भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 208, कुल 978 में से

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पृष्ठ 208

एकविंश खण्ड

सर्वविषयक सामकी उपासना

त्रयी विद्या हिंकारस्त्रय इमे लोकाः प्रस्तावोऽग्नि-
र्वायुरादित्यः स उद्गीथो नक्षत्राणि वयाꣳसि मरीचयः
स प्रतिहारः सर्पा गन्धर्वाः पितरस्तन्निधनमेतत्साम
सर्वस्मिन्प्रोतम् ॥ १ ॥

त्रयीविद्या हिंकार है। ये तीन लोक प्रस्ताव हैं। अग्नि, वायु और आदित्य—ये उद्गीथ हैं। नक्षत्र, पक्षी और किरणें—ये प्रतिहार हैं। सर्प, गन्धर्व और पितृगण—ये निधन हैं। यह सामोपासना सबमें अनुस्यूत है ॥ १ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
त्रयी विद्या हिंकारः। अग्न्यादिसाम्न आनन्तर्यं त्रयीविद्याया अग्न्यादिकार्यत्वश्रुतेः। हिंकारः प्राथम्यात्सर्वकर्त्तव्यानाम्। त्रय इमे लोकास्तत्कार्यत्वादनन्तरा इति प्रस्तावः। अग्न्यादीनामुद्गीथत्वं श्रैष्ठ्यात्। नक्षत्रादीनां प्रतिहृत-त्रयीविद्या हिंकार है। त्रयीविद्या अग्नि आदिका कार्य है—ऐसी श्रुति होनेके कारण त्रयीविद्या अग्नि आदि सामोपासनाके पश्चात् कही गयी है। सम्पूर्ण कर्मोंके आरम्भमें होनेके कारण त्रयीविद्या हिंकार है। उसके कार्य होनेके कारण ये तीन लोक उसके पश्चाद्वर्ती हैं, अतः ये प्रस्ताव हैं। उत्कृष्टताके कारण अग्नि आदिका उद्गीथत्व बतलाया गया है। तथा प्रतिहृत होनेके कारण नक्षत्रादिकी प्रतिहारता है।