छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 203, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टादश खण्ड
रेवतीसामकी उपासना
अजा हिंकारोऽवयः प्रस्तावो गाव उद्गीथोऽश्वाः प्रतिहारः पुरुषो निधनमेता रेवत्यः पशुषु प्रोताः॥१॥
बकरी हिंकार है, भेड़ें प्रस्ताव हैं, गौएँ उद्गीथ हैं, घोड़े प्रतिहार हैं और पुरुष निधन है—यह रेवतीसाम पशुओंमें अनुस्यूत है ॥ १ ॥
| अजा हिंकार इत्यादि पूर्ववत् । पशुषु प्रोताः ॥ १ ॥ | 'अजा हिंकारः' इत्यादि मन्त्रका अर्थ पूर्ववत है । यह [ रेवतीसाम ] पशुओंमें अनुस्यूत है ॥ १ ॥ |
स य एवमेता रेवत्यः पशुषु प्रोता वेद पशुमान् भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या पशून्न निन्देत्तद्व्रतम्॥ २ ॥
वह पुरुष, जो इस प्रकार इस रेवतीसामको पशुओंमें अनुस्यूत जानता है, पशुमान् होता है, वह पूर्ण आयुको प्राप्त होता है । उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है । प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है । पशुओंकी निन्दा न करे, यह नियम है ॥ २ ॥
| पशून्न निन्देत्तद्व्रतम् ॥२॥ | पशुओंकी निन्दा न करे—यह [ रेवतीसामोपासकके लिये ] नियम है ॥ २ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये अष्टादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १८ ॥
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