्न कर प्रज्वलित कर दिया जाय तो वह उसकी (अपने पूर्व परिमाणकी) अपेक्षा भी अधिक दाह कर सकता है' ॥ ५ ॥
खण्ड ७ ] शाङ्करभाष्यार्थं ६३७
| तं होवाच पुनः पिता यथा । सोम्य महतोऽभ्याहितस्येत्यादि समानम्, एकमङ्गारं शान्तस्याग्नेः खद्योतमात्रं परिशिष्टं तृणैश्चूर्णैश्चोपसमाधाय प्राज्वलयेद्वर्धयेत् । तेनेद्धेनाङ्गारेण ततोऽपि पूर्वपरिमाणाद्बहु दहेत् ॥ ५ ॥ | फिर उससे पिताने कहा—'हे सोम्य ! जिस प्रकार—'महतोऽभ्याहितस्य' इत्यादि पदोंका अर्थ पूर्ववत् समझना चाहिये—शान्त हुए अग्निका एक खद्योतमात्र अंगारा रह जाय और उसे तृण तथा [लकड़ियोंके ] चूरेसे सम्पन्न करके प्रज्वलित किया जाय अर्थात् बढ़ाया जाय तो वह उस दीप्त हुए अंगारेसे उस अपने पूर्व परिमाणकी अपेक्षा भी अधिक दाह कर सकता है' ॥ ५ ॥ |
<div align="center">— : ० : —</div>एवꣳ सोम्य ते षोडशानां कलानामेका कलातिशिष्टाभूत्सान्नेनोपसमाहिता प्राज्वाली तयैतर्हि वेदाननुभवस्यन्नमयꣳहि सोम्य मन आपोमयः प्राणस्तेजोमयी वागिति तद्धास्य विजज्ञाविति विजज्ञाविति ॥ ६ ॥
'इसी प्रकार हे सोम्य ! तेरी सोलह कलाओंमेंसे एक कला अवशिष्ट रह गयी थी । वह अन्नद्वारा, वृद्धिको प्राप्त अर्थात् प्रज्वलित कर दी गयी । अब उसीसे तू वेदोंका अनुभव कर रहा है । अतः हे सोम्य ! मन अन्नमय है, प्राण जलमय है और वाक् तेजोमयी है।' इस प्रकार [ श्वेतकेतु ] उसके इस कथनको विशेषरूपसे समझ गया, समझ गया ॥ ६ ॥
| एवं सोम्य ते षोडशानामन्नकलानां सामर्थ्यरूपाणामेका | इसी प्रकार हे सोम्य ! तेरी सामर्थ्यरूपा अन्नकी सोलह |