छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 653, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 653
| खण्ड ८ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६४९ |
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'हे सोम्य ! तू मेरेद्वारा अशना ( भूख ) और पिपासा ( प्यास ) को जान । जिस समय यह पुरुष 'अशिशिषति' ( खाना चाहता है ) ऐसे नामवाला होता है, उस समय जल ही इसके भक्षण किये हुए अन्नको ले जाता है ? जिस प्रकार लोकमें [गौ ले जानेवालेको] गोनाय, [ अश्व ले जानेवालेको ] अश्वनाय और [ पुरुषोंको ले जानेवाले राजा या सेनापतिको ] पुरुषनाय कहते हैं। उसी प्रकार जलको 'अशनाय' ऐसा कहकर पुकारते हैं । हे सोम्य ! उस जलसे ही तू इस [ शरीररूप ] शुङ्ग ( अङ्कुर ) को उत्पन्न हुआ समझ, क्योंकि यह निर्मूल ( कारण-रहित ) नहीं हो सकता ॥ ३ ॥
| संस्कृत भाष्य | भाषार्थ |
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| अशनापिपासे अशितुमिच्छाशना, यालोपेन; पातुमिच्छा पिपासा ते अशनापिपासे अशनापिपासयोः सतत्त्वं विजानीहीत्येतत् । यत्र यस्मिन्काल एतन्नाम पुरुषो भवति, किं तत् ? अशिशिषत्यशितुमिच्छतीति तदा तस्य पुरुषस्य किंनिमित्तं नाम भवति ? इत्याह—यत्तत्पुरुषेणाशितमन्नं कठिनं पीता आपो नयन्ते द्रवीकृत्य रसादिभावेन विपरिणमयन्ते, तदा भुक्तमन्नं | अशनापिपासे—अशन ( भक्षण ) की इच्छाको 'अशना' कहते हैं, 'या' का लोप करनेसे अशना शब्द बनता है [ वस्तुतः यह 'अशनाया' शब्द है ] और पीनेकी इच्छा 'पिपासा' कहलाती है। ये ही अशना-पिपासा हैं; इन अशना-पिपासाका तत्त्व तू जान ले—ऐसा इसका तात्पर्य है। जब अर्थात् जिस समय यह पुरुष इस नामवाला होता है, किस नामवाला ?—'अशिशिषति' अर्थात् खाना चाहता है; उस समय पुरुषका यह नाम किस कारणसे होता है ? सो बतलाते हैं—उस पुरुषद्वारा खाया हुआ जो कठिन अन्न होता है उसे उसका पीया हुआ जल द्रवीभूत करके ले जाता है अर्थात् रसादि-रूपसे परिणत कर देता है । तभी |