छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 636, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तम खण्ड
षोडशकलाविशिष्ट पुरुषका उपदेश
| अन्नस्य भुक्तस्य योऽणिष्ठो धातुः, स मनसि शक्तिमधात् । सान्नोपचिता मनसः शक्तिः षोडशधा प्रविभज्य पुरुषस्य कलात्वेन निर्दिदिक्षिता । तया मनस्यन्नोपचितया शक्त्या षोडशधा प्रविभक्तया संयुक्तस्तद्वान्कार्यकरणसंघातलक्षणो जीवविशिष्टः पुरुषः षोडशकल उच्यते; यस्यां सत्यां द्रष्टा श्रोता मन्ता बोद्धा कर्ता विज्ञाता सर्वक्रियासमर्थः पुरुषो भवति; हीयमानायां च यस्यां सामर्थ्यहानिः। वक्ष्यति च—"अथान्नस्यायैद्रष्टा" (छा० उ० ७ । ९ । १) इत्यादि । सर्वस्य कार्यकारणस्य सामर्थ्यं मनःकृतमेव । मानसेन हि बलेन | खाये हुए अन्नका जो सूक्ष्मतम अंश था उसने मनमें शक्तिका संचार किया । अन्नद्वारा सम्पन्न हुई उस मनकी शक्तिका सोलह प्रकारसे विभाग कर पुरुषकी कलारूपसे निर्देश करना इष्ट है। मनमें अन्नके द्वारा उपचित तथा सोलह भागोंमें विभक्त हुई उस शक्तिसे संयुक्त उस शक्तिवाला देह और इन्द्रियोंका संघात रूप जीवविशिष्ट पुरुष षोडशकल (सोलह कलाओंवाला) कहा जाता है; जिस शक्तिके रहनेपर ही पुरुष द्रष्टा, श्रोता, मन्ता, बोद्धा, कर्ता, विज्ञाता तथा समस्त क्रियाओंमें समर्थ होता है और जिसके क्षीण होनेपर उसकी शक्तिका ह्रास हो जाता है। आगे चलकर श्रुति यह कहेगी भी कि "जिसको अन्नकी प्राप्ति होती है वही पुरुष [ शक्ति सम्पन्न होनेसे ] द्रष्टा है" सम्पूर्ण भूत और इन्द्रियोंकी शक्ति मनके ही द्वारा है । लोकमें मनोबलसे सम्पन्न |