छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 217, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड २२ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१३
ऐसा [चिन्तन करना चाहिये]। सारे ऊष्मवर्ण अग्रस्त, अनिरस्त एवं विवृतरूपसे उच्चारण किये जाते हैं [अतः उन्हें बोलते समय ऐसा चिन्तन करना चाहिये कि] 'मैं प्रजापतिको आत्मदान करूँ'। समस्त स्पर्शवर्णोंको एक दूसरेसे तनिक भी मिलाये बिना ही बोलना चाहिये और उस समय 'मैं मृत्युसे अपना परिहार करूँ' [ऐसा चिन्तन करना चाहिये॥ ५॥
| यत इन्द्राद्यात्मानः स्वरादयोऽतः सर्वे स्वरा घोषवन्तो बलवन्तो वक्तव्याः । तथाहमिन्द्रे बलं ददानि बलमादधानीति । तथा सर्व ऊष्माणोऽग्रस्ता अन्तरप्रवेशिता अनिरस्ता बहिरप्रक्षिप्ता विवृता विवृतप्रयत्नोपेताः प्रजापतेरात्मानं परिददानि प्रयच्छानीति । सर्वे स्पर्शा लेशेन शनकैरनभिनिहिता अनभिनिक्षिप्ता वक्तव्या मृत्योरात्मानं बालानिव शनकैः परिहरद्भिर्मृत्योरात्मानं परिहराणीति ॥५॥ | क्योंकि ये स्वरादि इन्द्रादिरूप हैं, अतः सम्पूर्ण स्वर घोषयुक्त और बलयुक्त बोले जाने चाहिये। तथा [उस समय] 'मैं इन्द्रमें बलका आधान करूँ' ऐसा [चिन्तन करना चाहिये]। इसी प्रकार समस्त ऊष्म-वर्ण अग्रस्त—भीतर बिना प्रवेश कराये हुए, अनिरस्त—बाहर बिना निकाले हुए, और विवृत—विवृत¹ प्रयत्नसे युक्त उच्चारण किये जाने चाहिये और [उनका उच्चारण करते समय] 'मैं प्रजापतिको आत्मदान करूँ' ऐसा [चिन्तन करना चाहिये]। तथा सम्पूर्ण स्पर्शवर्ण लेशमात्र—थोड़े-से भी अनभिनिहित-परस्पर बिना मिले हुए बोलने चाहिये और [उस समय यह चिन्तन करना चाहिये कि] जिस प्रकार लोग धीरे-धीरे बालकोंको जल आदि-से बचाते हैं उसी प्रकार मैं अपनेको धीरे-धीरे मृत्युसे हटाऊँ ॥ ५ ॥ |
—: ० :— इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये द्वाविंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २२ ॥ —: ० :—
१. वर्णोंके स्पृष्ट, ईषत्स्पृष्ट, विवृत और संवृत ये चार प्रयत्न होते हैं। इसमें स्वर और ऊष्मोंका विवृत, स्पर्शोंका स्पृष्ट, अन्तःस्थोंका ईषत्स्पृष्ट और ह्रस्व अवर्णका संवृत प्रयत्न होता है।