छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 635, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६३१
अन्नमयꣳहि सोम्य मन आपोमयः प्राणस्ते-
जोमयी वागिति भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति
तथा सोम्येति होवाच ॥ ५ ॥
[ इस प्रकार ] हे सोम्य ! मन अन्नमय है, प्राण जलमय है और वाणी तेजोमयी है—ऐसा [ आरुणिने कहा ] । [ तब श्वेतकेतु बोला— ] 'भगवन् ! मुझे फिर समझाइये' इसपर आरुणिने कहा—'सोम्य ! अच्छा' ॥ ५ ॥
| अन्नमयं हि सोम्य मन आपोमयः प्राणस्तेजोमयी वागिति । युक्तमेव मयोक्तमित्यभिप्रायः । अतोऽप्तेजसोरस्त्वेतत्सर्वमेवम्, मनस्त्वन्नमयमित्यत्र नैकान्तेन मम निश्चयो जातः । अतो भूय एव मा भगवान्मनसोऽन्नमयत्वं दृष्टान्तेन विज्ञापयत्विति । तथा सोम्येति होवाच पिता ॥ ५ ॥ | हे सोम्य ! मन अन्नमय है, प्राण जलमय है और वाक् तेजोमयी है—इस प्रकार मेरा यह कथन ठीक ही है—ऐसा इसका अभिप्राय है [ इसपर श्वेतकेतु बोला— ] आपके कथनानुसार जल और तेजके विषयमें तो भले ही सब कुछ ऐसा हो हो; किंतु अभीतक मुझे इस बातका पूरा निश्चय नहीं हुआ कि मन अन्नमय है । अतः हे भगवन् ! मुझे मनका अन्नमयत्व फिर दृष्टान्तद्वारा समझाइये ।' तब पिताने कहा—'सोम्य ! अच्छा' ॥५॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठाध्याये
षष्ठखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ६ ॥