छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 202, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तदश खण्ड
शकरीसामकी उपासना
पृथिवी हिंकारोऽन्तरिक्षं प्रस्तावो द्यौरुद्गीथो दिशः प्रतिहारः समुद्रो निधनमेताः शक्वर्यो लोकेषु प्रोताः॥ १॥
पृथिवी हिंकार है, अन्तरिक्ष प्रस्ताव है, द्युलोक उद्गीथ है, दिशाएँ प्रतिहार हैं और समुद्र निधन है—यह शकरीसाम लोकोंमें अनुस्यूत है॥ १॥
| पृथिवी हिंकार इत्यादि पूर्ववत्। शक्वर्य इति नित्यं बहुवचनम्, रेवत्य इव। लोकेषु प्रोताः ॥ १ ॥ | 'पृथिवी हिंकारः' इत्यादि श्रुतिका अर्थ पूर्ववत् है। 'रेवत्यः' इस पदके समान 'शक्वर्यः' यह पद सर्वदा बहुवचनान्त है। [ यह शकरीसाम ] लोकोंमें अनुस्यूत है ॥१॥ |
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स य एवमेताः शक्वर्यो लोकेषु प्रोता वेद लोकी भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या लोकान्न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥
वह पुरुष, जो इस प्रकार इस शकरीसामको लोकोंमें अनुस्यूत जानता है, लोकवान् होता है, वह सम्पूर्ण आयुको प्राप्त होता है। उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है। प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है। लोकोंकी निन्दा न करे—यह व्रत है ॥ २ ॥
| लोकी भवति लोकफलेन युज्यत इत्यर्थः। लोकान्न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥ | लोकी होता है अर्थात् लोकसम्बन्धी फलसे सम्पन्न होता है। लोकोंकी निन्दा न करे—यह [शकरीसामोपासकके लिये] नियम है ॥२॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषद्-द्वितीयाध्याये सप्तदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १७ ॥