छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 637, कुल 978 में से
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खण्ड ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६३३
| संपन्ना बलिनो दृश्यन्ते लोके ध्यानाहाराश्च केचित्, अन्नस्य सर्वात्मकत्वात्, अतोऽन्नकृतं मानसं वीर्यम् । | पुरुष बलवान् देखे जाते हैं तथा कोई-कोई केवल ध्यानाहारी भी देखे जाते हैं, क्योंकि अन्न सर्वरूप है; अतः मानसिक बल अन्नसे ही होता है । |
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षोडशकलः सोम्य पुरुषः पञ्चदशाहानि माशीः काममपः पिबापोमयः प्राणो न पिबतो विच्छेत्स्यत इति ॥ १ ॥
हे सोम्य ! पुरुष सोलह कलाओंवाला है । तू पंद्रह दिन भोजन मत कर, केवल यथेच्छ जलपान कर । प्राण जलमय है; इसलिये जल पीते रहनेसे उसका नाश नहीं होगा ॥ १ ॥
| षोडश कला यस्य पुरुषस्य सोऽयं षोडशकलःपुरुषः; एतच्चेत्प्रत्यक्षीकर्तुमिच्छसि पञ्चदशसंख्याकान्यहानि माशीरशनं मा कार्षीः, काममिच्छातोऽपः पिब; यस्मान्न पिबतोऽपस्ते प्राणो विच्छेत्स्यते विच्छेदमापत्स्यते यस्मादापोमयोऽब्विकारः प्राण इत्यवोचाम । न हि कार्यं स्वकारणोपष्टम्भमन्तरेणाविभ्रंशमानं स्थातुमुत्सहते ॥ १ ॥ | सोलह कलाएँ जिस पुरुषकी हैं वह पुरुष सोलह कलाओंवाला है । यदि तू इस बातको प्रत्यक्ष करना चाहता हो तो पंद्रह दिनतक भोजन मत कर, केवल यथेच्छ जलपान कर, क्योंकि जल पीते रहनेसे तेरा प्राण विच्छिन्न नहीं होगा अर्थात् नाशको प्राप्त नहीं होगा, कारण पहले हम कह चुके हैं कि प्राण जलमय यानी जलका विकार है; और कोई भी कार्य अपने कारणके आश्रय बिना अविनष्टरूपसे स्थित नहीं रह सकता ॥ १ ॥ |
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