भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 201

खण्ड १६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९७


पूर्ण आयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है, प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है। ऋतुओंकी निन्दा न करे—यह व्रत है॥ २ ॥

| एतद्वैराजमृतुषु प्रोतं वेद ।<br><br>विराजति ऋतुवद्यथर्तव आर्त-<br><br>वैर्धर्मैर्विराजन्त एवं प्रजादिभि-<br><br>र्विद्वानित्युक्तमन्यत् । ऋतून<br><br>निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥ | इस वैराज सामको जो ऋतुओंमें अनुस्यूत जानता है वह ऋतुओंके समान विराजता है। जिस प्रकार ऋतुएँ ऋतुसम्बन्धी धर्मोंके कारण शोभाको प्राप्त होती हैं उसी प्रकार विद्वान् प्रजा आदिके कारण सुशोभित होता है । और सब अर्थ कहा जा चुका है। ऋतुओंकी निन्दा न करे—यह [ वैराजसामोपासकके लिये ] नियम है ॥ २ ॥ |

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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये षोडशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १६ ॥