BharatKosha
Back to the archive

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished978 pages

१८४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २

Page 188Permalink
१८४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय २

| उद्गीथ इति त्र्यक्षरमुपद्रव इति चतुरक्षरं त्रिभिस्त्रिभिः समं भवत्यक्षरमतिशिष्यतेऽतिरिच्यते। तेन वैषम्ये प्राप्ते साम्नः समत्वकरणायाह तदेकमपि सदक्षरमिति त्र्यक्षरमेव भवति। अतस्तत्समम् ॥ ३ ॥ | 'उद्गीथ' यह नाम तीन अक्षरोंवाला है और 'उपद्रव' यह चार अक्षरोंवाला। तीन-तीन अक्षरोंसे ये समान हैं, किंतु एक अक्षर बच रहता है यानी बढ़ता है। उसके कारण इनमें विषमता प्राप्त होनेपर सामका समत्व करनेके लिये श्रुति कहती है कि वह एक होनेपर भी 'अक्षर' है, इसलिये वह नाम भी तीन अक्षरोंवाला ही है। अतः उन्हींके समान है ॥ ३ ॥ |

निधनमिति त्र्यक्षरं तत्सममेव भवति तानि ह वा एतानि द्वाविंशतिरक्षराणि ॥ ४ ॥

'निधन' यह नाम तीन अक्षरोंका है, अतः यह उनके समान ही है। वे ही ये बाईस अक्षर हैं ॥ ४ ॥

| निधनमिति त्र्यक्षरं तत्सममेव भवति। एवं त्र्यक्षरसमतया सामत्वं संपाद्य यथाप्राप्तान्येवाक्षराणि संख्यायन्ते। तानि ह वा एतानि सप्तभक्तिनामाक्षराणि द्वाविंशतिः ॥ ४ ॥ | 'निधन' यह तीन अक्षरोंवाला नाम है, अतः यह उनके समान ही है। इस प्रकार तीन अक्षरोंमें समानता होनेके कारण उनका सामत्व सम्पादित कर इस प्रकार प्राप्त हुए अक्षरोंकी गणना की जाती है—निश्चय ही वे ये सात भक्तियोंके नामाक्षर बाईस हैं ॥ ४ ॥ |

—: ० :—

Page 189Permalink

खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ १८५


एकविंशत्यादित्यमाप्नोत्येकविंशो वा इतोऽसावादित्यो द्वाविंशेन परमादित्याज्जयति तन्नाकं तद्विशोकम् ॥ ५ ॥

इक्कीस अक्षरोंद्वारा साधक आदित्यलोकं प्राप्त करता है, क्योंकि इस लोकसे वह आदित्य निश्चय ही इक्कीसवाँ है । बाईसवें अक्षरद्वारा वह आदित्यसे परे उस दुःखहीन एवं शोकरहित लोकको जीत लेता है ॥ ५ ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
तत्रैकविंशत्यक्षरसंख्ययादित्यमाप्नोति मृत्युम् । यस्मादेकविंश इतोऽस्माल्लोकादसावादित्यः संख्यया । "द्वादश मासाः पञ्चर्तवस्त्रय इमे लोका असावादित्य एक विँशः" इति श्रुतेः । अतिशिष्टेन द्वाविंशेनाक्षरेण परं मृत्योरादित्याज्जयत्याप्नोतीत्यर्थः । यच्च तदादित्यात्परं किं तत् ? नाकं कमिति सुखं तस्य प्रतिषेधोऽकं तन्न भवतीति नाकं कमेवेत्यर्थः, अमृत्युविषयत्वात् । विशोकं च तद्विगतशोकं मानसदुःखरहितमित्यर्थः । तदाप्नोतीति ॥ ५ ॥वहाँ वह इक्कीस अक्षर-संख्याके द्वारा तो आदित्यलोकरूप मृत्युको प्राप्त करता है, क्योंकि इस लोककी अपेक्षा वह आदित्यलोक संख्यामें इक्कीसवाँ है। जैसा कि "बारह महीने, पाँच ऋतुएँ, तीन ये लोक और इक्कीसवाँ वह आदित्यलोक', इत्यादि श्रुतिसे सिद्ध होता है। बचे हुए बाईसवें अक्षरद्वारा वह मृत्यु यानी आदित्यलोकसे परे उत्कृष्ट लोकको जीत लेता यानी प्राप्त कर लेता है। उस आदित्यलोकसे जो परे है वह क्या है ? वह नाक है—क सुखको कहते हैं उसका प्रतिषेधक अक है, वह जिसमें न हो उसे नाक कहते हैं; अर्थात् मृत्युका विषय न होनेके कारण वह क (सुख) ही है। तथा वह विशोक—शोकरहित अर्थात् मानसिक दुःखसे हीन है। उसी (लोक) को वह प्राप्त कर लेता है ॥ ५ ॥

—: • :—

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
उक्तस्यैव पिण्डितार्थमाह—श्रुति ऊपर कही हुई बातका ही सारांश कहती है—

१८६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २

Page 190Permalink
१८६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय २

आप्नोति हादित्यस्य जयं परो हास्यादित्यजया-
जयो भवति य एतदेवं विद्वानात्मसंमितमतिमृत्यु
सप्तविधᳵसामोपास्ते सामोपास्ते ॥ ६ ॥

[वह पुरुष] आदित्यलोककी जय प्राप्त करता है तथा उसे आदित्य-विजयसे भी उत्कृष्ट जय प्राप्त होती है, जो इस उपासनाको इस प्रकार जाननेवाला होकर आत्मसम्मित और मृत्युसे अतीत सप्तविध सामकी उपासना करता है—सामकी उपासना करता है ॥ ६ ॥

एकविंशतिसंख्ययादित्यस्य जयमाप्नोति । परो हास्यैवंविद आदित्यजयान्मृत्युगोचरात्परो जयो भवति द्वाविंशत्यक्षरसंख्ययेत्यर्थः । य एतदेवं विद्वानित्याद्युक्तार्थम् । तस्यैतद्यथोक्तं फलमिति । द्विरभ्यासः सप्तविध्यसमाप्त्यर्थः ॥ ६ ॥इक्कीसवीं अक्षर-संख्याके द्वारा आदित्यलोककी जय प्राप्त करता है; अतः तात्पर्य यह है कि इस प्रकार जाननेवाले इस उपासकको बाईसवीं अक्षर-संख्याके द्वारा इस मृत्युगोचर आदित्यजयकी अपेक्षा भी उत्कृष्ट जय प्राप्त होती है । 'य एतदेवं विद्वान्' इत्यादि वाक्यका अर्थ पहले कहा जा चुका है; उसे यह उपर्युक्त फल प्राप्त होता है । 'सामोपास्ते-सामोपास्ते' यह द्विरुक्ति उपासनाकी सप्तविधताकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है ॥ ६ ॥

—: ० :—

इति च्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये दशमखण्ड-भाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १० ॥

—: ० :—

एकादश खण्ड

गायत्रसामकी उपासना

विना नामग्रहणं पञ्चविधस्य सप्तविधस्य च साम्न उपासनमु-[यहाँतक] बिना नाम लिये पञ्चविध एवं सप्तविध सामकी उपासनाका
Page 191Permalink

खण्ड ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ १८७


शाङ्करभाष्यम्भाषार्थ
क्तम्। अथेदानों गायत्रादिनामग्रहणपूर्वकं विशिष्टफलानि सामोपासनान्तराण्युच्यन्ते । यथाक्रमं गायत्रादीनां कर्मणि प्रयोगस्तथैव—वर्णन किया गया। अब आगे 'गायत्र' आदि नाम लेकर विशिष्ट फलवती अन्य सामोपासनाओं का उल्लेख किया जाता है। गायत्र आदि उपासनाओंका उनके क्रमके अनुसार कर्ममें प्रयोग किया जाता है; उसीके अनुसार—

मनो हिंकारो वाक्प्रस्तावश्चक्षुरुद्गीथः श्रोत्रं प्रतिहारः प्राणो निधनमेतद्गायत्रं प्राणेषु प्रोतम् ॥ १ ॥

मन हिंकार है, वाक् प्रस्ताव है, चक्षु उद्गीथ है, श्रोत्र प्रतिहार है और प्राण निधन है। यह गायत्रसंज्ञक साम प्राणोंमें प्रतिष्ठित है ॥ १ ॥

शाङ्करभाष्यम्भाषार्थ
मनो हिंकारो मनसः सर्वकरणवृत्तीनां प्राथम्यात् । तदानन्तर्याद्वाक्प्रस्तावश्चक्षुरुद्गीथः श्रेष्ठ्यात् । श्रोत्रं प्रतिहारः प्रतिहृतत्वात् । प्राणो निधनं यथोक्तानां प्राणे निधनात्स्वापकाले । एतद्गायत्रं साम प्राणेषु प्रोतं गायत्र्याः प्राणसंस्तुतत्वात् ॥ १ ॥सम्पूर्ण इन्द्रियवृत्तियोंमें मनकी प्रथमता होनेके कारण मन हिंकार है, उसका पश्चाद्वर्ती होनेसे वाक् प्रस्ताव है, उत्कृष्ट होनेके कारण चक्षु उद्गीथ है, प्रतिहृत होनेके कारण श्रोत्र प्रतिहार है तथा प्राण निधन है, क्योंकि सुषुप्तिकालमें पूर्वोक्त सम्पूर्ण इन्द्रियवर्ग प्राणमें लीन हो जाते हैं। यह गायत्रसंज्ञक साम प्राणोंमें प्रतिष्ठित है, क्योंकि गायत्रीका प्राणरूपसे स्तवन किया गया है ॥१॥

स य एवमेतद्गायत्रं प्राणेषु प्रोतं वेद प्राणी भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या महामनाः स्यात्तद्व्रतम् ॥ २ ॥

वह जो इस प्रकार गायत्रसंज्ञक सामको प्राणोंमें प्रतिष्ठित जानता है, प्राणवान् होता है, पूर्ण आयुका उपभोग करता है, प्रशस्त जीवनलाभ करता है, प्रजा और पशुओं द्वारा महान् होता है तथा कीर्तिके द्वारा भी महान् होता है। वह महामना (उदारहृदय) होवे—यही उसका व्रत है ॥२॥

१८८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २

Page 192Permalink
१८८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय २

| स य एवमेतद्गायत्रं प्राणेषु प्रोतं वेद प्राणी भवति । अविकलकरणो भवतीत्येतत् । सर्वमायुरेति । “शतं वर्षाणि सर्वमायुः पुरुषस्य” इति श्रुतेः । ज्योगुज्ज्वलं जीवति । महान्भवति प्रजादिभिर्महांश्च कीर्त्या । गायत्रोपासकस्यैतद्व्रतं भवति यन्महामनस्त्वम्, अक्षुद्रचित्तः स्यादित्यर्थः ॥ २ ॥ | वह जो इस प्रकार इस गायत्र-संज्ञक सामको प्राणोंमें प्रतिष्ठित जानता है, प्राणवान् होता है अर्थात् अविकल इन्द्रियवान् होता है, वह पूर्ण आयुका उपभोग करता है। “पुरुषकी पूर्ण आयु सौ वर्ष है”—ऐसी श्रुति है। ज्योक्—उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है; प्रजादिके कारण भी महान् होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है। यह जो महामनस्त्व (विशालहृदयता) है, गायत्रोपासकका व्रत है अर्थात् उसे उदारचित्त होना चाहिये ॥ २ ॥ |


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये एकादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥११॥

द्वादश खण्ड

रथन्तरसामकी उपासना

अभिमन्थति स हिंकारो धूमो जायते स प्रस्तावो ज्वलति स उद्गीथोऽङ्गारा भवन्ति स प्रतिहार उपशाम्यति तन्निधनꣳसंशाम्यति तन्निधनमेतद्रथन्तरमग्नौ प्रोतम् ॥ १ ॥

अभिमन्थन करता है—यह हिंकार है, धूम उत्पन्न होता है—यह प्रस्ताव है, प्रज्वलित होता है—यह उद्गीथ है, अङ्गार होते हैं—यह प्रतिहार है तथा शान्त होने लगता है—यह निधन है और सर्वथा शान्त हो जाता है—यह भी निधन है। रथन्तरसाम अग्निमें प्रतिष्ठित है ॥१॥

Page 193Permalink

खण्ड १२ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १८९


| अभिमन्थति स हिंकारः प्राथम्यात् । अग्नेर्धूमो जायते स प्रस्ताव आनन्तर्यात् । ज्वलति स उद्गीथो हविःसंबन्धाच्छ्रैष्ठ्यं ज्वलनस्य । अङ्गारा भवन्ति स प्रतिहारोऽङ्गाराणां प्रतिहृतत्वात् । उपशमः सावशेषत्वाग्नेः संशमो निःशेषोपशमः समाप्तिसामान्यान्निधनम् । एतद्रथन्तरमग्नौ प्रोतम्; मन्थने ह्यग्नेर्गीयते ॥ १ ॥ | [ अग्निका ] अभिमन्थन करता है—यह सर्वप्रथम होनेके कारण हिंकार है । अग्निसे जो धुआँ उत्पन्न होता है वह इसका पश्चाद्वर्ती होनेके कारण प्रस्ताव है । अग्नि जलता है—यह उद्गीथ है; हविका सम्बन्ध होनेके कारण अग्निके प्रज्वलित होनेकी श्रेष्ठता है । अङ्गार होते हैं—यह प्रतिहार है, क्योंकि अङ्गारोंका प्रतिहरण किया जाता है। अग्निके बुझनेमें कसर रह जानेके कारण उपशम और उसका सर्वथा शान्त हो जाना संशम रूप निधन हैं, क्योंकि उसके साथ समाप्तिमें इनकी समानता है। यह रथन्तरसाम अग्निमें अनुस्यूत है तथा यह अग्नि-मन्थनकालमें गाया जाता है ॥ १ ॥ |

स य एवमेतद्रथन्तरमग्नौ प्रोतं वेद ब्रह्मवर्चस्यन्नादो भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या न प्रत्यङ्ङग्निमाचामेन्न निष्ठीवेत्तद्व्रतम्॥२॥

वह, जो पुरुष इस प्रकार इस रथन्तरसामको अग्निमें अनुस्यूत जानता है वह ब्रह्मतेजःसम्पन्न और अन्नका भोक्ता होता है, पूर्ण जीवनका उपभोग करता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है, प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण महान् होता है । अग्निकी ओर मुख करके भक्षण न करे और न थूके ही—यह व्रत है ॥ २ ॥

| स य इत्यादि पूर्ववत् । ब्रह्मवर्चसी वृत्तस्वाध्यायनिमित्तं | 'स यः' इत्यादि मन्त्रका अर्थ पूर्ववत् समझना चाहिये । ब्रह्मवर्चसी—सदाचार और स्वाध्यायके |

१९० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २

Page 194Permalink
१९०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय २

| तेजो ब्रह्मवर्चसम्, तेजस्तु केवलं त्विड्भावः । अन्नादो दीप्ताग्निः । न प्रत्यङ्ङग्नेरभिमुखो नाचामेन भक्षयेत्किञ्चिन्न निष्ठीवेच्च श्लेष्मनिरसनं च न कुर्यात्तद्व्रतम् ॥ २ ॥ | निमित्तसे प्राप्त हुआ तेज 'ब्रह्मवर्चस्' कहलाता है, केवल तेज तो त्विङ्-भाव ( कान्ति ) का नाम है। 'अन्नाद' का अर्थ दीप्ताग्नि है। अग्निकी ओर मुख करके आचमन यानो कुछ भी भक्षण न करे और न निष्ठीवन—श्लेष्मा ( कफ ) का ही त्याग करे—यह व्रत है ॥ २ ॥ |

—: ० :— इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये द्वादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १२ ॥ —: ० :—

त्रयोदश खण्ड

वामदेव्यसामकी उपासना

उपमन्त्रयते स हिंकारो ज्ञपयते स प्रस्तावः स्त्रिया सह शेते स उद्गीथः प्रति स्त्रीं सह शेते स प्रतिहारः कालं गच्छति तन्निधनं पारं गच्छति तन्निधनमे तद्वामदेव्यं मिथुने प्रोतम् १

पुरुष जो संकेत करता है, वह हिंकार है; जो तोष देता (प्रसन्न करनेके लिये मीठी बातें कहता) है, वह प्रस्ताव है; स्त्रीके साथ जो सोता है वह उद्गीथ है; अपनी अनेक पत्नियोंमेंसे प्रत्येकके साथ जो शयन (अनुकूल बर्ताव) करता है, वह प्रतिहार है; मिथुनद्वारा जो समय बिताता है, वह निधन है; मैथुन आदि क्रियाकी जो समाप्ति करता है, वह भी निधन ही है, यह वामदेव्य साम मिथुनमें ओत-प्रोत है ॥ १ ॥

| उपमन्त्रयते संकेतं करोति प्राथम्यात्स हिंकारः। ज्ञपयते तोषयति स प्रस्तावः। सहशयनमेकपर्‍यङ्कगमनं स उद्गीथः श्रैष्ठ्यात्। प्रतिस्त्रीं | पुरुष जो उपमन्त्रण—संकेत करता है, वह प्रथम होनेसे हिंकार है। जो ज्ञापन करता—मीठी बातें कह-कर तोष देता है, वह प्रस्ताव है। स्त्री-पुरुषका जो साथ सोना—एक शय्यापर जाना है, वह उद्गीथ है, क्योंकि उत्तम |

Page 195Permalink

खण्ड १३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १९१


| शयनं स्त्रियोऽभिमुखीभावः स प्रतिहारः। कालं गच्छति मैथुनेन पारं समाप्तिं गच्छति तन्निधनम् । एतद्वामदेव्यं मिथुने प्रोतम्, वाय्वम्बुमिथुनसम्बन्धात् ॥१॥ | सन्तानकी प्राप्तिका हेतु होनेके कारण) वह उत्कृष्ट है। अपनी अनेक पत्नियोंमेंसे प्रत्येकके साथ जो शयन करना—सम्मुख या अनुकूल होना है, वह प्रतिहार है। पुरुष मिथुनद्वारा जो समय बिताता है तथा मैथुनक्रियाकी जो समाप्ति करता है, वह निधन है। यह वामदेव्य साम मिथुनमें ओतप्रोत है; क्योंकि वायु और जलके मिथुन (जोड़े) से इसका सम्बन्ध है ॥ १ ॥ |


स य एवमेतद्वामदेव्यं मिथुने प्रोतं वेद मिथुनी भवति मिथुनान्मिथुनात्प्रजायते सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या न काञ्चन परिहरेत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥

जो पुरुष इस प्रकार इस वामदेव्य सामको मिथुनमें ओतप्रोत जानता है, वह मिथुनवान् (दाम्पत्य-सुखसे सम्पन्न) होता है, प्रत्येक मैथुनसे संतानको जन्म देता है। सारी आयुका उपभोग करता है, उज्ज्वल जीवन बिताता है। प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है। जिस उपासकके अनेक पत्नियाँ हों वह उनमेंसे किसीका भी परित्याग न करे, यह (वामदेव्योपासकका) व्रत है ॥ २ ॥

| स य इत्यादि पूर्ववत्। मिथुनी भवत्यविधुरो भवतीत्यर्थः। मिथुनान्मिथुनात्प्रजायत इत्यमोघरेतस्त्वमुच्यते। न काञ्चन काञ्चिदपि स्त्रियंस्वात्मन्नन्यप्राप्तां न परिहरेत्स- | 'स यः' इत्यादि मन्त्रभागका अर्थ पूर्ववत् है। मिथुनवान् होता है अर्थात् कभी विधुर (पत्नीके संयोग-सुखसे वञ्चित) नहीं होता है। मिथुन-मिथुनसे संतानको जन्म देता है, इस कथनके द्वारा उसकी अमोघवीर्यता बतायी जाती है। अपनी बहुत-सी स्त्रियोंमेंसे जो कोई जब कभी समागमकी इच्छा लेकर अपनी शय्यापर आ जाय, उसका परित्याग न |

१९२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २

Page 196Permalink
१९२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय २

| मागमागमिनीम्, वामदेव्यसामोपासनाङ्गत्वेन विधानात्। एतस्मादन्यत्रप्रतिषेधस्मृतयः। वचनप्रामाण्याच्च धर्माविगतेर्न प्रतिषेधशास्त्रेणास्य विरोधः ॥ २ ॥ | करे; क्योंकि वामदेव्य सामोपासनाके अङ्गरूपसे इसका विधान किया गया है। स्मृतियोंके निषेध-वचन इस वामदेव्योपासनासे अन्यत्र ही लागू होते हैं। श्रुतिके वचनोंके प्रमाणसे ही धर्मका निश्चय होता है, अतः निषेधशास्त्रके साथ इस विधिका विरोध नहीं है ॥ २ ॥ |

— : ० : —
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये त्रयोदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १३ ॥
— : ० : —

चतुर्दश खण्ड

बृहत्सामकी उपासना

उद्यन्हिङ्कार उदितः प्रस्तावो मध्यन्दिन उद्गीथोऽपराह्नः प्रतिहारोऽस्तंयन्निधनमेतद्बृहदादित्येप्रोतम् ॥ १ ॥

उदित होता हुआ सूर्य हिंकार है, उदित हुआ प्रस्ताव है, मध्याह्नकालिक सूर्य उद्गीथ है, मध्याह्नोत्तरकालिक प्रतिहार है और जो अस्तमित होनेवाला सूर्य है, वह निधन है । यह बृहत्साम सूर्यमें स्थित है ॥ १ ॥

उद्यन्सविता स हिंकारः। प्राथम्याद्दर्शनस्य । उदितः प्रस्तावः प्रस्तवनहेतुत्वात्कर्मणाम् । मध्यन्दिन उद्गीथः श्रेष्ठत्वात् । अपराह्नः प्रतिहारः पश्वादीनां गृहान् प्रति हरणात् । यदस्तं यंस्तन्निधनं रात्रौ गृहे निधानात् प्राणिनाम् । एतद्बृहदादित्ये प्रोतं बृहत आदित्यदैवत्यत्वात् ॥ १ ॥उदित होता हुआ जो सूर्य है वह हिंकार है, क्योंकि उसका दर्शन सबसे पहले होता है । उदित हुआ सूर्य कर्मोंके प्रस्तवनका हेतु होनेके कारण प्रस्ताव है । मध्याह्नकालीन सूर्य उत्कृष्ट होनेके कारण उद्गीथ है । पशु आदिको घरोंकी ओर ले जानेके कारण अपराह्न सूर्य प्रतिहार है । तथा जो अस्तको प्राप्त होनेवाला सूर्य है वह रातमें सम्पूर्ण प्राणियोंको अपने घरोंमें निहित करनेवाला होनेसे निधन है । यह बृहत्साम सूर्यमें स्थित है, क्योंकि बृहत्का सूर्य ही देवता है ॥ १ ॥
Page 197Permalink

खण्ड १४ ] शाङ्करभाष्यं १९३


स य एवमेतद्बृहदादित्ये प्रोतं वेद तेजस्व्यन्नादो भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या तपन्तं न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥

वह पुरुष, जो इस प्रकार इस बृहत्सामको सूर्यमें स्थित जानता है, तेजस्वी और अन्नका भोग करनेवाला होता है । वह पूर्ण आयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है, प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है । तपते हुए सूर्यकी निन्दा न करे—यह नियम है ॥ २ ॥

| स य इत्यादि पूर्ववत्। तपन्तं <br><br> न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥ | ‘स यः’ इत्यादि श्रुतिका अर्थ पूर्ववत् है । तपते हुए सूर्यकी निन्दा न करे—यह [ बृहत्सामोपासकके लिये ] नियम है ॥ २ ॥ |


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये
चतुर्दशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १४ ॥

Page 198Permalink

पञ्चदश खण्ड


वैरूपसामकी उपासना

अभ्राणि संप्लवन्ते स हिंकारो मेघो जायते स प्रस्तावो वर्षति स उद्गीथो विद्योतते स्तनयति स प्रतिहार उद्गृह्णाति तन्निधनमेतद्वैरूपं पर्जन्ये प्रोतम् ॥ १ ॥

बादल एकत्रित होते हैं—यह हिंकार है। मेघ उत्पन्न होता है—यह प्रस्ताव है। जल बरसता है—यह उद्गीथ है। बिजली चमकती और कड़कती है—यह प्रतिहार है तथा वृष्टिका उपसंहार होता है—यह निधन है। यह वैरूप साम मेघमें ओतप्रोत है ॥ १ ॥

| अभ्राण्यब्भरणान्मेघ उदकसेक्तृत्वात् । उक्तार्थमन्यत् ।<br><br>एतद्वैरूपं साम पर्जन्ये प्रोतम् ।<br><br>अनेकरूपत्वादभ्रादिभिः पर्जन्यस्य वैरूप्यम् ॥ १ ॥ | जलधारण करनेके कारण बादलोंका नाम 'अभ्र' है तथा जलसेचन करनेवाले होनेसे वे 'मेघ' कहलाते हैं। शेष सबका अर्थ पहले [खण्ड ३ मन्त्र १ में] कहा जा चुका है। यह 'वैरूप' नामक साम मेघमें अनुस्यूत है। अभ्रादिरूपसे अनेकरूप होनेके कारण पर्जन्यकी विविधरूपता है ॥ १ ॥ |

Page 199Permalink
खण्ड १५ ]शाङ्करभाष्यार्थ१९५

स य एवमेतद्वैरूपं पर्जन्ये प्रोतं वेद विरूपाँश्च सुरूपाँश्च पशूनवरुन्धे सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या वर्षन्तं न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥

वह पुरुष, जो इस प्रकार इस वैरूप सामको पर्जन्यमें अनुस्यूत जानता है वह विरूप और सुरूप पशुओंका अवरोध करता है, पूर्ण आयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है, प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण महान् होता है। बरसते हुए मेघकी निन्दा न करे—यह व्रत है ॥ २ ॥

| विरूपांश्च सुरूपांश्चाजाविप्रभृतीन् पशूनवरुन्धे प्राप्नोतीत्यर्थः। वर्षन्तं न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥ | वह बकरी और भेड़ आदि विरूप एवं सुरूप पशुओंका अवरोध करता है, अर्थात् उन्हें प्राप्त करता है। बरसते हुए मेघकी निन्दा न करे—यह [ वैरूपसामोपासकके लिये ] नियम है ॥ २ ॥ |

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये
पञ्चदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १५ ॥

छा० उ० ७—

Page 200Permalink

षोडश खण्ड

वैराजसामकी उपासना

वसन्तो हिंकारो ग्रीष्मः प्रस्तावो वर्षा उद्गीथः शरत्प्रतिहारो हेमन्तो निधनमेतद्वैराजमृतुषु प्रोतम् ॥ १ ॥

वसन्त हिंकार है, ग्रीष्म प्रस्ताव है, वर्षा उद्गीथ है, शरद् ऋतु प्रतिहार है, हेमन्त निधन है—यह वैराज साम ऋतुओंमें अनुस्यूत है ॥ १ ॥

| वसन्तो हिंकारः प्राथम्यात् । ग्रीष्मः प्रस्ताव इत्यादि पूर्ववत् ॥ १ ॥ | सर्वप्रथम होनेके कारण वसन्त हिंकार है, ग्रीष्म प्रस्ताव है इत्यादि अर्थ पूर्ववत् समझना चाहिये ॥ १ ॥ |


स य एवमेतद्वैराजमृतुषु प्रोतं वेद विराजति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्यार्तून्न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥

वह पुरुष, जो इस प्रकार इस वैराज सामको ऋतुओंमें अनुस्यूत जानता है, प्रजा पशु और ब्रह्मतेजके कारण शोभित होता है, वह

Page 201Permalink

खण्ड १६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९७


पूर्ण आयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है, प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है। ऋतुओंकी निन्दा न करे—यह व्रत है॥ २ ॥

| एतद्वैराजमृतुषु प्रोतं वेद ।<br><br>विराजति ऋतुवद्यथर्तव आर्त-<br><br>वैर्धर्मैर्विराजन्त एवं प्रजादिभि-<br><br>र्विद्वानित्युक्तमन्यत् । ऋतून<br><br>निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥ | इस वैराज सामको जो ऋतुओंमें अनुस्यूत जानता है वह ऋतुओंके समान विराजता है। जिस प्रकार ऋतुएँ ऋतुसम्बन्धी धर्मोंके कारण शोभाको प्राप्त होती हैं उसी प्रकार विद्वान् प्रजा आदिके कारण सुशोभित होता है । और सब अर्थ कहा जा चुका है। ऋतुओंकी निन्दा न करे—यह [ वैराजसामोपासकके लिये ] नियम है ॥ २ ॥ |

<br>

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये षोडशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १६ ॥

Page 202Permalink

सप्तदश खण्ड

शकरीसामकी उपासना

पृथिवी हिंकारोऽन्तरिक्षं प्रस्तावो द्यौरुद्गीथो दिशः प्रतिहारः समुद्रो निधनमेताः शक्वर्यो लोकेषु प्रोताः॥ १॥

पृथिवी हिंकार है, अन्तरिक्ष प्रस्ताव है, द्युलोक उद्गीथ है, दिशाएँ प्रतिहार हैं और समुद्र निधन है—यह शकरीसाम लोकोंमें अनुस्यूत है॥ १॥

| पृथिवी हिंकार इत्यादि पूर्ववत्। शक्वर्य इति नित्यं बहुवचनम्, रेवत्य इव। लोकेषु प्रोताः ॥ १ ॥ | 'पृथिवी हिंकारः' इत्यादि श्रुतिका अर्थ पूर्ववत् है। 'रेवत्यः' इस पदके समान 'शक्वर्यः' यह पद सर्वदा बहुवचनान्त है। [ यह शकरीसाम ] लोकोंमें अनुस्यूत है ॥१॥ |

—: ० :—

स य एवमेताः शक्वर्यो लोकेषु प्रोता वेद लोकी भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या लोकान्न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥

वह पुरुष, जो इस प्रकार इस शकरीसामको लोकोंमें अनुस्यूत जानता है, लोकवान् होता है, वह सम्पूर्ण आयुको प्राप्त होता है। उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है। प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है। लोकोंकी निन्दा न करे—यह व्रत है ॥ २ ॥

| लोकी भवति लोकफलेन युज्यत इत्यर्थः। लोकान्न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥ | लोकी होता है अर्थात् लोकसम्बन्धी फलसे सम्पन्न होता है। लोकोंकी निन्दा न करे—यह [शकरीसामोपासकके लिये] नियम है ॥२॥ |

इतिच्छान्दोग्योपनिषद्-द्वितीयाध्याये सप्तदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १७ ॥

Page 203Permalink

अष्टादश खण्ड

रेवतीसामकी उपासना

अजा हिंकारोऽवयः प्रस्तावो गाव उद्गीथोऽश्वाः प्रतिहारः पुरुषो निधनमेता रेवत्यः पशुषु प्रोताः॥१॥

बकरी हिंकार है, भेड़ें प्रस्ताव हैं, गौएँ उद्गीथ हैं, घोड़े प्रतिहार हैं और पुरुष निधन है—यह रेवतीसाम पशुओंमें अनुस्यूत है ॥ १ ॥

| अजा हिंकार इत्यादि पूर्ववत् । पशुषु प्रोताः ॥ १ ॥ | 'अजा हिंकारः' इत्यादि मन्त्रका अर्थ पूर्ववत है । यह [ रेवतीसाम ] पशुओंमें अनुस्यूत है ॥ १ ॥ |

स य एवमेता रेवत्यः पशुषु प्रोता वेद पशुमान् भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या पशून्न निन्देत्तद्व्रतम्॥ २ ॥

वह पुरुष, जो इस प्रकार इस रेवतीसामको पशुओंमें अनुस्यूत जानता है, पशुमान् होता है, वह पूर्ण आयुको प्राप्त होता है । उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है । प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है । पशुओंकी निन्दा न करे, यह नियम है ॥ २ ॥

| पशून्न निन्देत्तद्व्रतम् ॥२॥ | पशुओंकी निन्दा न करे—यह [ रेवतीसामोपासकके लिये ] नियम है ॥ २ ॥ |

—: ० :—

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये अष्टादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १८ ॥

—: ० :—

Page 204Permalink

एकोनविंश खण्ड


यज्ञायज्ञीयसामकी उपासना

लोम हिंकारस्त्वक्प्रस्तावो मांसमुद्गीथोऽस्थि प्रतिहारो मज्जा निधनमेतद्यज्ञायज्ञीयमङ्गेषु प्रोतम् ॥ १ ॥

लोम हिंकार है, त्वचा प्रस्ताव है, मांस उद्गीथ है, अस्थि प्रतिहार है और मज्जा निधन है। यह यज्ञायज्ञीय साम अङ्गोंमें अनुस्यूत है ॥ १ ॥

| लोम हिंकारो देहावयवानां प्राथम्यात् । त्वक्प्रस्ताव आनन्तर्यात् । मांसमुद्गीथः श्रैष्ठ्यात् । अस्थि प्रतिहारः प्रतिहतत्वात् । मज्जा निधनमानन्त्यात् । एतद्यज्ञायज्ञीयं नाम साम देहावयवेषु प्रोतम् ॥ १ ॥ | देहके अवयवोंमें सर्वप्रथम होनेके कारण लोम हिंकार है। लोमोंके अनन्तर होनेके कारण त्वचा प्रस्ताव है। उत्कृष्ट होनेके कारण मांस उद्गीथ है प्रतिहत होनेके कारण अस्थि प्रतिहार है तथा सबके अन्तमें स्थित होनेके कारण मज्जा निधन है। यह यज्ञायज्ञीयनामक साम देहके अवयवोंमें अनुस्यूत है ॥ १ ॥ |


स य एवमेतद्यज्ञायज्ञीयमङ्गेषु प्रोतं वेदाङ्गी भवति नाङ्गेन विहूर्च्छति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या संवत्सरं मज्ज्ञो नाश्नीयात्तद्व्रतं मज्ज्ञो नाश्नीयादिति वा ॥ २ ॥

Page 205Permalink

खण्ड १९] शाङ्करभाष्यार्थ २०१


वह पुरुष, जो इस प्रकार इस यज्ञायज्ञीय सामको अङ्गोंमें अनुस्यूत जानता है; अङ्गवान् होता है । वह अङ्गके कारण कुटिल नहीं होता, पूर्ण आयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है, प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है । एक वर्षतक मांसभक्षण न करे—यह व्रत है, अथवा [ सर्वदा ही ] मांसभक्षण न करे—ऐसा नियम है ॥ २ ॥

| अङ्गी भवति समग्राङ्गो भवतीत्यर्थो नाङ्गेन हस्तपादादिना विहूर्च्छति न कुटिली भवति पङ्गुः कुणी वेत्यर्थः । संवत्सरं संवत्सरमात्रं मज्ज्ञो मांसानि नाश्नीयान्न भक्षयेत् । बहुवचनं मत्स्योपलक्षणार्थम् । मज्ज्ञो नाश्नीयात्सर्वदैव नाश्नीयादिति वा तद्व्रतम् ॥ २ ॥ | अङ्गी होता है अर्थात् पूर्णाङ्ग होता है। अङ्ग अर्थात् हाथ-पाँव आदिके द्वारा कुटिल यानी लँगड़ा या इमश्रुरहित नहीं होता। संवत्सरपर्यन्त अर्थात् केवल एक साल मांसभक्षण न करे। 'मज्ज्ञः' इस पदमें बहुवचन मछलियोंको उपलक्षित करानेके लिये है [ अर्थात् मांस एवं मत्स्यादि न खाय ] । अथवा 'मज्ज्ञो नाश्नीयात्—सर्वदा ही मांस-मछली न खाय—ऐसा नियम है ॥ २ ॥ |

— : ० : —

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये एकोनविंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १९ ॥

Page 206Permalink

विंश खण्ड

—: ० :—

राजनसामकी उपासना

अग्निहिंकारो वायुः प्रस्ताव आदित्य उद्गीथो नक्षत्राणि प्रतिहारश्चन्द्रमा निधनमेतद्राजनं देवतासु प्रोतम् ॥ १ ॥

अग्नि हिंकार है, वायु प्रस्ताव है, आदित्य उद्गीथ है, नक्षत्र प्रतिहार हैं, चन्द्रमा निधन है—यह राजनसाम देवताओंमें अनुस्यूत है ॥ १॥

अग्निर्हिंकारः प्रथमस्थानत्वात् । वायुः प्रस्ताव आनन्तर्यसामान्यात् । आदित्य उद्गीथः श्रैष्ठ्यात् । नक्षत्राणि प्रतिहारः प्रतिहृतत्वात् । चन्द्रमा निधनं कर्मिणां तन्निधनात् । एतद्राजनं देवतासु प्रोतं देवतानां दीप्तिमत्त्वात् ॥ १ ॥अग्नि हिंकार है, क्योंकि उसका स्थान सर्वप्रथम है । आनन्तर्यमें तुल्यता होनेके कारण वायु प्रस्ताव है । उत्कृष्ट होनेके कारण आदित्य उद्गीथ है । प्रतिहृत होनेके कारण नक्षत्र प्रतिहार हैं तथा चन्द्रमा निधन है, क्योंकि उसीमें कर्मकाण्डियोंका निधन होता है । यह राजनसाम देवताओंमें अनुस्यूत है, क्योंकि देवगण दीप्तिमान् होते हैं ॥ १ ॥
विद्वत्फलम्—इस उपासनाके विद्वान्‌को प्राप्त होनेवाला फल—

स य एवमेतद्राजनं देवतासु प्रोतं वेदैतासामेव देवतानाँसलोकताँसार्ष्टिताँसायुज्यं गच्छति सर्व-

Page 207Permalink

खण्ड २० ] शाङ्करभाष्यार्थ २०३


मायुरेति ज्योग्जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या ब्राह्मणान्न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥

वह पुरुष, जो इस प्रकार इस राजनसामको देवताओंमें अनुस्यूत जानता है, उन्हीं देवताओंके सालोक्य, सार्ष्टित्व (तुल्य ऐश्वर्य) और सायुज्यको प्राप्त हो जाता है। वह पूर्ण आयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है, प्रजा और पशुओंके द्वारा महान् होता है तथा कीर्तिके द्वारा भी महान् होता है। ब्राह्मणोंकी निन्दा न करे—यह व्रत है ॥ २ ॥

संस्कृत-भाष्यभाषानुवाद
एतासामेवाग्न्यादीनां देवतानां सलोकतां समानलोकतां सार्ष्टितां समानर्द्धित्वं सायुज्यं सयुग्भावमेकदेहदेहित्वमित्येतत्। वाशब्दोऽत्र लुप्तो द्रष्टव्यः। सलोकतां वेत्यादि। भावनाविशेषतः फलविशेषोपपत्तेः। गच्छति प्राप्नोति। समुच्चयानुपपत्तेश्च। ब्राह्मणान्न निन्देत्तद्व्रतम्।<br><br>“एते वै देवाः प्रत्यक्षं यद्ब्राह्मणाः”<br><br>इति श्रुतेर्ब्राह्मणनिन्दा देवनिन्दैवेति ॥ २ ॥इन अग्नि आदि देवताओंकी ही सलोकता—समानलोकता, सार्ष्टिता—समान ऐश्वर्य, . सायुज्य—परस्पर मिल जानेके भावको अर्थात् एक ही देहके देहित्वको प्राप्त हो जाता है। यहाँ ‘वा’ शब्द लुप्त समझना चाहिये। अतः ‘सलोकतां वा’ इत्यादि पाठ जानना चाहिये। क्योंकि भावनाविशेषसे फलविशेषकी उत्पत्ति होती हैं और इन सब फलोंका समुच्चय होना [अर्थात् एक ही उपासकको इन सब फलोंका प्राप्त होना] भी सम्भव नहीं है।<br><br>ब्राह्मणोंकी निन्दा न करे—यह इस प्रकारके उपासकके लिये नियम है। “ये जो ब्राह्मण हैं प्रत्यक्ष देवता ही हैं” ऐसी श्रुति होनेसे ब्राह्मण-निन्दा देवनिन्दा ही है ॥ २ ॥

इति च्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये विंशखण्ड-भाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २० ॥