छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 627, कुल 978 में से
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पञ्चम खण्ड
अन्न आदिके त्रिविध परिणाम
अन्नमशितं त्रेधा विधीयते तस्य यः स्थविष्ठो धातुस्तत्पुरीषं भवति यो मध्यमस्तन्मांसं योऽणिष्ठस्तन्मनः ॥ १ ॥
खाया हुआ अन्न तीन प्रकारका हो जाता है । उसका जो अत्यन्त स्थूल भाग होता है, वह मल हो जाता है, जो मध्यम भाग है वह मांस हो जाता है और जो अत्यन्त सूक्ष्म होता है वह मन हो जाता है ॥ १ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-व्याख्या |
|---|---|
| अन्नमशितं भुक्तं त्रेधा विधीयते जाठरेणाग्निना पच्यमानं त्रिधा विभज्यते । कथम् ? तस्यान्नस्य त्रिधा विधीयमानस्य यः स्थविष्ठः स्थूलतमो धातुः स्थूलतमं वस्तु विभक्तस्य स्थूलोऽंशः, तत्पुरीषं भवति; यो मध्यमोऽंशो धातुरन्नस्य, तद्रसादिक्रमेण परिणम्य मांसं भवति; योऽणिष्ठोऽणुतमो धातुः, स ऊर्ध्वं हृदयं प्राप्य सूक्ष्मासु हिताख्यासु नाडीष्वनुप्रविश्य वागादिकरणसंघातस्य | खाया हुआ अन्न तीन प्रकारका हो जाता है अर्थात् जठराग्निद्वारा पचाये जानेपर वह तीन भागोंमें विभक्त हो जाता है । सो किस प्रकार ?—तीन भागोंमें विभक्त होते हुए उस अन्नका जो स्थविष्ठ-स्थूलतम धातु—सबसे स्थूल वस्तु यानी विभक्त हुए अन्नका जो स्थूल अंश होता है वह मल हो जाता है । तथा जो अन्नका मध्यम अंश यानी मध्यम धातु होता है वह रसादि क्रमसे परिणत होकर मांस हो जाता है और जो अणिष्ठ—अणुतम धातु होता है वह ऊपरको ओर हृदयमें पहुँचकर हिता नामकी सूक्ष्म नाड़ीमें प्रवेश कर वायु आदि |