छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 212, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वाविंश खण्ड
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विनर्दिगुणविशिष्ट सामकी उपासना
| सामोपासनप्रसङ्गेन गानविशेषादिसंपदुद्गातुरुपदिश्यते; फलविशेषसंबन्धात् । | सामोपासनाके प्रसङ्गसे उद्गाताको गानविशेषादि¹ सम्पत्तिका उपदेश किया जाता है, क्योंकि इससे फलविशेषका सम्बन्ध होता है । |
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विनर्दि साम्नो वृणे पशव्यमित्यग्नेरुद्गीथोऽनिरुक्तः प्रजापतेर्निरुक्तः सोमस्य मृदु श्लक्ष्णं वायोः श्लक्ष्णं बलवदिन्द्रस्य क्रौञ्चं बृहस्पतेरपध्वान्तं वरुणस्य तान्सर्वानेवोपसेवेत वारुणं त्वेव वर्जयेत् ॥ १ ॥
सामके ‘विनर्दि’ नामक गानका वरण करता हूँ; वह पशुओंके लिये हितकर है और अग्निदेवतासम्बन्धी उद्गीथ है । प्रजापतिका उद्गीथ अनिरुक्त है, सोमका निरुक्त है, वायुका मृदुल और श्लक्ष्ण ( सरलतासे उच्चारण किये जानेयोग्य ) है, इन्द्रका श्लक्ष्ण और बलवान् है, बृहस्पति का क्रौञ्च ( क्रौञ्चपक्षीके शब्दके समान ) है और वरुणका अपध्वान्त (भ्रष्ट) है । इन सभी उद्गीथोंका सेवन करे; केवल वरुणसम्बन्धी उद्गीथका ही परित्याग कर दे ॥ १ ॥
| विनर्दि विशिष्टो नर्दः स्वरविशेष ऋषभकूजितसमोऽस्यास्तीति विनर्दि गानमिति वाक्य- | विनर्दि—जिसका नर्द यानी स्वरविशेष ऋषभ ( बैल ) के शब्दके समान विशिष्ट है वह विनर्दिगान है, यहाँ ‘गान’ शब्द वाक्यशेष है । वह विनर्दि गान पशुओंके |
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१. ‘आदि’ शब्दसे स्वर एवं वर्णादि समझने चाहिये ।