छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 198, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चदश खण्ड
वैरूपसामकी उपासना
अभ्राणि संप्लवन्ते स हिंकारो मेघो जायते स प्रस्तावो वर्षति स उद्गीथो विद्योतते स्तनयति स प्रतिहार उद्गृह्णाति तन्निधनमेतद्वैरूपं पर्जन्ये प्रोतम् ॥ १ ॥
बादल एकत्रित होते हैं—यह हिंकार है। मेघ उत्पन्न होता है—यह प्रस्ताव है। जल बरसता है—यह उद्गीथ है। बिजली चमकती और कड़कती है—यह प्रतिहार है तथा वृष्टिका उपसंहार होता है—यह निधन है। यह वैरूप साम मेघमें ओतप्रोत है ॥ १ ॥
| अभ्राण्यब्भरणान्मेघ उदकसेक्तृत्वात् । उक्तार्थमन्यत् ।<br><br>एतद्वैरूपं साम पर्जन्ये प्रोतम् ।<br><br>अनेकरूपत्वादभ्रादिभिः पर्जन्यस्य वैरूप्यम् ॥ १ ॥ | जलधारण करनेके कारण बादलोंका नाम 'अभ्र' है तथा जलसेचन करनेवाले होनेसे वे 'मेघ' कहलाते हैं। शेष सबका अर्थ पहले [खण्ड ३ मन्त्र १ में] कहा जा चुका है। यह 'वैरूप' नामक साम मेघमें अनुस्यूत है। अभ्रादिरूपसे अनेकरूप होनेके कारण पर्जन्यकी विविधरूपता है ॥ १ ॥ |