छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 207, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 207
खण्ड २० ] शाङ्करभाष्यार्थ २०३
मायुरेति ज्योग्जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या ब्राह्मणान्न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥
वह पुरुष, जो इस प्रकार इस राजनसामको देवताओंमें अनुस्यूत जानता है, उन्हीं देवताओंके सालोक्य, सार्ष्टित्व (तुल्य ऐश्वर्य) और सायुज्यको प्राप्त हो जाता है। वह पूर्ण आयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है, प्रजा और पशुओंके द्वारा महान् होता है तथा कीर्तिके द्वारा भी महान् होता है। ब्राह्मणोंकी निन्दा न करे—यह व्रत है ॥ २ ॥
| संस्कृत-भाष्य | भाषानुवाद |
|---|---|
| एतासामेवाग्न्यादीनां देवतानां सलोकतां समानलोकतां सार्ष्टितां समानर्द्धित्वं सायुज्यं सयुग्भावमेकदेहदेहित्वमित्येतत्। वाशब्दोऽत्र लुप्तो द्रष्टव्यः। सलोकतां वेत्यादि। भावनाविशेषतः फलविशेषोपपत्तेः। गच्छति प्राप्नोति। समुच्चयानुपपत्तेश्च। ब्राह्मणान्न निन्देत्तद्व्रतम्।<br><br>“एते वै देवाः प्रत्यक्षं यद्ब्राह्मणाः”<br><br>इति श्रुतेर्ब्राह्मणनिन्दा देवनिन्दैवेति ॥ २ ॥ | इन अग्नि आदि देवताओंकी ही सलोकता—समानलोकता, सार्ष्टिता—समान ऐश्वर्य, . सायुज्य—परस्पर मिल जानेके भावको अर्थात् एक ही देहके देहित्वको प्राप्त हो जाता है। यहाँ ‘वा’ शब्द लुप्त समझना चाहिये। अतः ‘सलोकतां वा’ इत्यादि पाठ जानना चाहिये। क्योंकि भावनाविशेषसे फलविशेषकी उत्पत्ति होती हैं और इन सब फलोंका समुच्चय होना [अर्थात् एक ही उपासकको इन सब फलोंका प्राप्त होना] भी सम्भव नहीं है।<br><br>ब्राह्मणोंकी निन्दा न करे—यह इस प्रकारके उपासकके लिये नियम है। “ये जो ब्राह्मण हैं प्रत्यक्ष देवता ही हैं” ऐसी श्रुति होनेसे ब्राह्मण-निन्दा देवनिन्दा ही है ॥ २ ॥ |