छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
खण्ड ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६३१
अन्नमयꣳहि सोम्य मन आपोमयः प्राणस्ते-
जोमयी वागिति भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति
तथा सोम्येति होवाच ॥ ५ ॥
[ इस प्रकार ] हे सोम्य ! मन अन्नमय है, प्राण जलमय है और वाणी तेजोमयी है—ऐसा [ आरुणिने कहा ] । [ तब श्वेतकेतु बोला— ] 'भगवन् ! मुझे फिर समझाइये' इसपर आरुणिने कहा—'सोम्य ! अच्छा' ॥ ५ ॥
| अन्नमयं हि सोम्य मन आपोमयः प्राणस्तेजोमयी वागिति । युक्तमेव मयोक्तमित्यभिप्रायः । अतोऽप्तेजसोरस्त्वेतत्सर्वमेवम्, मनस्त्वन्नमयमित्यत्र नैकान्तेन मम निश्चयो जातः । अतो भूय एव मा भगवान्मनसोऽन्नमयत्वं दृष्टान्तेन विज्ञापयत्विति । तथा सोम्येति होवाच पिता ॥ ५ ॥ | हे सोम्य ! मन अन्नमय है, प्राण जलमय है और वाक् तेजोमयी है—इस प्रकार मेरा यह कथन ठीक ही है—ऐसा इसका अभिप्राय है [ इसपर श्वेतकेतु बोला— ] आपके कथनानुसार जल और तेजके विषयमें तो भले ही सब कुछ ऐसा हो हो; किंतु अभीतक मुझे इस बातका पूरा निश्चय नहीं हुआ कि मन अन्नमय है । अतः हे भगवन् ! मुझे मनका अन्नमयत्व फिर दृष्टान्तद्वारा समझाइये ।' तब पिताने कहा—'सोम्य ! अच्छा' ॥५॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठाध्याये
षष्ठखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ६ ॥
सप्तम खण्ड
षोडशकलाविशिष्ट पुरुषका उपदेश
| अन्नस्य भुक्तस्य योऽणिष्ठो धातुः, स मनसि शक्तिमधात् । सान्नोपचिता मनसः शक्तिः षोडशधा प्रविभज्य पुरुषस्य कलात्वेन निर्दिदिक्षिता । तया मनस्यन्नोपचितया शक्त्या षोडशधा प्रविभक्तया संयुक्तस्तद्वान्कार्यकरणसंघातलक्षणो जीवविशिष्टः पुरुषः षोडशकल उच्यते; यस्यां सत्यां द्रष्टा श्रोता मन्ता बोद्धा कर्ता विज्ञाता सर्वक्रियासमर्थः पुरुषो भवति; हीयमानायां च यस्यां सामर्थ्यहानिः। वक्ष्यति च—"अथान्नस्यायैद्रष्टा" (छा० उ० ७ । ९ । १) इत्यादि । सर्वस्य कार्यकारणस्य सामर्थ्यं मनःकृतमेव । मानसेन हि बलेन | खाये हुए अन्नका जो सूक्ष्मतम अंश था उसने मनमें शक्तिका संचार किया । अन्नद्वारा सम्पन्न हुई उस मनकी शक्तिका सोलह प्रकारसे विभाग कर पुरुषकी कलारूपसे निर्देश करना इष्ट है। मनमें अन्नके द्वारा उपचित तथा सोलह भागोंमें विभक्त हुई उस शक्तिसे संयुक्त उस शक्तिवाला देह और इन्द्रियोंका संघात रूप जीवविशिष्ट पुरुष षोडशकल (सोलह कलाओंवाला) कहा जाता है; जिस शक्तिके रहनेपर ही पुरुष द्रष्टा, श्रोता, मन्ता, बोद्धा, कर्ता, विज्ञाता तथा समस्त क्रियाओंमें समर्थ होता है और जिसके क्षीण होनेपर उसकी शक्तिका ह्रास हो जाता है। आगे चलकर श्रुति यह कहेगी भी कि "जिसको अन्नकी प्राप्ति होती है वही पुरुष [ शक्ति सम्पन्न होनेसे ] द्रष्टा है" सम्पूर्ण भूत और इन्द्रियोंकी शक्ति मनके ही द्वारा है । लोकमें मनोबलसे सम्पन्न |
खण्ड ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६३३
| संपन्ना बलिनो दृश्यन्ते लोके ध्यानाहाराश्च केचित्, अन्नस्य सर्वात्मकत्वात्, अतोऽन्नकृतं मानसं वीर्यम् । | पुरुष बलवान् देखे जाते हैं तथा कोई-कोई केवल ध्यानाहारी भी देखे जाते हैं, क्योंकि अन्न सर्वरूप है; अतः मानसिक बल अन्नसे ही होता है । |
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षोडशकलः सोम्य पुरुषः पञ्चदशाहानि माशीः काममपः पिबापोमयः प्राणो न पिबतो विच्छेत्स्यत इति ॥ १ ॥
हे सोम्य ! पुरुष सोलह कलाओंवाला है । तू पंद्रह दिन भोजन मत कर, केवल यथेच्छ जलपान कर । प्राण जलमय है; इसलिये जल पीते रहनेसे उसका नाश नहीं होगा ॥ १ ॥
| षोडश कला यस्य पुरुषस्य सोऽयं षोडशकलःपुरुषः; एतच्चेत्प्रत्यक्षीकर्तुमिच्छसि पञ्चदशसंख्याकान्यहानि माशीरशनं मा कार्षीः, काममिच्छातोऽपः पिब; यस्मान्न पिबतोऽपस्ते प्राणो विच्छेत्स्यते विच्छेदमापत्स्यते यस्मादापोमयोऽब्विकारः प्राण इत्यवोचाम । न हि कार्यं स्वकारणोपष्टम्भमन्तरेणाविभ्रंशमानं स्थातुमुत्सहते ॥ १ ॥ | सोलह कलाएँ जिस पुरुषकी हैं वह पुरुष सोलह कलाओंवाला है । यदि तू इस बातको प्रत्यक्ष करना चाहता हो तो पंद्रह दिनतक भोजन मत कर, केवल यथेच्छ जलपान कर, क्योंकि जल पीते रहनेसे तेरा प्राण विच्छिन्न नहीं होगा अर्थात् नाशको प्राप्त नहीं होगा, कारण पहले हम कह चुके हैं कि प्राण जलमय यानी जलका विकार है; और कोई भी कार्य अपने कारणके आश्रय बिना अविनष्टरूपसे स्थित नहीं रह सकता ॥ १ ॥ |
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३३४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ३३४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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स ह पञ्चदशाहानि नाशाथ हैनमुपससाद किं ब्रवीमि भो इत्यृचः सोम्य यजूंषि सामानीति स होवाच न वै मा प्रतिभान्ति भो इति ॥ २ ॥
उसने पंद्रह दिन भोजन नहीं किया । तत्पश्चात् वह उस (आरुणि) के पास आया [और बोला—] 'भगवन् ! क्या बोलूँ ?' [पिताने कहा—] हे सोम्य ! ऋक्, यजुः और सामका पाठ करो—तब उसने कहा—'भगवन् ! मुझे उनका प्रतिभान (स्फुरण) नहीं होता' ॥ २ ॥
| स हैवं श्रुत्वा मनसोऽन्नमयत्वं प्रत्यक्षीकर्तुमिच्छन्पञ्चदशाहानि नाशाशनं न कृतवान् । अथ षोडशेऽहनि हैनं पितरमुपससादोपगतवानुपगम्य चोवाच-किं ब्रवीमि भो इति । इतर आह—ऋचः सोम्य यजूंषि सामान्यधीष्वेति । एवमुक्तः पित्राह-न वै मा मामृगादीनि प्रतिभान्ति मम मनसि न दृश्यन्त इत्यर्थो हे भो भगवन्निति ॥ २ ॥ | उसने ऐसा सुनकर मनकी अन्नमयताको प्रत्यक्ष करनेकी इच्छासे पंद्रह दिन भोजन नहीं किया । फिर सोलहवें दिन वह अपने पिताके पास आया और आकर बोला—'पिताजी ! क्या बोलूँ ?' इसपर पिताने कहा—'हे सोम्य ! ऋक्, यजुः तथा सामवेदके मन्त्रोंका पाठ करो ।' पिताके इस प्रकार कहनेपर वह बोला—'हे भगवन् ! मुझे ऋगादिका प्रतिभान नहीं होता; तात्पर्य यह है कि मेरे मनमें उनकी प्रतीति नहीं होती' ॥ २ ॥ |
| एवमुक्तवन्तं पित्राह—शृणु तत्र कारणं येन ते तान्यृगादीनि न प्रतिभान्तीति । | इस प्रकार कहते हुए उस पुत्रसे पिताने कहा--'इस सम्बन्धमें तू कारण सुन, जिससे कि तुझे उन ऋगादिका प्रतिभान नहीं होता ।' |
खण्ड ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६३५
तꣳहोवाच यथा सोम्य महतोऽभ्याहितस्यैकोऽङ्गारः खद्योतमात्रः परिशिष्टः स्यात्तेन ततोऽपि न बहु दहेदेवꣳसोम्य ते षोडशानां कलानामेका कलातिशिष्टा स्यात्तयैतर्हि वेदान्नानुभवस्यशानाथ मे विज्ञास्यसीति ॥ ३ ॥
वह उससे बोला—'हे सोम्य ! जिस प्रकार बहुत-से ईंधनसे प्रज्वलित हुए अग्निका एक जुगनूके बराबर अङ्गारा रह जाय तो वह उससे अधिक दाह नहीं कर सकता, उसी प्रकार हे सोम्य ! तेरी सोलह कलाओंमेंसे केवल एक कला रह गयी है। उसके द्वारा इस समय तू वेदका अनुभव नहीं कर सकता। अच्छा, अब भोजन कर; तब तू मेरी बात समझ जायगा' ॥ ३ ॥
| संस्कृत-भाष्य | भाषानुवाद |
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| तं होवाच यथा लोके हे सोम्य महतो महत्परिमाणस्याभ्याहितस्योपचितस्येन्धनैरग्नेरेकोऽङ्गारः खद्योतमात्रः खद्योतपरिमाणः शान्तस्य परिशिष्टोऽवशिष्टः स्याद्भवेत्, तेनाङ्गारेण ततोऽपि तत्परिमाणादीषदपि न बहु दहेत्; एवमेव खलु सोम्य ते तवान्नोपचितानां षोडशानां कलानामेका कलावयवोऽतिशिष्टावशिष्टा स्यात्, तया त्वं खद्योतमात्राङ्गारतुल्ययैतर्हीदानीं वेदान्नानुभवसि न प्रतिपद्यसे श्रुत्वा च मे मम | उससे आरुणिने कहा—'हे सोम्य ! लोकमें जिस प्रकार ईंधनसे आधान किये हुए—बढ़ाये हुए बहुत बड़े परिमाणवाले अग्निका, उसके शान्त हो जानेपर कोई खद्योतमात्र—खद्योतके बराबर परिमाणवाला अंगारा रह जायगा तो उस अंगारेके द्वारा उससे—उसके परिमाणसे थोड़ा-सा भी अधिक दाह नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार हे सोम्य ! तेरी अन्नसे उपचित हुई सोलह कलाओंमेंसे केवल एक कला—एक भाग रह गयी है। उस खद्योतमात्र अंगारके समान एक कलासे तू इस समय वेदोंका अनुभव नहीं कर सकता—इस समय तुझे उनका ज्ञान |
६३६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ६३६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| वाचमथाशेषं विज्ञास्यस्यशान भुङ्क्ष्व तावत् ॥ ३ ॥ | न हो सकेगा । अब पहले तू भोजन कर तब मेरा वचन सुनकर तू सब जान जायगा ॥ ३ ॥ |
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स हाशाथ हैनमुपससाद तꣳह यत्किं च पप्रच्छ सर्वꣳह प्रतिपेदे ॥ ४ ॥
उसने भोजन किया और फिर उसके (आरुणिके) पास आया । तब उसने जो कुछ पूछा वह सब उसे उपस्थित हो गया ॥ ४ ॥
| स ह तथैवाश भुक्तवान् ।<br><br>अथानन्तरं हैनं पितरं शुश्रूषुरुपससाद । तं होपगतं पुत्रं यत्किंचर्गादिषु पप्रच्छ ग्रन्थरूपमर्थजातं वा पिता, स श्वेतकेतुः सर्वं ह तत्प्रतिपेद ऋगाद्यर्थतो ग्रन्थतश्च ॥ ४ ॥ | उसने उसी प्रकार (पिताके कथनानुसार) भोजन किया ।<br><br>उसके पश्चात् वह सुननेकी इच्छासे उस अपने पिताके समीप आया । उसने पास आये हुए उस पुत्रसे पिताने ऋगादिमें जो कुछ ग्रन्थरूप अथवा अर्थसमूह पूछा वह सब ऋगादि श्वेतकेतुने ग्रन्थतः तथा अर्थतः जान लिया ॥ ४ ॥ |
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तꣳहोवाच यथा सोम्य महतोऽभ्याहितस्यैकमङ्गारं खद्योतमात्रं परिशिष्टं तं तृणैरुपसमाधाय प्राज्वलयेत्तेन ततोऽपि बहु दहेत् ॥ ५ ॥
उससे [आरुणिने] कहा—हे सोम्य ! जिस प्रकार बहुत-से ईंधनसे बढ़े हुए अग्निका एक खद्योतमात्र अङ्गारा रह जाय और उसे तृणसे सम्पन्न कर प्रज्वलित कर दिया जाय तो वह उसकी (अपने पूर्व परिमाणकी) अपेक्षा भी अधिक दाह कर सकता है' ॥ ५ ॥
खण्ड ७ ] शाङ्करभाष्यार्थं ६३७
| तं होवाच पुनः पिता यथा । सोम्य महतोऽभ्याहितस्येत्यादि समानम्, एकमङ्गारं शान्तस्याग्नेः खद्योतमात्रं परिशिष्टं तृणैश्चूर्णैश्चोपसमाधाय प्राज्वलयेद्वर्धयेत् । तेनेद्धेनाङ्गारेण ततोऽपि पूर्वपरिमाणाद्बहु दहेत् ॥ ५ ॥ | फिर उससे पिताने कहा—'हे सोम्य ! जिस प्रकार—'महतोऽभ्याहितस्य' इत्यादि पदोंका अर्थ पूर्ववत् समझना चाहिये—शान्त हुए अग्निका एक खद्योतमात्र अंगारा रह जाय और उसे तृण तथा [लकड़ियोंके ] चूरेसे सम्पन्न करके प्रज्वलित किया जाय अर्थात् बढ़ाया जाय तो वह उस दीप्त हुए अंगारेसे उस अपने पूर्व परिमाणकी अपेक्षा भी अधिक दाह कर सकता है' ॥ ५ ॥ |
<div align="center">— : ० : —</div>एवꣳ सोम्य ते षोडशानां कलानामेका कलातिशिष्टाभूत्सान्नेनोपसमाहिता प्राज्वाली तयैतर्हि वेदाननुभवस्यन्नमयꣳहि सोम्य मन आपोमयः प्राणस्तेजोमयी वागिति तद्धास्य विजज्ञाविति विजज्ञाविति ॥ ६ ॥
'इसी प्रकार हे सोम्य ! तेरी सोलह कलाओंमेंसे एक कला अवशिष्ट रह गयी थी । वह अन्नद्वारा, वृद्धिको प्राप्त अर्थात् प्रज्वलित कर दी गयी । अब उसीसे तू वेदोंका अनुभव कर रहा है । अतः हे सोम्य ! मन अन्नमय है, प्राण जलमय है और वाक् तेजोमयी है।' इस प्रकार [ श्वेतकेतु ] उसके इस कथनको विशेषरूपसे समझ गया, समझ गया ॥ ६ ॥
| एवं सोम्य ते षोडशानामन्नकलानां सामर्थ्यरूपाणामेका | इसी प्रकार हे सोम्य ! तेरी सामर्थ्यरूपा अन्नकी सोलह |
६३८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ६३८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| कलातिशिष्टाभूदतिशिष्टासीत् पञ्चदशाहान्यभुक्तवत एकैकैनाह्नैवैका कला चन्द्रमस इवापरपक्षे क्षीणा, सातिशिष्टा कला त्वान्नेन भुक्तेनोपसमाहिता वर्धितोपचिता प्राज्वाली, दैर्घ्यं छान्दसम्, प्रज्वलिता वर्धितेत्यर्थः। प्राज्वालीदिति वा पाठान्तरम्, तदा तेनोपसमाहिता स्वयं प्रज्वलितवतीत्यर्थः । तया वर्धितयैतर्हीदानीं वेदाननुभवस्युपलभसे । <br><br> एवं व्यावृत्यनुवृत्तिभ्यामन्नमयत्वं मनसः सिद्धमित्युपसंहरति-अन्नमयं हि सोम्य मन इत्यादि । यथैतन्मनसोऽन्नमयत्वं तव सिद्धं तथापोमयः प्राणस्तेजोमयी वागित्येतदपि सिद्धमेवेत्यभिप्रायः । तदेतद्धास्य | कलाओंमेंसे केवल एक कला अवशिष्ट रह गयी थी । पंद्रह दिन भोजन न करनेसे कृष्णपक्षके चन्द्रमाके समान एक-एक दिनमें तेरी एक-एक कला क्षीण हो गयी थी । वह बची हुई कला तेरे भक्षण किये हुए अन्नद्वारा उपसमाहित—वर्धित, पुष्ट अर्थात् प्रज्वलित कर दी गयी । 'प्राज्वाली' इस पदमें दीर्घ ईकार छान्दस है अथवा 'प्राज्वालीत्' ऐसा पाठान्तर समझना चाहिये । उस अवस्थामें इसका ऐसा अर्थ होगा कि उसके द्वारा आधान हो जानेपर वह स्वयं प्रज्वलित हो गयी । उस वृद्धिको प्राप्त की हुई कलासे ही तू इस समय वेदोंका अनुभव करता है अर्थात् तुझे उनकी उपलब्धि होती है । <br><br> इस प्रकार व्यावृति और अनुवृत्ति दोनोंहीके द्वारा मनकी अन्नमयता सिद्ध है । इसीसे 'अन्नमयं हि सोम्य मनः' इत्यादि वाक्यसे श्रुति इसका उपसंहार करती है । जिस प्रकार तुझे यह मनकी अन्नमयता सिद्ध हुई है उसी प्रकार प्राण जलमय है और वाक् तेजोमयी है—यह भी सिद्ध ही है—ऐसा |
| खण्ड ७ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६३१ |
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| पितुरुक्तं मनआदीनामन्नादिमयत्वं विज्ञौ विज्ञातवाञ्श्वेतकेतुः । द्विरभ्यासस्त्रिवृत्करणप्रकरणसमाप्त्यर्थः ॥ ६ ॥ | इसका तात्पर्य है । इस प्रकार पिताके कहे हुए इस मन आदिके अन्नादिमयत्वको श्वेतकेतु विशेष-रूपसे समझ गया । 'विज्ञौ इति' इन पदोंकी द्विरुक्ति त्रिवृत्करणके प्रकरणकी समाप्तिके लिये है ॥६॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठाध्याये सप्तमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ७ ॥
अष्टम खण्ड
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सुषुप्तिकालमें जीवकी स्थितिका उपदेश
| यस्मिन्मनसि जीवेनात्मनानुप्रविष्टा परा देवता—आदर्श इव पुरुषः प्रतिबिम्बेन जलादिष्विव च सूर्यादयः प्रतिबिम्बैः, तन्मनोऽन्नमयं तेजोऽम्मयाभ्यां वाक्प्राणाभ्यां संगतमधिगतम् । यन्मयो यत्स्थश्च जीवो मननदर्शनश्रवणादिव्यवहाराय कल्पते तदुपरमे च स्वं देवतारूपमेव प्रतिपद्यते । | दर्पणमें प्रतिबिम्बरूपसे प्रविष्ट हुए पुरुष और जलादिकमें आभासरूपसे प्रविष्ट हुए सूर्यादिकके समान जिस मनमें परदेवता जीवात्मरूपसे अनुप्रविष्ट हुआ है और जिसमें स्थित हुआ तथा जिससे तादात्म्यको प्राप्त हुआ जीव मनन, दर्शन एवं श्रवणादि व्यापारमें समर्थ होता है तथा जिसके निवृत्त होनेपर वह अपने परदेवतारूपको ही प्राप्त हो जाता है वह मन अन्नमय है और तेजोमयी वाक् एवं जलमय प्राणके साथ सम्बद्ध है—ऐसा ज्ञात हुआ। |
| तदुक्तं श्रुत्यन्तरे—‘‘ध्यायतीव लेलायतीव सधीः स्वप्नो भूत्वेमं लोकमतिक्रामति’’ (बृ० उ० ४ । ३ । ७) ‘‘स वा अयमात्मा ब्रह्म विज्ञानमयो मनोमयः’’ (बृ० उ० ४ । ४ । ५) इत्यादि ‘‘स्वप्नेन शारीरम्’’ (बृ० उ० ४ । ३ । ११) | इस विषयमें अन्य (वाजसनेय) श्रुतिमें भी ऐसा कहा है—‘‘[मन और प्राणसे सम्बद्ध हुआ यह आत्मा] मानो ध्यान-सा करता है, चेष्टा-सी करता है, वह वासनायुक्त हुआ स्वप्नरूप होकर इस लोकका अतिक्रमण कर जाता है’’ ‘‘वह यह आत्मा ब्रह्म विज्ञानमय और मनोमय है’’ इत्यादि, तथा ‘‘स्वप्नसे शरीरको [निश्चेष्ट कर]’’ इत्यादि |
खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६४१
| इत्यादि "प्राणन्नेव प्राणो नाम भवति" (बृ० उ० १।४।७) इत्यादि च । | एवं "वह आत्मा प्राणनक्रिया करनेसे प्राण नामवाला हो जाता है" इत्यादि भी कहा है। | | तस्यास्य मनःस्थस्य मनआख्यां गतस्य मनउपशमद्वारेणेन्द्रियविषयेभ्यो निवृत्तस्य यस्यां परस्यां देवतायां स्वात्मभूतायां यदवस्थानं तत्पुत्रायाचिख्यासुः— | उस इस मनःस्थित-मनसंज्ञाको प्राप्त हुए तथा मनकी निवृत्तिके द्वारा इन्द्रियोंके विषयोंसे निवृत्त हुए जीवका जो अपने स्वरूपभूत परदेवतामें स्थित होना है, उसका अपने पुत्रके प्रति वर्णन करनेकी इच्छावाले— |
उद्दालको हारुणिः श्वेतकेतुं पुत्रमुवाच स्वप्नान्तं मे सोम्य विजानीहीति यत्रैतत्पुरुषः स्वपिति नाम सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति स्वमपीतो भवति तस्मादेनं स्वपितीत्याचक्षते स्वं ह्यपीतो भवति ॥ १ ॥
उद्दालकके नामसे प्रसिद्ध अरुणके पुत्रने अपने पुत्र श्वेतकेतुसे कहा—'हे सोम्य ! तू मेरेद्वारा स्वप्नान्त ( सुषुप्ति अथवा स्वप्नके स्वरूप ) को विशेषरूपसे समझ ले; जिस अवस्थामें यह पुरुष 'सोता है' ऐसा कहा जाता है, उस समय हे सोम्य ! यह सत्से सम्पन्न हो जाता है—यह अपने स्वरूपको प्राप्त हो जाता है। इसीसे इसे 'स्वपिति' ऐसा कहते हैं; क्योंकि उस समय यह स्व—अपनेको ही अपीत—प्राप्त हो जाता है ॥१॥
| उद्दालको ह किलारुणिः श्वेतकेतुं पुत्रमुवाचोक्तवान्— | उद्दालक नामसे प्रसिद्ध अरुणके पुत्रने अपने पुत्र श्वेतकेतुसे कहा— | | स्वप्नान्तं स्वप्नमध्यम्, स्वप्न इति दर्शनवृत्तेः स्वप्नस्याख्या, तस्य | स्वप्नान्त—स्वप्नका मध्य, 'स्वप्न' यह दर्शनवृत्ति [ अर्थात् जिसमें वासनारूप विषयोंके दर्शनकी वृत्ति |
३४२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ३४२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| मध्यं स्वप्नान्तं सुषुप्तमित्येतत् ।<br><br>अथवा स्वप्नान्तं स्वप्नसत्तत्त्वमित्यर्थः । तत्राप्यर्थात्सुषुप्तमेव भवति; स्वमपीतो भवतीति वचनात् । न ह्यन्यत्र सुषुप्तात्स्वमपीतिं जीवस्येच्छन्ति ब्रह्मविदः । | रहती है उस] स्वप्नका नाम है; उसके मध्यको स्वप्नान्त अर्थात् सुषुप्त कहते हैं। अथवा 'स्वप्नान्त' इस शब्दका तात्पर्य 'स्वप्नका तत्त्व' ऐसा भी हो सकता है। ऐसा माननेपर भी अर्थतः सुषुप्त ही सिद्ध होता है; क्योंकि 'स्वमपीतो भवति' (अपने स्वरूपको प्राप्त हो जाता है) ऐसा श्रुतिका वाक्य है; ब्रह्मवेत्तालोग सुषुप्तावस्थाको छोड़कर और किसी दशामें जीवकी स्वरूपप्राप्ति स्वीकार नहीं करते। | | तत्र ह्यादर्शापनयने पुरुषप्रतिबिम्ब आदर्शगतो यथा स्वमेव पुरुषमपीतो भवत्येवं मनआद्युपरमे चैतन्यप्रतिबिम्बरूपेण जीवेनात्मना मनसि प्रविष्टा नामरूपव्याकरणाय परा देवता सा स्वमेवात्मानं प्रतिपद्यते जीवरूपतां मनआख्यां हित्वा । अतः सुषुप्त एव स्वप्नान्तशब्दवाच्य इत्यवगम्यते । | जिस प्रकार दर्पणको हटा लेनेपर दर्पणमें स्थित पुरुषका प्रतिबिम्ब स्वयं पुरुषको ही प्राप्त हो जाता है उसी प्रकार उस सुषुप्तावस्थामें ही मन आदिकी निवृत्ति हो जानेपर चैतन्यके प्रतिबिम्बरूपसे जीवात्मभावसे नामरूपकी अभिव्यक्ति करनेके लिये मनमें प्रविष्ट हुआ वह परदेवता मनसंज्ञक जीवरूपताको त्यागकर स्वयं अपने स्वरूपको ही प्राप्त हो जाता है। अतः इससे यह विदित होता है कि 'स्वप्नान्त' शब्दका वाच्य 'सुषुप्त' ही है। | | यत्र तु सुप्तः स्वप्नान्पश्यति तत्स्वाप्नं दर्शनं सुखदुःखसंयुक्त- | किंतु जिस अवस्थामें सोया हुआ पुरुष स्वप्न देखता है वह स्वप्नदर्शन सुख-दुःखसे युक्त होता |
खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३४३
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
|---|---|
| मिति पुण्यापुण्यकार्यम्। पुण्यापुण्ययोर्हि सुखदुःखारम्भकत्वं प्रसिद्धम्। पुण्यापुण्ययोश्चाविद्याकामोपष्टम्भेनैव सुखदुःखतद्दर्शनकार्यारम्भकत्वमुपपद्यते नान्यथेत्यविद्याकामकर्मभिः संसारहेतुभिः संयुक्त एव स्वप्न इति न स्वमपीतो भवति “अनन्वागतं पुण्येनानन्वागतं पापेन तीर्णो हि तदा सर्वाञ्छोकान्हृदयस्य भवति” (बृ० उ० ४।३।२२) “तद्वा अस्यैतदतिच्छन्दाः” (बृ० उ० ४।३।२१) “एष परम आनन्दः” (बृ० उ० ४।३।३३) इत्यादिश्रुतिभ्यः। सुषुप्त एव स्वं देवतारूपं जीवत्वविनिर्मुक्तं दर्शयिष्यामीत्याह— स्वप्नान्तं मे मम निगदतो हे सोम्य विजानीहि विस्पष्टमवधारयेत्यर्थः। | है; इसलिये वह पुण्य-पापका कार्य है, क्योंकि पुण्य-पाप ही क्रमशः सुख-दुःखके आरम्भक रूपमें प्रसिद्ध हैं। किंतु पुण्य-पापका जो सुख, दुःख और उनके दर्शनरूप कार्यका आरम्भकत्व है वह अविद्या और कामनाके आश्रयसे ही सम्भव है, और किसी प्रकार नहीं, इसलिये स्वप्न संसारके हेतुभूत अविद्या, कामना और कर्म इनसे संयुक्त ही है; अतः उस अवस्थामें जीव अपने स्वरूपको प्राप्त नहीं होता; जैसा कि “[ उस अवस्थामें ] वह पुण्यसे असम्बद्ध, पापसे असम्बद्ध तथा हृदयके सम्पूर्ण शोकोंको पार किये होता है” “इसका वह यह रूप अतिच्छन्दा (काम, धर्माधर्म तथा अविद्यासे रहित) है” “यह परम आनन्द है” इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध होता है। अतः 'मैं सुषुप्तिमें ही जीवभावसे रहित अपने देवतारूपको दिखलाऊँगा' ऐसा आरुणिने कहा। हे सोम्य! मेरे कथन करनेसे तू स्वप्नान्त (सुषुप्तावस्था) को विशेषरूपसे जान ले अर्थात् स्पष्टतया समझ ले। |
छा० उ० २१—
६४४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ६४४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
|---|
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| कदा स्वप्नान्तो भवति ? इत्युच्यते-यत्र यस्मिन्काल एतन्नाम भवति पुरुषस्य स्वप्स्यतः प्रसिद्धं हि लोके स्वपितीति । गौणं चेदं नामेत्याह-यदा स्वपितीत्युच्यते पुरुषः, तदा तस्मिन्काले सता सच्छब्दवाच्या प्रकृतया देवतया सम्पन्नो भवति सङ्गत एकीभूतो भवति । मनसि प्रविष्टं मनआदिसंसर्गकृतं जीवरूपं परित्यज्य स्वं सद्रूपं यत्परमार्थसत्यमपीतोऽपि गतो भवति । अतस्तस्मात्स्वपितीत्येनमाचक्षते लौकिकाः । स्वमात्मानं हि यस्मादपीतो भवति । गुणनामप्रसिद्धितोऽपि स्वात्मप्राप्तिर्गम्यत इत्यभिप्रायः । | स्वप्नान्त होता कब है ? सो बतलाते हैं जिस समय सोनेवाले पुरुषका 'स्वपिति' ऐसा नाम होता है। लोकमें स्वपिति (सोता है) ऐसा व्यवहार प्रसिद्ध है। तथा यह नाम गौण (गुणसम्बन्धी) है-इस आशयसे कहते हैं-जिस समय यह पुरुष 'स्वपिति' ऐसा कहा जाता है उस समय यह सत्से-प्रकरण प्राप्त 'सत्' शब्दवाच्य देवतासे सम्पन्न-संगत अर्थात् एकीभूत हो जाता है। यह मनमें प्रविष्ट हुआ मन आदिके संसर्गसे प्राप्त हुए जीवरूपको त्यागकर अपने सद्रूपको, जो कि परमार्थ सत्य है, प्राप्त हो जाता है। इसीसे लौकिक पुरुष इसे 'स्वपिति' ऐसा कहकर पुकारते हैं; क्योंकि यह 'स्वम्'—आत्माको 'अपीतः'-प्राप्त हो जाता है। तात्पर्य यह है कि इस गौण नामकी प्रसिद्धिसे भी अपने आत्माकी प्राप्ति ज्ञात होती है। |
| कथं पुनर्लौकिकानां प्रसिद्धा स्वात्मसम्पत्तिः । जाग्रच्छ्रमनिमित्तोद्भवत्वात्स्वापस्येत्याहुः । | किंतु लौकिक पुरुषोंको स्वात्माकी प्राप्ति कैसे प्रसिद्ध हुई ? [ऐसा प्रश्न होनेपर] आचार्योंने कहा है-'क्योंकि सुषुप्ति जाग्रत् अवस्थाके श्रमके कारण होती है [इसलिये उसे लोकमें स्वात्मप्राप्ति कहते हैं] । |
| जागरिते हि पुण्यापुण्यनिमित्तसुख- | जाग्रत् अवस्थामें पुरुष पुण्य-पापके |
खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६४५
| संस्कृत भाष्य | भाष्यार्थ |
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| दुःखाद्यनेकायासानुभवाच्छ्रान्तो भवति; ततश्चायस्तानां करणानामनेकव्यापारनिमित्तग्लानानां स्वव्यापारेभ्य उपरमो भवति । <br><br> श्रुतेश्च “श्राम्यत्येव वाक् श्राम्यति चक्षुः” ( बृ० उ० १ । ५ । २१ ) इत्येवमादि । तथा च “गृहीता वाग् गृहीतं चक्षुर्गृहीतं श्रोत्रं गृहीतं मनः” ( बृ० उ० २ । १ । १७) इत्येवमादीनि करणानि प्राणग्रस्तानि; प्राण एकोऽश्रान्तो देहे कुलाये यो जागर्ति, तदा जीवः श्रमापनुत्तये स्वं देवतारूपमात्मानं प्रतिपद्यते । <br><br> नान्यत्र स्वरूपावस्थानाच्छ्रमापनोदः स्यादिति युक्ता प्रसिद्धिर्लौकिकानां स्वं ह्यपीतो भवतीति। | कारण होनेवाले सुख-दुःख आदि अनेक प्रकारका श्रम अनुभव करनेसे थक जाता है । उसके कारण पीड़ित अर्थात् अनेक प्रकारके व्यापाररूप निमित्तसे शिथिल हुई इन्द्रियोंकी अपने व्यापारोंसे निवृत्ति हो जाती है । <br><br> “वाक् भी थक जाती है और चक्षु भी थक जाती है” इत्यादि श्रुतिसे भी यही सिद्ध होता है । इसी प्रकार “[ सुषुप्तिमें विज्ञानमय आत्माद्वारा ] वाक् गृहीत हो जाती है, चक्षु गृहीत हो जाती है, श्रोत्र गृहीत हो जाते हैं और मन गृहीत हो जाता है” इस प्रकार ये सब इन्द्रियाँ प्राणसे गृहीत हो जाती हैं; एक प्राण ही अश्रान्त रहता है जो कि देहरूप घरमें जागता रहता है । उस समय जीव श्रमकी निवृत्तिके लिये अपने स्वाभाविक देवतारूपको प्राप्त हो जाता है, <br><br> क्योंकि स्वरूपमें स्थित होनेके सिवा और कहीं श्रमकी निवृत्ति नहीं हो सकती—इसलिये उस समय वह अपने स्वरूपको प्राप्त हो जाता है, ऐसी लौकिक पुरुषोंकी प्रसिद्धि ठीक ही है । |
३४६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ३४६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| दृश्यते हि लोके ज्वरादि-रोगग्रस्तानां तद्विनिर्मोके स्वात्मस्थानां विश्रमणं तद्वदिहापि स्यादिति युक्तम्। "तद्यथा श्येनो वा सुपर्णो वा विपरिपत्य श्रान्तः" (बृ० उ० ४।३।१९) इत्यादिश्रुतेश्च ॥ १ ॥ | लोकमें ज्वरादि रोगोंसे ग्रस्त हुए पुरुषोंको उनसे छुटकारा मिलनेपर स्वस्थ होकर विश्राम करते देखा भी जाता ही है; उसी प्रकार यहाँ भी हो सकता है, अतः यह प्रसिद्धि ठीक ही है। यही बात "जिस प्रकार बाज अथवा कोई दूसरा पक्षी सब ओर उड़कर थक जानेपर" इत्यादि श्रुतिसे भी सिद्ध होती है॥१॥ |
<div align="center"> -: ० :- </div>| तत्रायं दृष्टान्तो यथोक्तेऽर्थे— | उस उपर्युक्त अर्थमें यह दृष्टान्त है— |
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स यथा शकुनिः सूत्रेण प्रबद्धो दिशं दिशं पतित्वान्यत्रायतनमलब्ध्वा बन्धनमेवोपश्रयत एवमेव खलु सोम्य तन्मनो दिशं दिशं पतित्वान्यत्रायतनमलब्ध्वा प्राणमेवोपश्रयते प्राणबन्धनꣳहि सोम्य मन इति ॥२॥
जिस प्रकार डोरीमें बँधा हुआ पक्षी दिशा-विदिशाओंमें उड़कर अन्यत्र स्थान न मिलनेपर अपने बन्धनस्थानका ही आश्रय लेता है इसी प्रकार निश्चय ही हे सोम्य ! यह मन दिशा-विदिशाओंमें उड़कर अन्यत्र स्थान न मिलनेसे प्राणका ही आश्रय लेता है, क्योंकि हे सोम्य ! मन प्राणरूप बन्धनवाला ही है ॥ २ ॥
| स यथा शकुनिः पक्षी शकुनिघातकस्य हस्तगतेन सूत्रेण प्रबद्धः पाशितो दिशं दिशं | जिस प्रकार चिड़ीमारके हाथमें पकड़ी हुई डोरीसे बँधा हुआ— उसमें फँसाया हुआ पक्षी उस बन्धनसे मुक्त होनेकी इच्छासे |
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खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५७
| बन्धनमोक्षार्थी सन्प्रतिदिशं पतित्वान्यत्र बन्धनादायतनमाश्रयं विश्रमणायालब्ध्वाप्राप्य बन्धनमेवोपश्रयते । एवमेव यथायं दृष्टान्तः—खलु हे सोम्य तन्मनस्तत्प्रकृतं षोडशकलमन्नोपचितं मनो निर्धारितम्, तत्प्रविष्टस्तत्स्थस्तदुपलक्षितो जीवस्तन्मन इति निर्दिश्यते । मञ्चाक्रोशनवत्स मनआख्योपाधिर्जीवोऽविद्याकामकर्मोपदिष्टं दिशं दिशं सुखदुःखादिलक्षणां जाग्रत्स्वप्नयोः पतित्वा गत्वानुभूयेत्यर्थः, अन्यत्र सदाख्यात्स्वात्मन आयतनं विश्रमणस्थानमलब्ध्वा प्राणमेव, प्राणेन सर्वकार्यकरणाश्रयेणोपलक्षिता प्राण इत्युच्यते सदाख्या परा देवता, | दिशा-विदिशाओंमें उड़कर विश्राम करनेके लिये बन्धनके सिवा कोई और आयतन--आश्रय न पानेपर बन्धनस्थानका ही अवलम्ब लेता है; उसी प्रकार, जैसा कि यह दृष्टान्त है, हे सोम्य ! निश्चय ही वह मन — वह सोलह कलाओंवाला प्रकृत मन जो कि अन्नसे उपचित हुआ निश्चय किया गया है, उसमें प्रविष्ट होकर उसीमें स्थित हो, उसके ही द्वारा उपलक्षित होनेवाले जीवका ही वहाँ 'तन्मनः' ( वह मन ) इस कथनके द्वारा निर्देश किया गया है। मञ्चके आक्रोश (बोलने)* की भाँति वह मनसंज्ञक उपाधिवाला जीव जाग्रत् और स्वप्नके समय अविद्या, कामना और कर्मद्वारा उपदिष्ट सुख-दुःखादिरूप दिशा-विदिशामें उड़कर—जाकर अर्थात् उन्हें अनुभव कर अपने सत्-संज्ञक स्वात्मासे अतिरिक्त और कहीं आश्रय—विश्रामस्थान न पाकर प्राणको ही सम्पूर्ण कार्य और करणके आश्रयभूत प्राणद्वारा उपलक्षित हुआ सत्-संज्ञिका परादेवता यहाँ |
* जिस प्रकार 'मञ्चाः क्रोशन्ति' ( मञ्च बोलते हैं ) इस वाक्यमें 'मञ्च' शब्दसे उसपर बैठे हुए लोगोंका ग्रहण होता है उसी प्रकार यहाँ 'मन' शब्दसे मनमें स्थित—मनरूप उपाधिवाला जीव उपलक्षित होता है ।
६४८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ६४८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| “प्राणस्य प्राणम्” (बृ०उ० ४।४।१८) “प्राणशरीरो भारूपः” (छा० उ० ३।१४।२) इत्यादिश्रुतेः। अतस्तां देवतां प्राणं प्राणाख्यामेवोपश्रयते। प्राणो बन्धनं यस्य मनसस्तत्प्राणबन्धनं हि यस्मात्सोम्य मनः प्राणोपलक्षितदेवताश्रयम्, मन इति तदुपलक्षितो जीव इति ॥ २ ॥ | ‘प्राण’ कहा गया है, जैसा कि “उस प्राणके प्राणको [ जो जानते हैं ]” “वह प्राणशरीर और प्रकाशस्वरूप है” इत्यादि श्रुतिसे सिद्ध होता है; अतः उस प्राण अर्थात् प्राणाख्य देवताको ही आश्रय करता है; क्योंकि हे सोम्य ! प्राण जिसका बन्धन है वह मन प्राणबन्धन है; तात्पर्य यह है कि मन यानी उससे उपलक्षित होनेवाला जीव प्राणोपलक्षित देवताके ही आश्रित है॥२॥ |
—: ० :—
| एवं स्वपितिनामप्रसिद्धिद्वारेण यज्जीवस्य सत्यस्वरूपं जगतो मूलम्, तत्पुत्रस्य दर्शयित्वाथान्नादिकार्यकारणपरम्परयापि जगतो मूलं सद्दिदर्शयिषुः— | इस प्रकार ‘स्वपिति’ इस नामकी प्रसिद्धिद्वारा जीवका जो सत्यस्वरूप जगत्का मूल है उसे पुत्रको दिखलाकर अन्नादि कार्यकारणपरम्परासे भी जगत्के मूलभूत सत्को दिखानेकी इच्छासे आरुणिने कहा— |
अशनापिपासे मे सोम्य विजानीहीति यत्रैतत्पुरुषोऽशिशिषति नामाप एव तदशितं नयन्ते तद्यथा गोनायोऽश्वनायः पुरुषनाय इत्येवं तदप आचक्षतेऽशनायेति तत्रैतच्छुङ्गमूत्पतितꣳ सोम्य विजानीहि नेदममूलं भविष्यतीति ॥ ३ ॥
| खण्ड ८ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६४९ |
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'हे सोम्य ! तू मेरेद्वारा अशना ( भूख ) और पिपासा ( प्यास ) को जान । जिस समय यह पुरुष 'अशिशिषति' ( खाना चाहता है ) ऐसे नामवाला होता है, उस समय जल ही इसके भक्षण किये हुए अन्नको ले जाता है ? जिस प्रकार लोकमें [गौ ले जानेवालेको] गोनाय, [ अश्व ले जानेवालेको ] अश्वनाय और [ पुरुषोंको ले जानेवाले राजा या सेनापतिको ] पुरुषनाय कहते हैं। उसी प्रकार जलको 'अशनाय' ऐसा कहकर पुकारते हैं । हे सोम्य ! उस जलसे ही तू इस [ शरीररूप ] शुङ्ग ( अङ्कुर ) को उत्पन्न हुआ समझ, क्योंकि यह निर्मूल ( कारण-रहित ) नहीं हो सकता ॥ ३ ॥
| संस्कृत भाष्य | भाषार्थ |
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| अशनापिपासे अशितुमिच्छाशना, यालोपेन; पातुमिच्छा पिपासा ते अशनापिपासे अशनापिपासयोः सतत्त्वं विजानीहीत्येतत् । यत्र यस्मिन्काल एतन्नाम पुरुषो भवति, किं तत् ? अशिशिषत्यशितुमिच्छतीति तदा तस्य पुरुषस्य किंनिमित्तं नाम भवति ? इत्याह—यत्तत्पुरुषेणाशितमन्नं कठिनं पीता आपो नयन्ते द्रवीकृत्य रसादिभावेन विपरिणमयन्ते, तदा भुक्तमन्नं | अशनापिपासे—अशन ( भक्षण ) की इच्छाको 'अशना' कहते हैं, 'या' का लोप करनेसे अशना शब्द बनता है [ वस्तुतः यह 'अशनाया' शब्द है ] और पीनेकी इच्छा 'पिपासा' कहलाती है। ये ही अशना-पिपासा हैं; इन अशना-पिपासाका तत्त्व तू जान ले—ऐसा इसका तात्पर्य है। जब अर्थात् जिस समय यह पुरुष इस नामवाला होता है, किस नामवाला ?—'अशिशिषति' अर्थात् खाना चाहता है; उस समय पुरुषका यह नाम किस कारणसे होता है ? सो बतलाते हैं—उस पुरुषद्वारा खाया हुआ जो कठिन अन्न होता है उसे उसका पीया हुआ जल द्रवीभूत करके ले जाता है अर्थात् रसादि-रूपसे परिणत कर देता है । तभी |
३५० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ३५० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| जीर्यति । अथ च भवत्यस्य नामाशिषिषतीति गौणम् । जीर्णेऽन्नेऽशितुमिच्छति सर्वो हि जन्तुः ।<br><br>तत्रापामशितनेतृत्वादशनाया इति नाम प्रसिद्धमित्येतस्मिन्नर्थे । यथा गोनायो गां नयतीति गोनाय इत्युच्यते गोपालः, तथाश्वान्नयतीत्यश्वनायोऽश्वपाल इत्युच्यते, पुरुषनायः पुरुषान्नयतीति राजा सेनापतिर्वा, एवं तत्तदाप आचक्षते लौकिका अशनायेति विसर्जनीयलोपेन ।<br><br>तत्रैवं सत्यङ्गी रसादिभावेन नीतेनाशितेनान्नेन निष्पादितमिदं शरीरं वटकणिकायामिव | उसका भक्षण किया हुआ अन्न पचता है । तत्पश्चात् उसका ‘अशिषिषति’ ऐसा गौण नाम होता है, क्योंकि सभी जीव अन्नके जीर्ण हो जानेपर ही भोजन करनेकी इच्छा करते हैं ।<br><br>अशित (भक्षित अन्न) का नेता (ले जानेवाला) होनेके कारण जलका ‘अशनाया’ ऐसा नाम प्रसिद्ध है । [इस विषयमें यह दृष्टान्त है-] जिस प्रकार ‘गोनायः’ गौको ले जाता है इसलिये ग्वाला ‘गोनायः’ कहा जाता है, तथा अश्वोंको ले जाता है इसलिये अश्वपाल ‘अश्वनायः’ ऐसा कहा जाता है और पुरुषोंको ले जाता है इसलिये राजा या सेनापति ‘पुरुषनायः’ कहलाता है । इसी प्रकार उस समय [अशितको ले जानेके कारण] लौकिक पुरुष जलको ‘अशनाय’ ऐसा विसर्गका लोप करके कहते हैं [अर्थात् ‘अशनायः’ इस पदके विसर्गका लोप करके ‘अशनाय’ ऐसा कहते हैं] ।<br><br>ऐसा होनेपर ही जलद्वारा रसादिभावको प्राप्त हुए अन्नद्वारा निष्पन्न हुआ यह शरीररूप अङ्कुर वटके बीजसे उत्पन्न होनेवाले अङ्कुर- |