भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 197

खण्ड १४ ] शाङ्करभाष्यं १९३


स य एवमेतद्बृहदादित्ये प्रोतं वेद तेजस्व्यन्नादो भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या तपन्तं न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥

वह पुरुष, जो इस प्रकार इस बृहत्सामको सूर्यमें स्थित जानता है, तेजस्वी और अन्नका भोग करनेवाला होता है । वह पूर्ण आयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है, प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है । तपते हुए सूर्यकी निन्दा न करे—यह नियम है ॥ २ ॥

| स य इत्यादि पूर्ववत्। तपन्तं <br><br> न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥ | ‘स यः’ इत्यादि श्रुतिका अर्थ पूर्ववत् है । तपते हुए सूर्यकी निन्दा न करे—यह [ बृहत्सामोपासकके लिये ] नियम है ॥ २ ॥ |


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये
चतुर्दशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १४ ॥