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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

खण्ड १६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९७


पूर्ण आयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है, प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है। ऋतुओंकी निन्दा न करे—यह व्रत है॥ २ ॥

| एतद्वैराजमृतुषु प्रोतं वेद ।<br><br>विराजति ऋतुवद्यथर्तव आर्त-<br><br>वैर्धर्मैर्विराजन्त एवं प्रजादिभि-<br><br>र्विद्वानित्युक्तमन्यत् । ऋतून<br><br>निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥ | इस वैराज सामको जो ऋतुओंमें अनुस्यूत जानता है वह ऋतुओंके समान विराजता है। जिस प्रकार ऋतुएँ ऋतुसम्बन्धी धर्मोंके कारण शोभाको प्राप्त होती हैं उसी प्रकार विद्वान् प्रजा आदिके कारण सुशोभित होता है । और सब अर्थ कहा जा चुका है। ऋतुओंकी निन्दा न करे—यह [ वैराजसामोपासकके लिये ] नियम है ॥ २ ॥ |

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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये षोडशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १६ ॥

सप्तदश खण्ड

शकरीसामकी उपासना

पृथिवी हिंकारोऽन्तरिक्षं प्रस्तावो द्यौरुद्गीथो दिशः प्रतिहारः समुद्रो निधनमेताः शक्वर्यो लोकेषु प्रोताः॥ १॥

पृथिवी हिंकार है, अन्तरिक्ष प्रस्ताव है, द्युलोक उद्गीथ है, दिशाएँ प्रतिहार हैं और समुद्र निधन है—यह शकरीसाम लोकोंमें अनुस्यूत है॥ १॥

| पृथिवी हिंकार इत्यादि पूर्ववत्। शक्वर्य इति नित्यं बहुवचनम्, रेवत्य इव। लोकेषु प्रोताः ॥ १ ॥ | 'पृथिवी हिंकारः' इत्यादि श्रुतिका अर्थ पूर्ववत् है। 'रेवत्यः' इस पदके समान 'शक्वर्यः' यह पद सर्वदा बहुवचनान्त है। [ यह शकरीसाम ] लोकोंमें अनुस्यूत है ॥१॥ |

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स य एवमेताः शक्वर्यो लोकेषु प्रोता वेद लोकी भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या लोकान्न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥

वह पुरुष, जो इस प्रकार इस शकरीसामको लोकोंमें अनुस्यूत जानता है, लोकवान् होता है, वह सम्पूर्ण आयुको प्राप्त होता है। उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है। प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है। लोकोंकी निन्दा न करे—यह व्रत है ॥ २ ॥

| लोकी भवति लोकफलेन युज्यत इत्यर्थः। लोकान्न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥ | लोकी होता है अर्थात् लोकसम्बन्धी फलसे सम्पन्न होता है। लोकोंकी निन्दा न करे—यह [शकरीसामोपासकके लिये] नियम है ॥२॥ |

इतिच्छान्दोग्योपनिषद्-द्वितीयाध्याये सप्तदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १७ ॥

अष्टादश खण्ड

रेवतीसामकी उपासना

अजा हिंकारोऽवयः प्रस्तावो गाव उद्गीथोऽश्वाः प्रतिहारः पुरुषो निधनमेता रेवत्यः पशुषु प्रोताः॥१॥

बकरी हिंकार है, भेड़ें प्रस्ताव हैं, गौएँ उद्गीथ हैं, घोड़े प्रतिहार हैं और पुरुष निधन है—यह रेवतीसाम पशुओंमें अनुस्यूत है ॥ १ ॥

| अजा हिंकार इत्यादि पूर्ववत् । पशुषु प्रोताः ॥ १ ॥ | 'अजा हिंकारः' इत्यादि मन्त्रका अर्थ पूर्ववत है । यह [ रेवतीसाम ] पशुओंमें अनुस्यूत है ॥ १ ॥ |

स य एवमेता रेवत्यः पशुषु प्रोता वेद पशुमान् भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या पशून्न निन्देत्तद्व्रतम्॥ २ ॥

वह पुरुष, जो इस प्रकार इस रेवतीसामको पशुओंमें अनुस्यूत जानता है, पशुमान् होता है, वह पूर्ण आयुको प्राप्त होता है । उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है । प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है । पशुओंकी निन्दा न करे, यह नियम है ॥ २ ॥

| पशून्न निन्देत्तद्व्रतम् ॥२॥ | पशुओंकी निन्दा न करे—यह [ रेवतीसामोपासकके लिये ] नियम है ॥ २ ॥ |

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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये अष्टादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १८ ॥

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एकोनविंश खण्ड


यज्ञायज्ञीयसामकी उपासना

लोम हिंकारस्त्वक्प्रस्तावो मांसमुद्गीथोऽस्थि प्रतिहारो मज्जा निधनमेतद्यज्ञायज्ञीयमङ्गेषु प्रोतम् ॥ १ ॥

लोम हिंकार है, त्वचा प्रस्ताव है, मांस उद्गीथ है, अस्थि प्रतिहार है और मज्जा निधन है। यह यज्ञायज्ञीय साम अङ्गोंमें अनुस्यूत है ॥ १ ॥

| लोम हिंकारो देहावयवानां प्राथम्यात् । त्वक्प्रस्ताव आनन्तर्यात् । मांसमुद्गीथः श्रैष्ठ्यात् । अस्थि प्रतिहारः प्रतिहतत्वात् । मज्जा निधनमानन्त्यात् । एतद्यज्ञायज्ञीयं नाम साम देहावयवेषु प्रोतम् ॥ १ ॥ | देहके अवयवोंमें सर्वप्रथम होनेके कारण लोम हिंकार है। लोमोंके अनन्तर होनेके कारण त्वचा प्रस्ताव है। उत्कृष्ट होनेके कारण मांस उद्गीथ है प्रतिहत होनेके कारण अस्थि प्रतिहार है तथा सबके अन्तमें स्थित होनेके कारण मज्जा निधन है। यह यज्ञायज्ञीयनामक साम देहके अवयवोंमें अनुस्यूत है ॥ १ ॥ |


स य एवमेतद्यज्ञायज्ञीयमङ्गेषु प्रोतं वेदाङ्गी भवति नाङ्गेन विहूर्च्छति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या संवत्सरं मज्ज्ञो नाश्नीयात्तद्व्रतं मज्ज्ञो नाश्नीयादिति वा ॥ २ ॥

खण्ड १९] शाङ्करभाष्यार्थ २०१


वह पुरुष, जो इस प्रकार इस यज्ञायज्ञीय सामको अङ्गोंमें अनुस्यूत जानता है; अङ्गवान् होता है । वह अङ्गके कारण कुटिल नहीं होता, पूर्ण आयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है, प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है । एक वर्षतक मांसभक्षण न करे—यह व्रत है, अथवा [ सर्वदा ही ] मांसभक्षण न करे—ऐसा नियम है ॥ २ ॥

| अङ्गी भवति समग्राङ्गो भवतीत्यर्थो नाङ्गेन हस्तपादादिना विहूर्च्छति न कुटिली भवति पङ्गुः कुणी वेत्यर्थः । संवत्सरं संवत्सरमात्रं मज्ज्ञो मांसानि नाश्नीयान्न भक्षयेत् । बहुवचनं मत्स्योपलक्षणार्थम् । मज्ज्ञो नाश्नीयात्सर्वदैव नाश्नीयादिति वा तद्व्रतम् ॥ २ ॥ | अङ्गी होता है अर्थात् पूर्णाङ्ग होता है। अङ्ग अर्थात् हाथ-पाँव आदिके द्वारा कुटिल यानी लँगड़ा या इमश्रुरहित नहीं होता। संवत्सरपर्यन्त अर्थात् केवल एक साल मांसभक्षण न करे। 'मज्ज्ञः' इस पदमें बहुवचन मछलियोंको उपलक्षित करानेके लिये है [ अर्थात् मांस एवं मत्स्यादि न खाय ] । अथवा 'मज्ज्ञो नाश्नीयात्—सर्वदा ही मांस-मछली न खाय—ऐसा नियम है ॥ २ ॥ |

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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये एकोनविंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १९ ॥

विंश खण्ड

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राजनसामकी उपासना

अग्निहिंकारो वायुः प्रस्ताव आदित्य उद्गीथो नक्षत्राणि प्रतिहारश्चन्द्रमा निधनमेतद्राजनं देवतासु प्रोतम् ॥ १ ॥

अग्नि हिंकार है, वायु प्रस्ताव है, आदित्य उद्गीथ है, नक्षत्र प्रतिहार हैं, चन्द्रमा निधन है—यह राजनसाम देवताओंमें अनुस्यूत है ॥ १॥

अग्निर्हिंकारः प्रथमस्थानत्वात् । वायुः प्रस्ताव आनन्तर्यसामान्यात् । आदित्य उद्गीथः श्रैष्ठ्यात् । नक्षत्राणि प्रतिहारः प्रतिहृतत्वात् । चन्द्रमा निधनं कर्मिणां तन्निधनात् । एतद्राजनं देवतासु प्रोतं देवतानां दीप्तिमत्त्वात् ॥ १ ॥अग्नि हिंकार है, क्योंकि उसका स्थान सर्वप्रथम है । आनन्तर्यमें तुल्यता होनेके कारण वायु प्रस्ताव है । उत्कृष्ट होनेके कारण आदित्य उद्गीथ है । प्रतिहृत होनेके कारण नक्षत्र प्रतिहार हैं तथा चन्द्रमा निधन है, क्योंकि उसीमें कर्मकाण्डियोंका निधन होता है । यह राजनसाम देवताओंमें अनुस्यूत है, क्योंकि देवगण दीप्तिमान् होते हैं ॥ १ ॥
विद्वत्फलम्—इस उपासनाके विद्वान्‌को प्राप्त होनेवाला फल—

स य एवमेतद्राजनं देवतासु प्रोतं वेदैतासामेव देवतानाँसलोकताँसार्ष्टिताँसायुज्यं गच्छति सर्व-

खण्ड २० ] शाङ्करभाष्यार्थ २०३


मायुरेति ज्योग्जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या ब्राह्मणान्न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥

वह पुरुष, जो इस प्रकार इस राजनसामको देवताओंमें अनुस्यूत जानता है, उन्हीं देवताओंके सालोक्य, सार्ष्टित्व (तुल्य ऐश्वर्य) और सायुज्यको प्राप्त हो जाता है। वह पूर्ण आयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है, प्रजा और पशुओंके द्वारा महान् होता है तथा कीर्तिके द्वारा भी महान् होता है। ब्राह्मणोंकी निन्दा न करे—यह व्रत है ॥ २ ॥

संस्कृत-भाष्यभाषानुवाद
एतासामेवाग्न्यादीनां देवतानां सलोकतां समानलोकतां सार्ष्टितां समानर्द्धित्वं सायुज्यं सयुग्भावमेकदेहदेहित्वमित्येतत्। वाशब्दोऽत्र लुप्तो द्रष्टव्यः। सलोकतां वेत्यादि। भावनाविशेषतः फलविशेषोपपत्तेः। गच्छति प्राप्नोति। समुच्चयानुपपत्तेश्च। ब्राह्मणान्न निन्देत्तद्व्रतम्।<br><br>“एते वै देवाः प्रत्यक्षं यद्ब्राह्मणाः”<br><br>इति श्रुतेर्ब्राह्मणनिन्दा देवनिन्दैवेति ॥ २ ॥इन अग्नि आदि देवताओंकी ही सलोकता—समानलोकता, सार्ष्टिता—समान ऐश्वर्य, . सायुज्य—परस्पर मिल जानेके भावको अर्थात् एक ही देहके देहित्वको प्राप्त हो जाता है। यहाँ ‘वा’ शब्द लुप्त समझना चाहिये। अतः ‘सलोकतां वा’ इत्यादि पाठ जानना चाहिये। क्योंकि भावनाविशेषसे फलविशेषकी उत्पत्ति होती हैं और इन सब फलोंका समुच्चय होना [अर्थात् एक ही उपासकको इन सब फलोंका प्राप्त होना] भी सम्भव नहीं है।<br><br>ब्राह्मणोंकी निन्दा न करे—यह इस प्रकारके उपासकके लिये नियम है। “ये जो ब्राह्मण हैं प्रत्यक्ष देवता ही हैं” ऐसी श्रुति होनेसे ब्राह्मण-निन्दा देवनिन्दा ही है ॥ २ ॥

इति च्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये विंशखण्ड-भाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २० ॥

एकविंश खण्ड

सर्वविषयक सामकी उपासना

त्रयी विद्या हिंकारस्त्रय इमे लोकाः प्रस्तावोऽग्नि-
र्वायुरादित्यः स उद्गीथो नक्षत्राणि वयाꣳसि मरीचयः
स प्रतिहारः सर्पा गन्धर्वाः पितरस्तन्निधनमेतत्साम
सर्वस्मिन्प्रोतम् ॥ १ ॥

त्रयीविद्या हिंकार है। ये तीन लोक प्रस्ताव हैं। अग्नि, वायु और आदित्य—ये उद्गीथ हैं। नक्षत्र, पक्षी और किरणें—ये प्रतिहार हैं। सर्प, गन्धर्व और पितृगण—ये निधन हैं। यह सामोपासना सबमें अनुस्यूत है ॥ १ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
त्रयी विद्या हिंकारः। अग्न्यादिसाम्न आनन्तर्यं त्रयीविद्याया अग्न्यादिकार्यत्वश्रुतेः। हिंकारः प्राथम्यात्सर्वकर्त्तव्यानाम्। त्रय इमे लोकास्तत्कार्यत्वादनन्तरा इति प्रस्तावः। अग्न्यादीनामुद्गीथत्वं श्रैष्ठ्यात्। नक्षत्रादीनां प्रतिहृत-त्रयीविद्या हिंकार है। त्रयीविद्या अग्नि आदिका कार्य है—ऐसी श्रुति होनेके कारण त्रयीविद्या अग्नि आदि सामोपासनाके पश्चात् कही गयी है। सम्पूर्ण कर्मोंके आरम्भमें होनेके कारण त्रयीविद्या हिंकार है। उसके कार्य होनेके कारण ये तीन लोक उसके पश्चाद्वर्ती हैं, अतः ये प्रस्ताव हैं। उत्कृष्टताके कारण अग्नि आदिका उद्गीथत्व बतलाया गया है। तथा प्रतिहृत होनेके कारण नक्षत्रादिकी प्रतिहारता है।

खण्ड २१ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०५


| त्वात्प्रतिहारत्वम् । सर्पादीनां धकारसामान्यान्निधनत्वम् ।<br><br>एतत्साम नामविशेषाभावात्सामसमुदायः सामशब्दः सर्वस्मिन्प्रोतम् । त्रयीविद्यादि हि सर्वम् । त्रयीविद्यादिदृष्ट्या हिंकारादिसामभक्तय उपास्याः। अतीतेष्वपि सामोपासनेषु येषु प्रोतं यद्यत्साम तद्दृष्ट्या तदुपास्यमिति । कर्माङ्गानां दृष्टिविशेषेणाज्यस्येव संस्कार्यत्वात् ॥ १ ॥ | और धकारमें समानता होनेके कारण सर्पादिका निधनत्व बतलाया गया है ।*<br><br>यह साम—किसी नामविशेषका अभाव होनेके कारण यह सामसमुदाय अर्थात् 'साम' शब्द सबमें अनुस्यूत है । त्रयीविद्या आदि ही सब कुछ हैं; तथा त्रयीविद्या आदि दृष्टिसे ही हिंकार आदि सामभक्तियोंकी उपासना करनी चाहिये । पीछे बतलायी हुई सामोपासनाओंमें भी जिन-जिनमें जो-जो साम अनुस्यूत है इन त्रयीविद्या आदिकी दृष्टिसे ही उनकी उपासना करनी चाहिये । [ 'पत्न्यवेक्षितमाज्यं भवति' इस वाक्यके अनुसार पत्नीकी दृष्टि पड़नेसे ] जैसे आज्य संस्कारयुक्त होता है, उसी प्रकार सभी कर्माङ्ग दृष्टिविशेषसे ही संस्कार किये जाने योग्य हैं ॥ १ ॥ |

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सर्वविषयसामविदः फलम्—सर्वविषयक सामके विद्वान्‌को मिलनेवाला फल—

स य एवमेतत्साम सर्वस्मिन्प्रोतं वेद सर्वꣳह भवति ॥ २ ॥


* यहाँ 'सर्प' शब्दका पर्याय 'विषधर', 'फणधर' आदि कोई धकारविशिष्ट शब्द लेना चाहिये; जैसा कि २।२।१ के भाष्यमें भाष्यकारने अन्तरिक्षको उद्गीथ बतलाते हुए अन्तरिक्षके पर्यायभूत गकारविशिष्ट 'गगन' शब्दका ग्रहण किया है ।

२०६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २

२०६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २


वह, जो इस प्रकार सबमें अनुस्यूत इस सामको जानता है सर्वरूप हो जाता है ॥ २ ॥

| सर्वं ह भवति सर्वेश्वरो भवतीत्यर्थः। निरुपचरितसर्वभावे हि दिक्स्थेभ्यो बलिप्राप्त्यनुपपत्तिः ॥ २ ॥ | सर्व हो जाता है अर्थात् सर्वेश्वर हो जाता है; क्योंकि सर्वभावका उपचार हुए बिना सम्पूर्ण दिशाओंमें स्थित पुरुषोंसे बलि प्राप्त होना सम्भव नहीं है ॥ २ ॥ |

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सर्वविषयक सामकी उपासनाका उत्कर्ष

तदेष श्लोको यानि पञ्चधा त्रीणि त्रीणि तेभ्यो न ज्यायः परमन्यदस्ति ॥ ३ ॥

इसी विषयमें यह मन्त्र भी है—जो पाँच प्रकारके तीन-तीन बतलाये गये हैं, उनसे श्रेष्ठ तथा उनके अतिरिक्त और कोई नहीं है ॥३॥

| तदेतस्मिन्नर्थ एष श्लोको मन्त्रोऽप्यस्ति । यानि पञ्चधा पञ्चप्रकारेण हिंकारादिविभागैः प्रोक्तानि त्रीणि त्रीणि त्रयीविद्यादीनि तेभ्यः पञ्चत्रिकेभ्यो ज्यायो महत्तरं परं च व्यतिरिक्तमन्यद्वस्त्वनन्तरं नास्ति न विद्यत इत्यर्थः । तत्रैव हि सर्वस्यान्तर्भावः ॥ ३ ॥ | इसी अर्थमें यह श्लोक यानी मन्त्र भी है । हिंकारादि-विभागोंद्वारा जो पाँच प्रकारसे बतलाये हुए तीन-तीन हैं यानी त्रयीविद्या आदि हैं, उन पाँच त्रिकोंकी अपेक्षा उत्कृष्ट-महान् और उनसे भिन्न कोई दूसरी वस्तु नहीं है—यह इसका तात्पर्य है। अर्थात् उन्हींमें सम्पूर्ण वस्तुओंका अन्तर्भाव हो जाता है ॥ ३ ॥ |

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यस्तद्वेद स वेद सर्वꣳसर्वा दिशो बलिमस्मै हरन्ति सर्वमस्मीत्युपासीत तद्व्रतं तद्व्रतम् ॥ ४ ॥

खण्ड २१ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०७


जो उसे जानता है वह सब कुछ जानता है । उसे सभी दिशाएँ बलि समर्पित करती हैं । 'मैं सब कुछ हूँ' इस प्रकार उपासना करे—यह नियम है, यह नियम है ॥ ४ ॥

| यस्तद्यथोक्तं सर्वात्मकं साम वेद स वेद सर्वं स सर्वज्ञो भवतीत्यर्थः । सर्वा दिशः सर्वदिक्स्था अस्मा एवंविदे बलिं भोगं हरन्ति प्रापयन्तीत्यर्थः । सर्वमस्मि भवामीत्येवमेतत्सामोपासीत तस्यैतदेव व्रतम् । द्विरुक्तिः सामोपासनसमाप्त्यर्था ॥ ४ ॥ | जो पुरुष इस पूर्वोक्त सर्वात्मक सामको जानता है, वह सबको जानता है; अर्थात् वह सर्वज्ञ हो जाता है । सम्पूर्ण दिशाएँ—सम्पूर्ण दिशाओंमें स्थित पुरुष इस प्रकार जाननेवाले इस उपासकके प्रति बलि यानी भोग उपस्थित करते हैं, अर्थात् उसे भोगोंकी प्राप्ति कराते हैं । 'मैं सब कुछ हूँ' इसी प्रकार इस सामकी उपासना करे—उस उपासकके लिये यही नियम है । यहाँ जो द्विरुक्ति है वह सामोपासनाकी समाप्तिके लिये है ॥ ४ ॥ |

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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये
एकविंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २१ ॥

द्वाविंश खण्ड

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विनर्दिगुणविशिष्ट सामकी उपासना

सामोपासनप्रसङ्गेन गानविशेषादिसंपदुद्गातुरुपदिश्यते; फलविशेषसंबन्धात् ।सामोपासनाके प्रसङ्गसे उद्गाताको गानविशेषादि¹ सम्पत्तिका उपदेश किया जाता है, क्योंकि इससे फलविशेषका सम्बन्ध होता है ।

विनर्दि साम्नो वृणे पशव्यमित्यग्नेरुद्गीथोऽनिरुक्तः प्रजापतेर्निरुक्तः सोमस्य मृदु श्लक्ष्णं वायोः श्लक्ष्णं बलवदिन्द्रस्य क्रौञ्चं बृहस्पतेरपध्वान्तं वरुणस्य तान्सर्वानेवोपसेवेत वारुणं त्वेव वर्जयेत् ॥ १ ॥

सामके ‘विनर्दि’ नामक गानका वरण करता हूँ; वह पशुओंके लिये हितकर है और अग्निदेवतासम्बन्धी उद्गीथ है । प्रजापतिका उद्गीथ अनिरुक्त है, सोमका निरुक्त है, वायुका मृदुल और श्लक्ष्ण ( सरलतासे उच्चारण किये जानेयोग्य ) है, इन्द्रका श्लक्ष्ण और बलवान् है, बृहस्पति का क्रौञ्च ( क्रौञ्चपक्षीके शब्दके समान ) है और वरुणका अपध्वान्त (भ्रष्ट) है । इन सभी उद्गीथोंका सेवन करे; केवल वरुणसम्बन्धी उद्गीथका ही परित्याग कर दे ॥ १ ॥

विनर्दि विशिष्टो नर्दः स्वरविशेष ऋषभकूजितसमोऽस्यास्तीति विनर्दि गानमिति वाक्य-विनर्दि—जिसका नर्द यानी स्वरविशेष ऋषभ ( बैल ) के शब्दके समान विशिष्ट है वह विनर्दिगान है, यहाँ ‘गान’ शब्द वाक्यशेष है । वह विनर्दि गान पशुओंके

१. ‘आदि’ शब्दसे स्वर एवं वर्णादि समझने चाहिये ।

खण्ड २२ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०९


शाङ्करभाष्यशाङ्करभाष्यार्थ
शेषः। तच्च साम्नः संबन्धि पशुभ्यो हितं पशव्यमग्नेरग्निदैवत्यं चोद्गीथ उद्गानम्। तदहमेवं विशिष्टं वृणे प्रार्थय इति कश्चिद्यजमान उद्गाता वा मन्यते।लिये हितकर और अग्निदेवतासम्बन्धी उद्गीथ—उद्गान है। इस प्रकारके उस विशिष्ट सामका मैं वरण करता हूँ अर्थात् उसके लिये प्रार्थना करता हूँ—इस प्रकार कोई यजमान अथवा उद्गाता मानता है।
अनिरुक्तोऽमुकसम इत्यविशेषितः प्रजापतेः प्रजापतिदैवत्यः स गानविशेषः, आनिरुक्त्यात्प्रजापतेः। निरुक्तः स्पष्टः सोमस्य सोमदैवत्यः स उद्गीथ इत्यर्थः। मृदु श्लक्ष्णं च गानं वायोर्वायुदैवत्यं तत्। श्लक्ष्णं बलवच्च प्रयत्नाधिक्योपेतं चेन्द्रस्यैन्द्रं तद्गानम्। क्रौञ्चं क्रौञ्चपक्षिनिनादसमं बृहस्पतेर्बार्हस्पत्यं तत्। अपध्वान्तं भिन्नकांस्यस्वरसमं वरुणस्यैतद्गानम्। तान् सर्वानिवोपसेवेत प्रयुञ्जीत वारुणं त्वेवैकं वर्जयेत् ॥ १ ॥प्रजापतिका जो गानविशेष है, वह अनिरुक्त है अर्थात् अमुकके तुल्य है—इस प्रकार विशेषरूपसे निरूपित नहीं किया जा सकता; क्योंकि प्रजापति भी विशेषरूपसे निरूपित नहीं किया जाता। सोमका अर्थात् सोमदेवतासम्बन्धी जो उद्गीथ है, वह निरुक्त यानी स्पष्ट है। जो गान मृदु और श्लक्ष्ण है, वह वायुका यानी वायुदेवतासम्बन्धी है। जो श्लक्ष्ण और बलवान् यानी अधिक प्रयत्नकी अपेक्षावाला है, वह इन्द्रका यानी इन्द्रसम्बन्धी गान है। जो क्रौञ्च यानी क्रौञ्चपक्षीके शब्दके समान है, वह बृहस्पतिका यानी बृहस्पतिदेवतासम्बन्धी गान है। अपध्वान्त अर्थात् फूटे हुए काँसेके स्वरके समान जो है, वह वरुणदेवतासम्बन्धी गान है। उन सभीका सेवन अर्थात् प्रयोग करे, एकमात्र वरुणसम्बन्धी गानका ही त्याग करे ॥ १ ॥

२१० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय २

२१० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय २

स्तवनके समय ध्यानका प्रकार

अमृतत्वं देवेभ्य आगायानीत्यागायेत्स्वधां पितृभ्य आशां मनुष्येभ्यस्तृणोदकं पशुभ्यः स्वर्गं लोकं यजमानायान्नमात्मन आगायानीत्येतानि मनसा ध्यायन्नप्रमत्तः स्तुवीत ॥ २ ॥

मैं देवताओंके लिये अमृतत्वका आगान ( साधन ) करूँ—इस प्रकार चिन्तन करते हुए आगान करे। पितृगणके लिये स्वधा, मनुष्योंके लिये आशा (उनकी इष्ट वस्तुओं), पशुओंके लिये तृण और जल, यजमानके लिये स्वर्गलोक और अपने लिये अन्नका आगान करूँ—इस प्रकार इनका मनसे ध्यान करते हुए प्रमादरहित होकर स्तुति करे ॥२॥

| अमृतत्वं देवेभ्य आगायानि साधयानि । स्वधां पितृभ्य आगायान्याशां मनुष्येभ्य आशां प्रार्थितमित्येतत् । तृणोदकं पशुभ्यः स्वर्गं लोकं यजमानायान्नमात्मने मह्यमागायानीत्येतानि मनसा चिन्तयन्ध्यायन्नप्रमत्तः स्वरोष्मव्यञ्जनादिभ्यः स्तुवीत ॥ २ ॥ | मैं देवताओंके लिये अमृतत्वका आगान—साधन करूँ; पितृगणके लिये स्वधाका आगान करूँ; मनुष्योंके लिये आशा यानी प्रार्थित वस्तुका [ साधन करूँ ]। पशुओंके लिये तृण और जल, यजमानके लिये स्वर्गलोक और अपने लिये अन्नका आगान करूँ—इस प्रकार इन बातोंका मनसे ध्यान-चिन्तन करते हुए स्वर, ऊष्म और व्यञ्जनादिके उच्चारणमें प्रमादरहित होकर स्तुति करे ॥ २ ॥ |


स्वरादि वर्णोंकी देवात्मकता

सर्वे स्वरा इन्द्रस्यात्मनः सर्व ऊष्माणः प्रजापते- रात्मानः सर्वे स्पर्शा मृत्योरात्मानस्तं यदि स्वरेषूपाल-

खण्ड २२ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ २११

भेतेन्द्रꣳशरणं प्रपन्नोऽभूवं स त्वा प्रति वक्ष्यतीत्येनं ब्रूयात् ॥ ३ ॥

सम्पूर्ण स्वर इन्द्रके आत्मा हैं, समस्त ऊष्मवर्ण प्रजापतिके आत्मा हैं, समस्त स्पर्शवर्ण मृत्युके आत्मा हैं। [इस प्रकार जाननेवाले] उस उद्गाताको यदि कोई पुरुष स्वरोंके उच्चारणमें दोष प्रदर्शित करे तो वह उससे कहे कि मैं इन्द्रके शरणागत हूँ; वही तुझे इसका उत्तर देगा ॥३॥

| सर्वे स्वरा अकारादय इन्द्रस्य बलकर्मणः प्राणस्यात्मानो देहावयवस्थानीयाः । सर्वे ऊष्माणः शषसहादयः प्रजापतेर्विराजः कश्यपस्य वात्मानः । सर्वे स्पर्शाः कादयो व्यञ्जनानि मृत्योरात्मानः । | अकारादि सम्पूर्ण स्वर, बल ही जिसका कर्म है उस इन्द्र यानी प्राणके आत्मा अर्थात् देह देहावयवस्थानीय हैं। श ष स ह आदि समस्त ऊष्मवर्ण प्रजापतिके अर्थात् विराट् या कश्यपके आत्मा हैं। क आदि (कवर्गसे लेकर पवर्ग तक) सम्पूर्ण स्पर्शवर्ण यानी व्यञ्जन मृत्युके आत्माके हैं। | | तमेवंविदमुद्गातारं यदि कश्चित्स्वरेषूपालभेत स्वरस्त्वया दुष्टः प्रयुक्त इत्येवमुपालब्ध इन्द्रं प्राणमीश्वरं शरणमाश्रयं प्रपन्नोऽभूवं स्वरान्प्रयुञ्जानोऽहं स इन्द्रो यत्तव वक्तव्यं त्वा त्वां प्रति वक्ष्यति स एव देव उत्तरं दास्यतीत्येनं ब्रूयात् ॥ ३ ॥ | इस प्रकार जाननेवाले उद्गाताको यदि कोई पुरुष स्वरोंमें उपालम्भ दे—'तूने दोषयुक्त स्वरका प्रयोग किया है'—इस प्रकार उपालम्भ दिये जानेपर वह उसे यह उत्तर दे कि स्वरोंका प्रयोग करते समय मैं इन्द्र अर्थात् प्राणरूप ईश्वरके शरणागत—आश्रित था; अतः तुझे जो कुछ उत्तर देना होगा, वह इन्द्रदेव ही देगा ॥ ३ ॥ |

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२१२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २

२१२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय २

अथ यद्येनमूष्मसूपालभेत प्रजापतिँशरणं प्रपन्नोऽभूवं स त्वा प्रति पेक्ष्यतीत्येनं ब्रूयादथ यद्येनꣳस्पर्शोषूपालभेत मृत्युँशरणं प्रपन्नोऽभूवं स त्वा प्रति धक्ष्यतीत्येनं ब्रूयात् ॥ ४ ॥

और यदि कोई इसे ऊष्मवर्णोंके उच्चारणमें दोष प्रदर्शित करे तो उससे कहे कि 'मैं प्रजापतिके शरणागत था, वही तेरा मर्दन करेगा।' और यदि कोई इसे स्पर्शोंके उच्चारणमें उलाहना दे तो उससे कहे कि 'मैं मृत्युकी शरणको प्राप्त था, वही तुझे दग्ध करेगा' ॥ ४ ॥

| अथ यद्येनमूष्मसु तथैवोपालभेत प्रजापतिं शरणं प्रपन्नोऽभूवं स त्वा त्वां प्रति पेक्ष्यति संचूर्णयिष्यतीत्येनं ब्रूयात् । अथ यद्येनं स्पर्शेषूपालभेत मृत्युं शरणं प्रपन्नोऽभूवं स त्वा त्वां प्रति धक्ष्यति भस्मीकरिष्यतीत्येनं ब्रूयात् ॥ ४ ॥ | और यदि उसी प्रकार कोई पुरुष इसे ऊष्मवर्णोंके उच्चारणमें दोष प्रदर्शित करे तो वह उससे कहे कि 'मैं प्रजापतिकी शरणको प्राप्त था, वही तुझे पीसेगा अर्थात् [तेरे मदको] अच्छी तरह चूर्ण करेगा।' और यदि कोई इसे स्पर्शोंके उच्चारणमें उलाहना दे तो उससे कहे कि 'मैं मृत्युके शरणागत था, वही तुझे दग्ध यानी भस्मीभूत करेगा' ॥४॥ |

वर्णोंके उच्चारणकालमें चिन्तनीय

सर्वे स्वरा घोषवन्तो बलवन्तो वक्तव्या इन्द्रे बलं ददानीति सर्व ऊष्माणोऽग्रस्ता अनिरस्ता विवृता वक्तव्याः प्रजापतेरात्मानं परिददानीति सर्वे स्पर्शा लेशोनानभिनिहिता वक्तव्या मृत्योरात्मानं परिहराणीति ॥ ५ ॥

सम्पूर्ण स्वर घोषयुक्त और बलयुक्त उच्चारण किये जाने चाहिये; अतः [ उनका उच्चारण करते समय ] 'मैं इन्द्रमें बलका आधान करूँ'

खण्ड २२ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१३

ऐसा [चिन्तन करना चाहिये]। सारे ऊष्मवर्ण अग्रस्त, अनिरस्त एवं विवृतरूपसे उच्चारण किये जाते हैं [अतः उन्हें बोलते समय ऐसा चिन्तन करना चाहिये कि] 'मैं प्रजापतिको आत्मदान करूँ'। समस्त स्पर्शवर्णोंको एक दूसरेसे तनिक भी मिलाये बिना ही बोलना चाहिये और उस समय 'मैं मृत्युसे अपना परिहार करूँ' [ऐसा चिन्तन करना चाहिये॥ ५॥

| यत इन्द्राद्यात्मानः स्वरादयोऽतः सर्वे स्वरा घोषवन्तो बलवन्तो वक्तव्याः । तथाहमिन्द्रे बलं ददानि बलमादधानीति । तथा सर्व ऊष्माणोऽग्रस्ता अन्तरप्रवेशिता अनिरस्ता बहिरप्रक्षिप्ता विवृता विवृतप्रयत्नोपेताः प्रजापतेरात्मानं परिददानि प्रयच्छानीति । सर्वे स्पर्शा लेशेन शनकैरनभिनिहिता अनभिनिक्षिप्ता वक्तव्या मृत्योरात्मानं बालानिव शनकैः परिहरद्भिर्मृत्योरात्मानं परिहराणीति ॥५॥ | क्योंकि ये स्वरादि इन्द्रादिरूप हैं, अतः सम्पूर्ण स्वर घोषयुक्त और बलयुक्त बोले जाने चाहिये। तथा [उस समय] 'मैं इन्द्रमें बलका आधान करूँ' ऐसा [चिन्तन करना चाहिये]। इसी प्रकार समस्त ऊष्म-वर्ण अग्रस्त—भीतर बिना प्रवेश कराये हुए, अनिरस्त—बाहर बिना निकाले हुए, और विवृत—विवृत¹ प्रयत्नसे युक्त उच्चारण किये जाने चाहिये और [उनका उच्चारण करते समय] 'मैं प्रजापतिको आत्मदान करूँ' ऐसा [चिन्तन करना चाहिये]। तथा सम्पूर्ण स्पर्शवर्ण लेशमात्र—थोड़े-से भी अनभिनिहित-परस्पर बिना मिले हुए बोलने चाहिये और [उस समय यह चिन्तन करना चाहिये कि] जिस प्रकार लोग धीरे-धीरे बालकोंको जल आदि-से बचाते हैं उसी प्रकार मैं अपनेको धीरे-धीरे मृत्युसे हटाऊँ ॥ ५ ॥ |

—: ० :— इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये द्वाविंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २२ ॥ —: ० :—


१. वर्णोंके स्पृष्ट, ईषत्स्पृष्ट, विवृत और संवृत ये चार प्रयत्न होते हैं। इसमें स्वर और ऊष्मोंका विवृत, स्पर्शोंका स्पृष्ट, अन्तःस्थोंका ईषत्स्पृष्ट और ह्रस्व अवर्णका संवृत प्रयत्न होता है।

त्रयोविंश खण्ड


तीन धर्मस्कन्ध

ओङ्कारस्योपासनविध्यर्थं त्रयो धर्मस्कन्धा इत्याद्यारभ्यते । नैवं मन्तव्यं सामावयवभूतस्यैवोद्गीथादिलक्षणस्योङ्कारस्योपासनात्फलं प्राप्यत इति । किं तर्हि ? यत्सर्वैरपि सामोपासनैः कर्मभिश्चाप्राप्यं तत्फलममृतत्वं केवलादोङ्कारोपासनात्प्राप्यत इति । तत्स्तुत्यर्थं सामप्रकरणे तदुपन्यासः—ओङ्कारोपासनाका विधान करनेके लिये 'त्रयो धर्मस्कन्धाः' इत्यादि प्रकरणका आरम्भ किया जाता है । ऐसा नहीं मानना चाहिये कि एकमात्र सामके अवयवभूत उद्गीथादिरूप ओङ्कारकी ही उपासनासे फलकी प्राप्ति होती है । तो फिर क्या बात है ? [ऐसा प्रश्न होनेपर कहते हैं—] जो सभी सामोपासनाओं और कर्मोंसे भी अप्राप्य है, वह अमृतत्वरूप फल केवल ओङ्कारोपासनासे ही प्राप्त हो जाता है । अतः उसकी स्तुतिके लिये सामोपासनाके प्रकरणमें उसका उल्लेख किया जाता है—

त्रयो धर्मस्कन्धा यज्ञोऽध्ययनं दानमिति प्रथमस्तप एव द्वितीयो ब्रह्मचार्याचार्यकुलवासी तृतीयोऽत्यन्तमात्मानमाचार्यकुलेऽवसादयन्सर्व एते पुण्यलोका भवन्ति ब्रह्मसँस्थोऽमृतत्वमेति ॥ १ ॥

धर्मके तीन स्कन्ध (आधारस्तम्भ) हैं—यज्ञ, अध्ययन और दान—यह पहला स्कन्ध है । तप ही दूसरा स्कन्ध है । आचार्यकुलमें रहनेवाला

खण्ड २३ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१५


ब्रह्मचारी जो आचार्यकुलमें अपने शरीरको अत्यन्त क्षीण कर देता है, तीसरा स्कन्ध है। ये सभी पुण्यलोकके भागी होते हैं। ब्रह्ममें सम्यक् प्रकारसे स्थित [चतुर्थाश्रमी संन्यासी] अमृतत्वको प्राप्त होता है ॥ १ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
त्रयस्त्रिसंख्याका धर्मस्य स्कन्धा धर्मस्कन्धा धर्मप्रविभागा इत्यर्थः । के ते ? इत्याह—यज्ञोऽग्निहोत्रादिः । अध्ययनं सनियमस्य ऋगादेरभ्यासः । दानं बहिर्वेदि यथाशक्तिद्रव्यसंविभागो भिक्षमाणेभ्यः । इत्येष प्रथमो धर्मस्कन्धः । गृहस्थसमवेतत्वान्निर्वर्तकेन गृहस्थेन निर्दिश्यते । प्रथम एक इत्यर्थो द्वितीयतृतीयश्रवणान्नाद्यार्थः ।धर्मस्कन्ध—धर्मके स्कन्ध यानी धर्मके विभाग त्रयः अर्थात् तीन संख्यावाले हैं। वे कौन-से हैं ? इसपर कहते हैं, यज्ञ—अग्निहोत्रादि, अध्ययन—नियमपूर्वक ऋग्वेदादिका अभ्यास और दान—वेदीके बाहर भिक्षा माँगनेवालोंको यथाशक्ति धन देना—इस प्रकार यह पहला धर्मस्कन्ध है। यह धर्म गृहस्थधर्मसम्बन्धी होनेके कारण उसके साधक गृहस्थरूपसे उसका निर्देश किया जाता है। यहाँ 'प्रथम' शब्दका अर्थ एक है, श्रुतिमें 'द्वितीय, तृतीय' शब्द होनेसे इसका प्रयोग आद्य अर्थमें नहीं किया गया।
तप एव द्वितीयस्तप इति कृच्छ्रचान्द्रायणादि तद्वांस्तापसः परिव्राड् वा न ब्रह्मसंस्थ आश्रमधर्ममात्रसंस्थो ब्रह्मसंस्थस्य त्वमृतत्वश्रवणात् । द्वितीयो धर्मस्कन्धः ।तप ही दूसरा धर्मस्कन्ध है। 'तप' इस शब्दसे कृच्छ्रचान्द्रायणादि समझने चाहिये, उनसे युक्त तपस्वी या परिव्राजक, ब्रह्मनिष्ठ नहीं बल्कि जो केवल आश्रमधर्ममें ही स्थित है; क्योंकि श्रुतिने ब्रह्मनिष्ठके लिये तो अमृतत्वकी प्राप्ति बतलायी है। यह दूसरा धर्मस्कन्ध है ।

२१६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय २

२१६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय २

| ब्रह्मचार्याचार्यकुले वस्तुं शीलमस्येत्याचार्यकुलवासी । अत्यन्तं यावज्जीवमात्मानं नियमैराचार्यकुलेऽवसादयन्क्षपयन्देहं तृतीयो धर्मस्कन्धः । अत्यन्तमित्यादिविशेषणान्नैष्ठिक इति गम्यते । उपकुर्वाणस्य स्वाध्यायग्रहणार्थत्वान्न पुण्यलोकत्वं ब्रह्मचर्येण । | जिसका स्वभाव आचार्यकुलमें निवास करनेका है, वह आचार्यकुलवासी ब्रह्मचारी, जो कि अत्यन्त अर्थात् यावज्जीवन अपनेको नियमोंद्वारा आचार्यकुलमें ही अवसन्न करता रहता है, यानी अपने देहको क्षीण करता रहता है, तीसरा धर्मस्कन्ध है । 'अत्यन्तम्' इत्यादि विशेषणोंसे यह जाना जाता है कि यहाँ नैष्ठिक ब्रह्मचारी अभिप्रेत है, क्योंकि उपकुर्वाण ब्रह्मचारीका ब्रह्मचर्य स्वाध्यायके लिये होनेसे उसके द्वारा पुण्यलोककी प्राप्ति नहीं हो सकती । | | सर्व एते त्रयोऽप्याश्रमिणो यथोक्तैर्धर्मैः पुण्यलोका भवन्ति । पुण्यो लोको येषां त इमे पुण्यलोका आश्रमिणो भवन्ति । अवशिष्टस्त्वनुक्तः परिव्राड् ब्रह्मसंस्थो ब्रह्मणि सम्यक्स्थितः सोऽमृतत्वं पुण्यलोकविलक्षणममरणभावमात्यन्तिकमेति नापेक्षिकं देवाद्यमृतत्ववत्; पुण्यलोकात् पृथगमृतत्वस्य विभागकरणात् । | ये सभी अर्थात् तीनों आश्रमोंवाले उपर्युक्त धर्मोंके कारण पुण्यलोकोंके भागी होते हैं । जिन्हें पुण्यलोक प्राप्त हो ऐसे ये आश्रमी पुण्यलोक कहलाते हैं। इनसे बचा हुआ, जिसका यहाँ उल्लेख नहीं किया गया, वह चतुर्थ परिव्राजक ब्रह्मसंस्थ ब्रह्ममें सम्यक् प्रकारसे स्थित होकर अमृतत्वको—पुण्यलोकोंसे भिन्न आत्यन्तिक अमरणभावको प्राप्त हो जाता है, देवादिकोंके अमरत्वके समान उसका अमृतत्व आपेक्षिक नहीं होता; क्योंकि यहाँ पुण्यलोकसे अमृतत्वका पृथक् विभाग किया गया है । |