भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 199
खण्ड १५ ]शाङ्करभाष्यार्थ१९५

स य एवमेतद्वैरूपं पर्जन्ये प्रोतं वेद विरूपाँश्च सुरूपाँश्च पशूनवरुन्धे सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या वर्षन्तं न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥

वह पुरुष, जो इस प्रकार इस वैरूप सामको पर्जन्यमें अनुस्यूत जानता है वह विरूप और सुरूप पशुओंका अवरोध करता है, पूर्ण आयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है, प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण महान् होता है। बरसते हुए मेघकी निन्दा न करे—यह व्रत है ॥ २ ॥

| विरूपांश्च सुरूपांश्चाजाविप्रभृतीन् पशूनवरुन्धे प्राप्नोतीत्यर्थः। वर्षन्तं न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥ | वह बकरी और भेड़ आदि विरूप एवं सुरूप पशुओंका अवरोध करता है, अर्थात् उन्हें प्राप्त करता है। बरसते हुए मेघकी निन्दा न करे—यह [ वैरूपसामोपासकके लिये ] नियम है ॥ २ ॥ |

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये
पञ्चदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १५ ॥

छा० उ० ७—