भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 630, कुल 978 में से

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पृष्ठ 630

३२६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६


यो मध्यमः, स मज्जास्थ्यन्तर्गतः स्नेहः । योऽणिष्ठः, सा वाक् । तैलघृतादिभक्षणाद्धि वाग्विशदा भाषणे समर्था भवतीति प्रसिद्धं लोके ॥ ३ ॥जाता है, जो मध्यम भाग है वह मज्जा—हड्डीके भीतर रहनेवाला स्निग्ध पदार्थ हो जाता है और जो सूक्ष्मतम अंश है वह वाक् हो जाता है। तैल-घृत आदिके भक्षणसे ही वाणी विशद अर्थात् भाषणमें समर्थ होती है—ऐसा लोकमें प्रसिद्ध ही है ॥ ३ ॥
यत एवम्—। क्योंकि ऐसा है—

---:ॐ:---

अन्नमयँ हि सोम्य मन आपोमयः प्राणस्तेजोमयी वागिति भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ४ ॥

[ इसलिये ] हे सोम्य ! मन अन्नमय है, प्राण जलमय है और वाक् तेजोमयी है। ऐसा कहे जानेपर श्वेतकेतु बोला—'भगवन् ! आप मुझे फिर समझाइये।' तब आरुणिने 'अच्छा सोम्य !' ऐसा कहा ॥ ४ ॥

अन्नमयं हि सोम्य मन आपोमयः प्राणस्तेजोमयी वाक् ।<br><br>ननु केवलान्नभक्षिण आखुप्रभृतयो वाग्ग्मिनः प्राणवन्तश्च तथाब्मात्रभक्ष्याः सामुद्रा मीनमकराप्रभृतयो मनस्विनो वाग्ग्मिनश्च, तथास्नेहपानामपि[ इसलिये ] हे सोम्य ! मन अन्नमय है, प्राण जलमय है और वाक् तेजोमयी है।<br><br>शङ्का—किंतु केवल अन्न भक्षण करनेवाले चूहे आदि वाक्युक्त और प्राणवान् देखे जाते हैं तथा समुद्रमें रहनेवाले केवल जलमात्र भक्षण करनेवाले मत्स्य एवं मकर आदि मन और वाणीसे युक्त होते हैं; इसी प्रकार घृतादि न खाने-