भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 629, कुल 978 में से

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पृष्ठ 629

खण्ड ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६२५


पीया हुआ जल तीन प्रकारका हो जाता है। उसका जो स्थूलतम भाग होता है वह मूत्र हो जाता है, जो मध्यभाग है वह रक्त हो जाता है और जो सूक्ष्मतम भाग है वह प्राण हो जाता है ॥ २ ॥

| आपः पीतास्त्रेधा विधीयन्ते ।<br><br>तासां यः स्थविष्ठो धातुः,<br><br>तन्मूत्रं भवति। यो मध्यमः,<br><br>तल्लोहितं भवति। योऽणिष्ठः,<br><br>स प्राणो भवति। वक्ष्यति हि<br>'आपोमयः प्राणो न पिबतो<br>विच्छेत्स्यते' इति ॥ २ ॥ | पीया हुआ जल तीन प्रकारका हो जाता है। उसका जो स्थूलतम भाग होता है वह मूत्र हो जाता है, जो मध्यम भाग है वह रक्त हो जाता है और जो सूक्ष्मतम भाग है वह प्राण हो जाता है। आगे श्रुति यह कहेगी भी कि 'प्राण जलमय है, जलपान करते हुए तेरा प्राण विच्छिन्न नहीं होगा' ॥ २ ॥ |

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तथा—ऐसे ही—

तेजोऽशितं त्रेधा विधीयते तस्य यः स्थविष्ठो धातुस्तदस्थि भवति यो मध्यमः स मज्जा योऽणिष्ठः सा वाक् ॥ ३ ॥

खाया हुआ [ घृतादि ] तेज तीन प्रकारका हो जाता है। उसका जो स्थूलतम भाग होता है वह हड्डी हो जाता है, जो मध्यम भाग है वह मज्जा हो जाता है और जो सूक्ष्मतम भाग है वह वाक् हो जाता है ॥ ३ ॥

| तेजोऽशितं तैलघृतादि भक्षितं त्रेधा विधीयते। तस्य यः स्थविष्ठो धातुः, तदस्थि भवति। | खाया हुआ तेज अर्थात् भक्षण किया हुआ तैल-घृत आदि तीन प्रकारका हो जाता है। उसका जो स्थूलतम अंश होता है वह हड्डी हो |