छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 639, कुल 978 में से
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खण्ड ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६३५
तꣳहोवाच यथा सोम्य महतोऽभ्याहितस्यैकोऽङ्गारः खद्योतमात्रः परिशिष्टः स्यात्तेन ततोऽपि न बहु दहेदेवꣳसोम्य ते षोडशानां कलानामेका कलातिशिष्टा स्यात्तयैतर्हि वेदान्नानुभवस्यशानाथ मे विज्ञास्यसीति ॥ ३ ॥
वह उससे बोला—'हे सोम्य ! जिस प्रकार बहुत-से ईंधनसे प्रज्वलित हुए अग्निका एक जुगनूके बराबर अङ्गारा रह जाय तो वह उससे अधिक दाह नहीं कर सकता, उसी प्रकार हे सोम्य ! तेरी सोलह कलाओंमेंसे केवल एक कला रह गयी है। उसके द्वारा इस समय तू वेदका अनुभव नहीं कर सकता। अच्छा, अब भोजन कर; तब तू मेरी बात समझ जायगा' ॥ ३ ॥
| संस्कृत-भाष्य | भाषानुवाद |
|---|---|
| तं होवाच यथा लोके हे सोम्य महतो महत्परिमाणस्याभ्याहितस्योपचितस्येन्धनैरग्नेरेकोऽङ्गारः खद्योतमात्रः खद्योतपरिमाणः शान्तस्य परिशिष्टोऽवशिष्टः स्याद्भवेत्, तेनाङ्गारेण ततोऽपि तत्परिमाणादीषदपि न बहु दहेत्; एवमेव खलु सोम्य ते तवान्नोपचितानां षोडशानां कलानामेका कलावयवोऽतिशिष्टावशिष्टा स्यात्, तया त्वं खद्योतमात्राङ्गारतुल्ययैतर्हीदानीं वेदान्नानुभवसि न प्रतिपद्यसे श्रुत्वा च मे मम | उससे आरुणिने कहा—'हे सोम्य ! लोकमें जिस प्रकार ईंधनसे आधान किये हुए—बढ़ाये हुए बहुत बड़े परिमाणवाले अग्निका, उसके शान्त हो जानेपर कोई खद्योतमात्र—खद्योतके बराबर परिमाणवाला अंगारा रह जायगा तो उस अंगारेके द्वारा उससे—उसके परिमाणसे थोड़ा-सा भी अधिक दाह नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार हे सोम्य ! तेरी अन्नसे उपचित हुई सोलह कलाओंमेंसे केवल एक कला—एक भाग रह गयी है। उस खद्योतमात्र अंगारके समान एक कलासे तू इस समय वेदोंका अनुभव नहीं कर सकता—इस समय तुझे उनका ज्ञान |