भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 219

खण्ड २३ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१५


ब्रह्मचारी जो आचार्यकुलमें अपने शरीरको अत्यन्त क्षीण कर देता है, तीसरा स्कन्ध है। ये सभी पुण्यलोकके भागी होते हैं। ब्रह्ममें सम्यक् प्रकारसे स्थित [चतुर्थाश्रमी संन्यासी] अमृतत्वको प्राप्त होता है ॥ १ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
त्रयस्त्रिसंख्याका धर्मस्य स्कन्धा धर्मस्कन्धा धर्मप्रविभागा इत्यर्थः । के ते ? इत्याह—यज्ञोऽग्निहोत्रादिः । अध्ययनं सनियमस्य ऋगादेरभ्यासः । दानं बहिर्वेदि यथाशक्तिद्रव्यसंविभागो भिक्षमाणेभ्यः । इत्येष प्रथमो धर्मस्कन्धः । गृहस्थसमवेतत्वान्निर्वर्तकेन गृहस्थेन निर्दिश्यते । प्रथम एक इत्यर्थो द्वितीयतृतीयश्रवणान्नाद्यार्थः ।धर्मस्कन्ध—धर्मके स्कन्ध यानी धर्मके विभाग त्रयः अर्थात् तीन संख्यावाले हैं। वे कौन-से हैं ? इसपर कहते हैं, यज्ञ—अग्निहोत्रादि, अध्ययन—नियमपूर्वक ऋग्वेदादिका अभ्यास और दान—वेदीके बाहर भिक्षा माँगनेवालोंको यथाशक्ति धन देना—इस प्रकार यह पहला धर्मस्कन्ध है। यह धर्म गृहस्थधर्मसम्बन्धी होनेके कारण उसके साधक गृहस्थरूपसे उसका निर्देश किया जाता है। यहाँ 'प्रथम' शब्दका अर्थ एक है, श्रुतिमें 'द्वितीय, तृतीय' शब्द होनेसे इसका प्रयोग आद्य अर्थमें नहीं किया गया।
तप एव द्वितीयस्तप इति कृच्छ्रचान्द्रायणादि तद्वांस्तापसः परिव्राड् वा न ब्रह्मसंस्थ आश्रमधर्ममात्रसंस्थो ब्रह्मसंस्थस्य त्वमृतत्वश्रवणात् । द्वितीयो धर्मस्कन्धः ।तप ही दूसरा धर्मस्कन्ध है। 'तप' इस शब्दसे कृच्छ्रचान्द्रायणादि समझने चाहिये, उनसे युक्त तपस्वी या परिव्राजक, ब्रह्मनिष्ठ नहीं बल्कि जो केवल आश्रमधर्ममें ही स्थित है; क्योंकि श्रुतिने ब्रह्मनिष्ठके लिये तो अमृतत्वकी प्राप्ति बतलायी है। यह दूसरा धर्मस्कन्ध है ।