छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 631, कुल 978 में से
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खण्ड ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६२७
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
|---|---|
| प्राणवत्त्वं मनस्वित्वं चानुमेयम्; | वालोंका भी प्राणवत्त्व और मनस्वित्व अनुमान किया जा सकता है। |
| यदि सन्ति, तत्र कथमन्नमयं हि सोम्य मन इत्याद्युच्यते ? | जब ऐसे भी जीव हैं तो 'हे सोम्य ! मन अन्नमय है, इत्यादि कथन कैसे किया जाता है ? |
| नैष दोषः, सर्वस्य त्रिवृत्कृतत्वात्सर्वत्र सर्वोपपत्तेः; न ह्यत्रिवृतकृतमन्नमश्नाति कश्चित्, आपो वात्रिवृत्कृताः पीयन्ते, तेजो वात्रिवृत्कृतमश्नाति कश्चिदित्यन्नादानामाखुप्रभृतीनां वाग्मित्वं प्राणवत्त्वं चेत्याद्यविरुद्धम् । | **समाधान—**यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि सब कुछ त्रिवृत्कृत होनेके कारण सबका सब वस्तुओंमें होना सम्भव है। कोई भी जीव अत्रिवृत्कृत अन्न भक्षण नहीं करता, न अत्रिवृतकृत जल ही पीया जाता है और न कोई अत्रिवृत्कृत तेजको ही खाता है। इसीसे अन्नादि भक्षण करने वाले चूहे आदिका वाक्युक्त और प्राणयुक्त होना आदि विरुद्ध नहीं है ! |
| इत्येवं प्रत्यायितः श्वेतकेतुराह भूय एव पुनरेव मा मां भगवान्न्नमयं हि सोम्य मन इत्यादि विज्ञापयतु दृष्टान्तेनावगमयतु । नाद्यापि ममास्मिन्नर्थे सम्यङ् निश्चयो जातः। यस्मात्तेजोऽबन्नमयत्वेनाविशिष्टे देह एकस्मिन्नुपयुज्यमानान्न्यन्नाप्स्नेहजातान्य- | इस प्रकार प्रतीति कराये हुए श्वेतकेतुने कहा – 'हे भगवन् ! 'अन्नमयं हि सोम्य मनः' इत्यादि कथनको आप मुझे फिर समझाइये—इसे दृष्टान्त देकर मुझे फिर हृदयङ्गम कराइये। इस विषयमें अभीतक मेरा ठीक निश्चय नहीं हुआ।' क्योंकि तेज, जल और अन्नमयरूपसे एक देहमें कोई विशेषता न होनेपर भी एक ही देहमें उपयोग किये हुए अन्न, जल |