छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 210, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें२०६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २
वह, जो इस प्रकार सबमें अनुस्यूत इस सामको जानता है सर्वरूप हो जाता है ॥ २ ॥
| सर्वं ह भवति सर्वेश्वरो भवतीत्यर्थः। निरुपचरितसर्वभावे हि दिक्स्थेभ्यो बलिप्राप्त्यनुपपत्तिः ॥ २ ॥ | सर्व हो जाता है अर्थात् सर्वेश्वर हो जाता है; क्योंकि सर्वभावका उपचार हुए बिना सम्पूर्ण दिशाओंमें स्थित पुरुषोंसे बलि प्राप्त होना सम्भव नहीं है ॥ २ ॥ |
—: ० :—
सर्वविषयक सामकी उपासनाका उत्कर्ष
तदेष श्लोको यानि पञ्चधा त्रीणि त्रीणि तेभ्यो न ज्यायः परमन्यदस्ति ॥ ३ ॥
इसी विषयमें यह मन्त्र भी है—जो पाँच प्रकारके तीन-तीन बतलाये गये हैं, उनसे श्रेष्ठ तथा उनके अतिरिक्त और कोई नहीं है ॥३॥
| तदेतस्मिन्नर्थ एष श्लोको मन्त्रोऽप्यस्ति । यानि पञ्चधा पञ्चप्रकारेण हिंकारादिविभागैः प्रोक्तानि त्रीणि त्रीणि त्रयीविद्यादीनि तेभ्यः पञ्चत्रिकेभ्यो ज्यायो महत्तरं परं च व्यतिरिक्तमन्यद्वस्त्वनन्तरं नास्ति न विद्यत इत्यर्थः । तत्रैव हि सर्वस्यान्तर्भावः ॥ ३ ॥ | इसी अर्थमें यह श्लोक यानी मन्त्र भी है । हिंकारादि-विभागोंद्वारा जो पाँच प्रकारसे बतलाये हुए तीन-तीन हैं यानी त्रयीविद्या आदि हैं, उन पाँच त्रिकोंकी अपेक्षा उत्कृष्ट-महान् और उनसे भिन्न कोई दूसरी वस्तु नहीं है—यह इसका तात्पर्य है। अर्थात् उन्हींमें सम्पूर्ण वस्तुओंका अन्तर्भाव हो जाता है ॥ ३ ॥ |
—: ० :—
यस्तद्वेद स वेद सर्वꣳसर्वा दिशो बलिमस्मै हरन्ति सर्वमस्मीत्युपासीत तद्व्रतं तद्व्रतम् ॥ ४ ॥