भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 622, कुल 978 में से

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पृष्ठ 622
६१८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६

संस्कृतहिन्दी
ननु वाय्वन्तरिक्षे त्वत्रिवृत्कृते तेजःप्रभृतिष्वनन्तर्भूतत्वादवशिष्येते । एवं गन्धरसशब्दस्पर्शाश्चावशिष्टा इति कथं सता विज्ञातेन सर्वमन्यद्विज्ञातं विज्ञातं भवेत् ? तद्विज्ञाने वा प्रकारान्तरं वाच्यम् ।<br><br>नैष दोषः; रूपवद्द्रव्ये सर्वस्य दर्शनात् । कथम् ? तेजसि तावद्रूपवति शब्दस्पर्शयोरप्युपलम्भाद्वाय्वन्तरिक्षयोस्तत्र स्पर्शशब्दगुणवतोः सद्भावोऽनुमीयते । तथाबन्नयो रूपवतो रसगन्धान्तर्भाव इति । रूपवतां त्रयाणां तेजोऽबन्नानां त्रिवृत्करणप्रदर्शनेन सर्वं तदन्तर्भूतं सद्विकारत्वात्त्रीण्येव रूपाणि विज्ञातं मन्यते श्रुतिः । न हि**शङ्का—**किंतु वायु और अन्तरिक्ष तो तेज आदिके अन्तर्गत न होनेके कारण अत्रिवृत्कृत ही रह जाते हैं । इसी प्रकार गन्ध, रस, शब्द और स्पर्श भी बच रहते हैं; फिर एकमात्र सत्‌को जान लेनेपर ही और सब अज्ञात पदार्थोंका ज्ञान किस प्रकार हो सकता है । अथवा उनका ज्ञान होनेके लिये श्रुतिको कोई दूसरा प्रकार बतलाना चाहिये ।<br><br>**समाधान—**यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि रूपवान् द्रव्यमें सब गुण देखे जा सकते हैं । किस प्रकार ? [ सो बतलाते हैं— ] रूपवान् तेजमें शब्द और स्पर्शकी भी उपलब्धि होनेके कारण उसमें स्पर्श और शब्द गुणवाले वायु और आकाशके सद्भावका भी अनुमान किया जाता है । तथा रूपवान् जल और अन्नमें रस एवं गन्धका अन्तर्भाव हो जाता है । इस प्रकार तेज, जल और अन्न—इन तीन रूपवानोंका त्रिवृत्करण प्रदर्शित करनेसे श्रुति ऐसा मानती है कि उनके अन्तर्गत साराका सारा सत्‌का ही कार्य होनेके कारण तीन रूप ही सत्य जाने गये हैं;