भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 632

६२८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ६


| निष्ठधातुरूपेण मनःप्राणवाच उपचिन्वन्ति स्वजात्यनतिक्रमेणेति दुर्विज्ञेयमित्यभिप्रायः; अतो भूय एवेत्याद्याह । <br><br> तमेवमुक्तवन्तं तथास्तु सोम्येति होवाच पिता—शृण्वत्र दृष्टान्तं यथैतदुपपद्यते यत्पृच्छसि ॥ ४ ॥ | और स्नेह आदि अपनी जातिका अतिक्रम न करते हुए सूक्ष्मतम-रूपसे मन, प्राण और वाक्का पोषण करते हैं—यह जानना बहुत कठिन है—ऐसा उसका अभिप्राय है । इसीसे उसने 'भूय एव' इत्यादि कहा है । <br><br> इस प्रकार कहनेवाले उस (श्वेतकेतु) से पिताने कहा—'हे सोम्य ! अच्छा, जो कुछ तू पूछता है वह जिस प्रकार उपपन्न हो सकता है इस विषयमें दृष्टान्त श्रवण कर' ॥ ४ ॥ |


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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठाध्याये पञ्चमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ५ ॥