भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 211

खण्ड २१ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०७


जो उसे जानता है वह सब कुछ जानता है । उसे सभी दिशाएँ बलि समर्पित करती हैं । 'मैं सब कुछ हूँ' इस प्रकार उपासना करे—यह नियम है, यह नियम है ॥ ४ ॥

| यस्तद्यथोक्तं सर्वात्मकं साम वेद स वेद सर्वं स सर्वज्ञो भवतीत्यर्थः । सर्वा दिशः सर्वदिक्स्था अस्मा एवंविदे बलिं भोगं हरन्ति प्रापयन्तीत्यर्थः । सर्वमस्मि भवामीत्येवमेतत्सामोपासीत तस्यैतदेव व्रतम् । द्विरुक्तिः सामोपासनसमाप्त्यर्था ॥ ४ ॥ | जो पुरुष इस पूर्वोक्त सर्वात्मक सामको जानता है, वह सबको जानता है; अर्थात् वह सर्वज्ञ हो जाता है । सम्पूर्ण दिशाएँ—सम्पूर्ण दिशाओंमें स्थित पुरुष इस प्रकार जाननेवाले इस उपासकके प्रति बलि यानी भोग उपस्थित करते हैं, अर्थात् उसे भोगोंकी प्राप्ति कराते हैं । 'मैं सब कुछ हूँ' इसी प्रकार इस सामकी उपासना करे—उस उपासकके लिये यही नियम है । यहाँ जो द्विरुक्ति है वह सामोपासनाकी समाप्तिके लिये है ॥ ४ ॥ |

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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये
एकविंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २१ ॥