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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished978 pages

३०६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३

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३०६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ३

| स्मरण्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्” (गीता ८।६) इत्यादि। यत एवं व्यवस्था शास्त्रदृष्टातः स एवं जानन्क्रतुं कुर्वीत यादृशं क्रतुं वक्ष्यामस्तम्। यत एवं शास्त्रप्रामाण्यादुपपद्यते क्रत्वनुरूपं फलम्, अतः स कर्तव्यः क्रतुः ॥ १ ॥ | जिस भावको स्मरण करता हुआ अन्तमें शरीर त्यागता है [उसी-उसी भावको प्राप्त होता है]” क्योंकि ऐसी व्यवस्था शास्त्रप्रतिपादित है, अतः इस प्रकार जाननेवाला वह पुरुष क्रतु करे—जिस प्रकारका क्रतु हम बतलाते हैं, वैसा ही क्रतु करे। क्योंकि इस प्रकार शास्त्रप्रामाण्यसे निश्चयके अनुरूप ही फल मिलना सिद्ध होता है, इसलिये उसे वह निश्चय करना चाहिये ॥ १ ॥ |

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समग्र ब्रह्ममें आरोपित गुण

कथम् ?किस प्रकार निश्चय करना चाहिये ?

मनोमयः प्राणशरीरो भारूपः सत्यसंकल्प आकाशात्मा सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः ॥ २ ॥

[ वह ब्रह्म ] मनोमय, प्राणशरीर, प्रकाशस्वरूप, सत्यसंकल्प, आकाशशरीर, सर्वकर्मा, सर्वकाम, सर्वगन्ध, सर्वरस, इस सम्पूर्ण जगत्‌को सब ओरसे व्याप्त करनेवाला, वाक्रहित और सम्भ्रमशून्य है ॥ २ ॥

मनोमयो मनःप्रायः, मनुतेऽनेनेति मनस्तत्स्ववृत्त्या विष-मनोमय—मनःप्राय; जिसके द्वारा जीव मनन करता है उसे मन कहते हैं, यह अपनी वृत्तिद्वारा
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खण्ड १४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३०७


संस्कृतहिन्दी अनुवाद
येषु प्रवृत्तं भवति, तेन मनसा तन्मयः; तथा प्रवृत्त इव तत्प्रायो निवृत्त इव च। अत एव प्राणशरीरः प्राणो लिङ्गात्मा विज्ञानक्रियाशक्तिद्वयसंमूर्च्छितः; “यो वै प्राणः सा प्रज्ञा या वा प्रज्ञा स प्राणः” (कौ० उ० ३। ३) इति श्रुतेः। स शरीरं यस्य स प्राणशरीरः, “मनोमयः प्राणशरीरनेता” (मु० उ० २। २। ७) इति च श्रुत्यन्तरात्।विषयोंमें प्रवृत्त हुआ करता है। उस मनके कारण वह मनोमय है; अतः पुरुष मनःप्राय होकर मनके प्रवृत्त होनेपर प्रवृत्त-सा होता है और निवृत्त होनेपर निवृत्त-सा हो जाता है। इसीलिये वह प्राणशरीर है, “जो प्राण है वही प्रज्ञा है और जो प्रज्ञा है वह प्राण है” इस श्रुतिके अनुसार विज्ञान और क्रिया इन दो शक्तियोंसे मिलकर बना हुआ लिङ्गशरीर ही प्राण है; वह प्राण जिसका शरीर है उसे प्राणशरीर कहते हैं; जैसा कि “आत्मा मनोमय और प्राणरूप शरीरको [अन्य देहमें] ले जानेवाला है” इस अन्य श्रुतिसे सिद्ध होता है।
भारूपः, भा दीप्तिश्चैतन्यलक्षणं रूपं यस्य स भारूपः। सत्यसंकल्पः, सत्या अवितथाः संकल्पा यस्य सोऽयं सत्यसंकल्पः। न यथा संसारिण इवानैकान्तिकफलः संकल्प ईश्वरस्येत्यर्थः। अनृतेन मिथ्याफलत्वहेतुना प्रत्यूढत्वात्संकल्पस्य मिथ्याफलत्वम्। वक्ष्यति— ‘अनृतेन हि प्रत्यूढाः’ इतिभारूप—भा—दीप्ति अर्थात् चैतन्य ही जिसका रूप है उसे भारूप कहते हैं। सत्यसंकल्प— जिसके संकल्प सत्य यानी अमिथ्या हैं वह यह ब्रह्म सत्यसंकल्प है। तात्पर्य यह है कि संसारी पुरुषके समान ईश्वरका संकल्प अनैकान्तिक (कभी हो, कभी न हो ऐसे) फलवाला नहीं है। संसारी जीवका संकल्प अनृत अर्थात् मिथ्या फलरूप हेतुसे प्रत्यूढ—वृद्धिको प्राप्त होनेके कारण मिथ्या फलवाला होता है। ‘वे अनृतसे प्रत्यूढ हैं’ ऐसा आगे चलकर श्रुति कहेगी भी।

३०८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३

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३०८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ३
आकाशात्मा, आकाश इवात्मा स्वरूपं यस्य स आकाशात्मा। सर्वगतत्वं सूक्ष्मत्वं रूपादिहीनत्वं चाकाशतुल्यतेश्वरस्य। सर्वकर्मा, सर्वं विश्वं तेनेश्वरेण क्रियत इति जगत्सर्वं कर्मास्य स सर्वकर्मा; "स हि सर्वस्य कर्ता" (बृ० उ० ४।४।१३) इति श्रुतेः। सर्वकामः सर्वे कामा दोषरहिता अस्येति सर्वकामः; "धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि" (गीता ७।११) इति स्मृतेः।आकाशात्मा—जिसका आत्मा यानी स्वरूप आकाशके समान हो उसे 'आकाशात्मा' कहते हैं। सर्वत्र व्यापक, सूक्ष्म तथा रूप आदिसे रहित होना ही ईश्वरका आकाशके समान होना है। सर्वकर्मा--उस ईश्वरके द्वारा सर्व यानी विश्वका निर्माण किया जाता है—इसलिये यह सारा जगत् उसका कर्म है; अतः वह ईश्वर सर्वकर्मा है, जैसा कि "वही सबका कर्ता है" इस श्रुतिसे सिद्ध होता है। सर्वकाम—सम्पूर्ण दोषरहित काम उस परमात्माके ही हैं इसलिये वह सर्वकाम है; जैसा कि "मैं प्राणियोंमें धर्मसे अविरुद्ध काम हूँ" इस स्मृतिसे प्रमाणित होता है।
ननु कामोऽस्मीति वचनादिह बहुव्रीहिर्न संभवति सर्वकाम इति।शङ्का—किंतु 'कामोऽस्मि' (मैं काम हूँ) ऐसा वचन होनेके कारण 'सर्वकाम' इस पदमें बहुव्रीहिसमास नहीं हो सकता ?
न; कामस्य कर्तव्यत्वाच्छब्दादिवत्पारार्थ्यप्रसङ्गाच्चसमाधान—नहीं, क्योंकि काम का कार्यत्व स्वीकृत किया गया है*; इसलिये शब्दादिके समान भगवान्की भी

* अतः यदि बहुव्रीहि न मानकर कर्मधारय मानें तो समस्त काम (कार्य) और ब्रह्म एकरूप सिद्ध होंगे, ऐसी दशामें जैसे कार्य अनादि नहीं है उसी प्रकार ब्रह्म भी अनादि नहीं माना जा सकेगा। इसके अतिरिक्त जैसे सभी कार्य किसी चेतन कर्ताके अधीन होते हैं उसी तरह ब्रह्ममें भी पराधीनताका दोष उपस्थित होगा। इतना ही नहीं, शब्दादिके समान काम भी पदार्थ है अतः काम और ब्रह्मकी एकता माननेपर ब्रह्ममें भी पदार्थताकी आपत्ति होने लगेगी; इसलिये यहाँ बहुव्रीहिसमास ही ठीक है।

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खण्ड १४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३०९


देवस्य। तस्माद्यथेह सर्वकाम इति बहुव्रीहिस्तथा कामोऽस्मीति स्मृत्यर्थो वाच्यः।परार्थताका प्रसङ्ग उपस्थित होगा।<br>अतः जिस प्रकार यहाँ 'सर्वकामः' पदमें बहुव्रीहिसमास किया गया है उसी प्रकार 'कामोऽस्मि' इस स्मृतिका अर्थ करना चाहिये। ✽
सर्वगन्धः, सर्वे गन्धाः सुखकरा अस्य सोऽयं सर्वगन्धः। "पुण्यो गन्धः पृथिव्याम्" (गीता ७।९) इति स्मृतेः। तथा रसा अपि विज्ञेया अपुण्यगन्धरसग्रहणस्य पाप्मसम्बन्धनिमित्तत्वश्रवणात्। "तस्मात्तेनोभयं जिघ्रति सुरभि च दुर्गन्धि च। पाप्मना ह्येष विद्धः" (छा० उ० १।२।२) इति श्रुतेः। न च पाप्मसंसर्ग ईश्वरस्य, अविद्यादिदोषस्यानुपपत्तेः।सर्वगन्ध—समस्त सुखकर गन्ध उसीके हैं इसलिये वह 'सर्वगन्ध' है; जैसा कि "पृथिवीमें मैं पुण्यगन्ध हूँ" इस स्मृतिसे सिद्ध होता है। इसी प्रकार पुण्यरस भी उसीके समझने चाहिये। क्योंकि श्रुतिने अपुण्यगन्ध और रसका ग्रहण तो पापसम्बन्धके निमित्तसे बतलाया है; जैसा कि "इसीसे उस (घ्राणेन्द्रिय) के द्वारा सुगन्ध और दुर्गन्ध दोनोंको ही सूँघता है, क्योंकि यह पापसे विद्ध है" इस श्रुतिद्वारा प्रमाणित होता है। किंतु ईश्वरका पापसे संसर्ग नहीं है, क्योंकि उसमें अविद्यादि दोष होने सम्भव नहीं हैं।
सर्वमिदं जगदभ्यात्तोऽभिव्याप्तः। अततेर्व्याप्त्यर्थस्य कर्तरि निष्ठा। तथावाकी, उच्यते-इस सम्पूर्ण जगत्‌को वह सब ओर व्याप्त किये हुए है। व्याप्ति अर्थवाले 'अत्' धातुसे कर्ता अर्थमें निष्ठा (क्त) प्रत्यय होनेसे 'आत्तः' पद सिद्ध होता है। इसी प्रकार वह अवाकी भी है, जिसके द्वारा बोला जाता है उसे 'वाक्'

✽ तात्पर्य यह कि उक्त गीताके 'कामोऽस्मि' इन पदोंका 'काम हूँ' ऐसा अर्थ न करके 'कामवाला हूँ' यह अर्थ समझना चाहिये।

३१० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३

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३१०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ३

| ऽन्येति वाक्, वागेव वाकः। यद्वा वचेर्घञन्तस्य करणे वाकः। स यस्य विद्यते स वाकी न वाकी अवाकी। वाक्यप्रतिषेधश्चात्रोपलक्षणार्थः। गन्धरसादिश्रवणादीश्वरस्य प्राप्तानि घ्राणादीनि करणानि गन्धादिग्रहणाय। अतो वाक्प्रतिषेधेन प्रतिषिष्यन्ते तानि। "अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः" (श्वे० उ० ३।१९) इत्यादिमन्त्रवर्णात्। | कहते हैं, 'वाक्' ही 'वाक' है। अथवा 'वच्' धातुसे करण अर्थमें 'घञ्' प्रत्यय करनेसे 'वाक' शब्द निष्पन्न होता है। वह (वाक) जिसमें हो उसे 'वाकी' कहते हैं, जो वाकी न हो वही 'अवाकी' कहलाता है। यहाँ जो वाक्का प्रतिषेध किया गया है वह अन्य इन्द्रियोंका भी उपलक्षण करनेके लिये है। श्रुतिमें गन्ध और रसादिका प्रसंग होनेसे उन गन्धादिका ग्रहण करनेके लिये ईश्वरके घ्राणादि इन्द्रियाँ होनी सिद्ध होती हैं; अतः वाक्के प्रतिषेधद्वारा उन सबका भी प्रतिषेध किया गया है; जैसा कि "बिना हाथ-पावका ही वह वेगवान् और ग्रहण करनेवाला है तथा बिना नेत्रका होकर भी देखता और बिना कर्णका होकर भी सुनता है" इत्यादि मन्त्रवर्णसे सिद्ध होता है। | | अनादरोऽसंभ्रमः। अप्राप्तप्राप्तौ हि संभ्रमः स्यादनाप्तकामस्य। न त्वाप्तकामत्वान्नित्यतृप्तस्येश्वरस्य संभ्रमोऽस्ति क्वचित्॥२॥ | अनादर अर्थात् असम्भ्रम (आग्रहरहित) है। जो आप्तकाम नहीं है उसे ही अप्राप्त वस्तुकी प्राप्तिके लिये आग्रह हो सकता है। आप्तकाम होनेके कारण नित्यतृप्त ईश्वरको कहीं भी सम्भ्रम नहीं है॥२॥ |

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खण्ड १४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३११


ब्रह्म छोटेसे छोटा और बड़ेसे बड़ा है

एष म आत्मान्तर्हृदयेऽणीयान्व्रीहेर्वा यवाद्वा सर्षपाद्वा श्यामाकाद्वा श्यामाकतण्डुलाद्वैष म आत्मान्तर्हृदये ज्यायान्पृथिव्या ज्यायानन्तरिक्षाज्ज्यायान्दिवो ज्यायानेभ्यो लोकेभ्यः ॥ ३ ॥

हृदयकमलके भीतर यह मेरा आत्मा धानसे, यवसे, सरसोंसे, श्यामाकसे अथवा श्यामाकतण्डुलसे भी सूक्ष्म है तथा हृदयकमलके भीतर यह मेरा आत्मा पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्युलोक अथवा इन सब लोकोंकी अपेक्षा भी बड़ा है ॥ ३ ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
एष यथोक्तगुणो मे ममात्मान्तर्हृदये हृदयपुण्डरीकस्यान्तर्मध्येऽणीयानणुतरो व्रीहेर्वा यवाद््वेत्याद्यत्यन्तसूक्ष्मत्वप्रदर्शनार्थम् । श्यामाकाद्वा श्यामाकतण्डुलाद्वेति परिच्छिन्नपरिमाणादणीयानित्युक्तेऽणुपरिमाणत्वं प्राप्तमाशङ्क्य अतस्तत्प्रतिषेधायारभते—एष म आत्मान्तर्हृदये ज्यायान्पृथिव्या इत्यादिना । ज्यायःपरिमाणाच्च ज्यायस्त्वं दर्शयन्ननन्तपरिमा-यह उपर्युक्त गुणविशिष्ट मेरा आत्मा अन्तर्हृदय—हृदयकमलके अन्तः—भीतर व्रीहि (धान) से, अथवा यवादिसे भी अणीयान्—सूक्ष्मतर है, यह कथन आत्माकी अत्यन्त सूक्ष्मता प्रदर्शित करनेके लिये है। वह श्यामाक और श्यामाकतण्डुलसे भी सूक्ष्म है—इस प्रकार परिच्छिन्न परिमाणसे सूक्ष्म बतलानेपर उसका अणुपरिमाणत्व प्राप्त होता है—ऐसी आशङ्का कर अब उसका प्रतिषेध करनेके लिये 'एष म आत्मा ज्यायान्पृथिव्याः' इत्यादि वाक्यसे श्रुति आरम्भ करती है। इस प्रकार स्थूलतर पदार्थोंकी अपेक्षा भी उसकी महत्ता प्रदर्शित कर श्रुति 'मनोमयः'

३१२ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ३

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३१२ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ३


| णत्वं दर्शयति मनोमय इत्या- <br> दिना ज्यायानेभ्यो लोकेभ्य <br> इत्यन्तेन ॥ ३ ॥ | यहाँसे लेकर 'ज्यायानेभ्यो लोकेभ्यः' <br> यहाँतकके ग्रन्थद्वारा उसका अनन्त- <br> परिमाणत्व प्रदर्शित करती है ॥३॥ |


हृदयस्थित ब्रह्म और परब्रह्मकी एकता

सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिद-
मभ्यात्तोऽवाक्यनादर एष म आत्मान्तर्हृदय एतद्ब्रह्मै-
तमितः प्रेत्याभिसंभवितास्मीति यस्य स्यादद्धा न विच-
कित्सास्तोति ह स्माह शाण्डिल्यः शाण्डिल्यः ॥ ४ ॥

जो सर्वकर्मा, सर्वकाम, सर्वगन्ध, सर्वरस, इस सबको सब ओरसे व्याप्त करनेवाला, वाक्रहित और सम्भ्रमशून्य है वह मेरा आत्मा हृदयकमलके मध्यमें स्थित है। यही ब्रह्म है, इस शरीरसे मरकर जानेपर मैं इसीको प्राप्त होऊँगा। ऐसा जिसका निश्चय है और जिसे इस विषयमें कोई संदेह भी नहीं है [उसे ईश्वरभावकी ही प्राप्ति होती है] ऐसा शाण्डिल्यने कहा है, शाण्डिल्यने कहा है ॥ ४ ॥

| यथोक्तगुणलक्षण ईश्वरोऽत्रोपास्यत्वेन ध्येयो न तु तद्गुण- <br><br> (सगुणब्रह्माभिप्रेतं न निर्गुणमिति स्थापनम्) <br><br> विशिष्ट एव। यथा राजपुरुषमानय चित्रगुं वेत्युक्ते न विशेषणस्याप्यानयने व्याप्रियते तद्वदिहापि प्राप्तमतस्तन्निवृत्त्यर्थं सर्वकर्मेत्यादि | पूर्वोक्त गुणोंसे लक्षित होनेवाले ईश्वरका ही ध्यान करना चाहिये, उन गुणोंसे युक्तका नहीं; जिस प्रकार 'राजपुरुषको अथवा चित्रगुको¹ लाओ' ऐसा कहे जानेपर उनके विशेषण (राजा अथवा चित्र-विचित्र गाय) को लानेकी चेष्टा नहीं की जाती उसी प्रकार यहाँ भी निर्गुण ब्रह्म ही [उपास्यरूपसे] प्राप्त होता था; अतः उसकी निवृत्तिके लिये 'सर्व- |


१. जिसकी गाय चित्र-विचित्र रंगकी हो उसे 'चित्रगु' कहते हैं।

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खण्ड १४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१३


संस्कृतहिन्दी
पुनर्वचनम् । तस्मान्मनोमयत्वादिगुणविशिष्ट एवेश्वरो ध्येयः ।कर्म' इत्यादि विशेषणोंको पुनः कहा गया है। इसलिये मनोमयत्वादि गुणोंसे युक्त ईश्वरका ही ध्यान करना चाहिये ।
अत एव षष्ठसप्तमयोरिव "तत्त्वमसि" (छा० उ० ६।८।१६) "आत्मैवेदं सर्वम्" (छा० उ० ७।२५।२) इति नेह स्वाराज्येऽभिषिञ्चति, एष म आत्मेतद्ब्रह्मैतमितः प्रेत्याभिसंभवितास्मीति लिङ्गात्; न त्वात्मशब्देन प्रत्यगात्मैवोच्यते, ममेति षष्ठ्याः संबन्धार्थप्रत्यायकत्वात्, एतम् अभिसंभवितास्मीति च कर्मकर्तृत्वनिर्देशात् ।इसी छठे और सातवें अध्यायोंमें श्रुतिने जिस प्रकार "तत्त्वमसि" [तू वह है] और "आत्मैवेदं सर्वम्" [ यह सब आत्मा ही है ] इन वाक्योंद्वारा साधकको स्वाराज्यपर अभिषिक्त किया है उस प्रकार वह यहाँ नहीं करती; 'यह मेरा आत्मा है' 'यह ब्रह्म है' 'मैं यहाँसे मरकर जानेपर इसे प्राप्त होऊँगा' इत्यादि वाक्य इस विषयमें लिङ्ग हैं । यहाँ 'आत्मा' शब्दसे प्रत्यगात्माका ही निरूपण नहीं किया जाता, क्योंकि 'मम' यह षष्ठी उसके सम्बन्धार्थकी प्रतीति करानेवाली है । तथा 'मैं इसे प्राप्त होऊँगा' इन शब्दोंद्वारा ब्रह्म और आत्माके कर्मत्व और कर्तृत्वका निर्देश किया गया है ।
ननु षष्ठेऽप्यथ संपत्स्य इति <br> पूर्वपक्षिण आक्षेपः सत्संपत्तेः कालान्तरितत्वं दर्शयति ।पूर्व०-किंतु छठे अध्यायमें भी 'अथ संपत्स्ये' [ देहत्यागके अनन्तर सत्स्वरूप हो जाऊँगा ] इस वचनसे श्रुतिने सत्स्वरूप होनेमें कालका व्यवधान तो दिखाया ही है ।

३१४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३

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३१४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ३

| [उक्ताक्षेप-निरासः] <br> न, आरब्धसंस्कारशेषस्थित्यर्थपरत्वात्, न कालान्तरितार्थता; अन्यथा तत्त्वमसीत्येतस्यार्थस्य बाधप्रसङ्गात् । यद्यप्यात्मशब्दस्य प्रत्यगर्थत्वं सर्वं खल्विदं ब्रह्मेति च प्रकृतम्, एष म आत्मान्तर्हृदय एतद्ब्रह्मेत्युच्यते; तथाप्यन्तर्धानमीषदपरित्यज्यैवैतमात्मानमितोऽस्माच्छरीरात्प्रेत्याभिसंभवितास्मीत्युक्तम् । | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि यह वचन प्रारब्धकर्म-जनित संस्कारोंकी समाप्तिपर्यन्त ही जीवकी स्थिति बतलानेके लिये है, इसका तात्पर्य कालका व्यवधान प्रदर्शित करनेमें नहीं है; नहीं तो 'तू वह है' इस वाक्यके अर्थके बाध होनेका प्रसङ्ग उपस्थित होगा*। यद्यपि यहाँ 'आत्मा' शब्द प्रत्यगात्माका बोधक है, और 'यह सब निश्चय ब्रह्म ही है' इस वाक्यसे ब्रह्मका भी प्रकरण है तथा 'यह मेरा आत्मा हृदयके भीतर है—यह ब्रह्म है' ऐसा भी कहा गया है; तथापि 'थोड़ा-सा भी व्यवधान न छोड़कर मैं मरनेपर इस शरीरसे जाकर इसे प्राप्त होऊँगा'—ऐसा साधकका निश्चय बताया गया है। | | यथाक्रतुरूपस्यात्मनः प्रतिपत्तास्मीति यस्यैवंविदः स्याद्ध्वेदद्धा सत्यमेवं स्यामहं प्रेत्यैवं न | इस प्रकार जाननेवाले जिस विद्वान्को 'मैं अपने निश्चयके अनुरूप सगुण परमात्माको प्राप्त होनेवाला हूँ, मैं अवश्य. वैसा ही हो |


* इसमें ब्रह्म और आत्माके अभेदका वर्तमानकालिक क्रियापदसे प्रतिपादन किया गया है; अतः कालभेद स्वीकार करनेसे इसके अभिप्रायसे विरोध उपस्थित होगा ।

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खण्ड १४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१५


| स्यामिति न च विचिकित्सास्ति, इत्येतस्मिन्नर्थे क्रतुफलसंबन्धे; स तथैवेश्वरभावं प्रतिपद्यते विद्वानित्येतदाह स्मोक्तवान्किल शाण्डिल्यो नामर्षिः । द्विरभ्यास आदरार्थः ॥ ४ ॥ | जाऊँगा' ऐसा निश्चय है; और जिसे 'मैं ऐसा नहीं होऊँगा' ऐसी अपने निश्चयके फलके सम्बन्धमें शङ्का नहीं है, वह विद्वान् उसी प्रकार ईश्वर-भावको प्राप्त हो जाता है—ऐसा शाण्डिल्य नामक ऋषिने कहा है । 'शाण्डिल्यः शाण्डिल्यः' यह द्विरुक्ति आदरके लिये है ॥ ४ ॥ |


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इतिच्छाान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये चतुर्दशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १४ ॥

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पञ्चदश खण्ड

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विराट्कोशोपासना

| 'अस्य कुले वीरो जायते'<br><br>इत्युक्तम् । न वीरजन्ममात्रं<br><br>पितुस्त्राणाय; “तस्मात्पुत्रमनुशिष्टं<br><br>लोक्यमाहुः” इति श्रुत्यन्तरात् ।<br><br>अतस्तद्दीर्घायुष्ट्वं कथं स्यादित्येव-<br><br>मर्थं कोशविज्ञानारम्भः । अभ्य-<br><br>र्हितविज्ञानव्यासङ्गादनन्तरमेव<br><br>नोक्तं तदिदानीमेवारभ्यते— | 'इसके कुलमें वीर पुत्र होता है'—ऐसा ( ३ । १३ । ६ में ) कहा गया है । किंतु वीर पुत्रका जन्ममात्र ही पिताकी रक्षाका कारण नहीं हो सकता; जैसा कि “अतः अनुशासित पुत्रको [ ब्राह्मणलोग ] लोक्य [ पुण्यलोक प्राप्त करानेवाला ] कहते हैं” इस अन्य श्रुतिसे सिद्ध होता है। अतः उसे दीर्घायुष्ट्वकी प्राप्ति कैसे हो सकती है—इसीके लिये कोशविज्ञानका आरम्भ किया जाता है । अभ्यर्हित* उपासनाके प्रतिपादनमें संलग्न रहनेके कारण 'वीरो जायते' इस श्रुतिके अनन्तर ही इसका वर्णन नहीं किया, इसलिये अब आरम्भ किया जाता है— |


* गायत्रीरूप उपाधिसे युक्त ब्रह्मकी उपासनाको कौक्षेय ज्योतिमें आरोपित करके परब्रह्मकी उपासना करना अभ्यर्हित है और उसकी मनोमयत्वादिगुणविशिष्ट ब्रह्मोपासना अन्तरङ्ग है ।

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खण्ड १५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१७


अन्तरिक्षोदरः कोशो भूमिबुध्नो न जीर्यति दिशो
ह्यस्य स्रक्तयो द्यौरस्योत्तरं बिलꣳ स एष कोशो वसुधा-
नस्तस्मिन्विश्वमिदꣳ श्रितम् ॥ १ ॥

अन्तरिक्ष जिसका उदर है वह कोश पृथिवीरूप मूलवाला है। वह जीर्ण नहीं होता। दिशाएँ इसके कोण हैं, आकाश ऊपरका छिद्र है वह यह कोश वसुधान है। उसीमें यह सारा विश्व स्थित है ॥ १ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
अन्तरिक्षमुदरमन्तः सुषिरं यस्य सोऽयमन्तरिक्षोदरः, कोशः कोश इवानेकधर्मसादृश्यात्कोशः स च भूमिबुध्नः, भूमिर्बुध्नो मूलं यस्य स भूमिबुध्नः, न जीर्यति न विनश्यति, त्रैलोक्यात्मकत्वात् । सहस्रयुगकालावस्थायी हि सः ।अन्तरिक्ष है उदर—अन्तःछिद्र जिसका वह यह अन्तरिक्षोदर कोश जो अनेक धर्मोंमें सादृश्य रखनेके कारण कोशके समान कोश है, वह भूमिबुध्न–भूमि है बुध्न–मूल जिसका ऐसा भूमिबुध्न (पृथ्वीमूलक) है, वह त्रैलोक्यरूप होनेके कारण जीर्ण नहीं होता अर्थात् नाशको प्राप्त नहीं होता। क्योंकि वह तो सहस्रयुगकालपर्यन्त रहनेवाला है।
दिशो ह्यस्य सर्वाः स्रक्तयः कोणाः । द्यौरस्य कोशस्योत्तरमूर्ध्वं बिलम्, स एष यथोक्तगुणः कोशो वसुधानः, वसु धीयतेऽस्मिन्प्राणिनां कर्मफलाख्यमतो वसुधानः । तस्मिन्नन्तर्विश्वं समस्तं प्राणिकर्मफलं सहसमस्त दिशाएँ ही इसकी स्रक्तियाँ अर्थात् कोण हैं। द्युलोक इस कोशका ऊपरी छिद्र है। वह यह पूर्वोक्त गुणोंवाला कोश वसुधान है, इसमें प्राणियोंके कर्मफलसंज्ञक वसुका आधान किया जाता है, इसलिये यह कोश वसुधान है। तात्पर्य यह है कि उस कोशके भीतर ही प्राणियोंका सम्पूर्ण कर्मफल जिसका कि]

३१८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३

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३१८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ३

| तत्साधनैरिदं यद्गृह्यते प्रत्यक्षादि प्रमाणैः श्रितमाश्रितं स्थितमित्यर्थः ॥ १ ॥ | प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे ग्रहण किया जाता है, अपने साधनोंके सहित श्रित—आश्रित अर्थात् स्थित है ॥ १ ॥ |

—: ० :—

तस्य प्राची दिग्जुहूर्नाम सहमाना नाम दक्षिणा राज्ञीनाम प्रतीची सुभूता नामोदीची तासां वायुर्वत्सः स य एतमेवं वायुं दिशां वत्सं वेद न पुत्ररोदँरोदिति सोऽहमेतमेवं वायुंदिशां वत्सं वेद मा पुत्ररोदँरुदम्॥२॥

उस कोशकी पूर्व दिशा 'जुहू' नामवाली है, दक्षिण दिशा 'सहमाना' नामकी है, पश्चिम दिशा 'राज्ञी' नामवाली है तथा उत्तर दिशा 'सुभूता' नामकी है। उन दिशाओंका वायु वत्स है। वह, जो इस प्रकार इस वायुको दिशाओंके वत्सरूपसे जानता है पुत्रके निमित्तसे रोदन नहीं करता। वह मैं इस प्रकार इस वायुको दिशाओंके वत्सरूपसे जानता हूँ; अतः मैं पुत्रके कारण न रोऊँ ॥ २ ॥

| तस्यास्य प्राची दिक्प्राग्गतो भागो जुहूर्नाम जुह्वत्यस्यां दिशि कर्मिणः प्राङ्मुखाः सन्त इति जुहूर्नाम। सहमाना नाम सहन्तेऽस्यां पापकर्मफलानि यमपुर्यां प्राणिन इति सहमाना नाम दक्षिणा दिक्। तथा राज्ञी नाम प्रतीची पश्चिमा दिक्, | उस इस कोशकी प्राची दिशा—पूर्वकी ओरका भाग, 'जुहू' नामवाला है। कर्मठ लोग इस दिशामें पूर्वाभिमुख होकर हवन करते हैं इसलिये यह 'जुहू' नामवाली है। दक्षिण दिशा 'सहमाना' नामकी है, क्योंकि इसी दिशामें जीव यमपुरीमें अपने पापकर्मोंके फलरूप दुःखको सहन करते हैं, इसलिये दक्षिण दिशा 'सहमाना' नामवाली है। तथा प्रतीची यानी पश्चिम दिशा 'राज्ञी' नामकी है; वरुण राजासे |

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खण्ड १५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१९


भाष्यम्भाष्यार्थ
राज्ञी राज्ञा वरुणेनाधिष्ठिता संध्यारागयोगाद्वा। सुभूता नाम भूतिमद्भििरीश्वरकुबेरादिभिरधिष्ठितत्वात्सुभूता नामोदीची।<br><br>तासां दिशां वायुर्वत्सो दिग्जत्वाद्वायोः, पुरोवात इत्यादिदर्शनात्। यः कश्चित्पुत्रदीर्घजीविताथ्र्येवं यथोक्तगुणं वायुं दिशां वत्सममृतं वेद, स न पुत्ररोदं पुत्रनिमित्तं रोदनं न रोदिति पुत्रो न म्रियत इत्यर्थः।<br><br>यत एवं विशिष्टं कोशादिग्वत्सविषयं विज्ञानमतः सोऽहं पुत्रजीविताथ्र्यैवमेतं वायुं दिशां वत्सं वेद जाने। अतो मा पुत्ररोदं मा रुदं पुत्रमरणनिमित्तम्। पुत्ररोदो मम माभूदित्यर्थः॥२॥अधिष्ठित होनेके कारण अथवा सायंकालिक राग (लालिमा) के योगसे पश्चिम दिशा 'राज्ञी' है। उत्तर दिशा 'सुभूता' नामवाली है। ईश्वर, कुबेर आदि भूतिसम्पन्न देवताओंसे अधिष्ठित होनेके कारण उत्तर दिशा 'सुभूता' नामवाली है।<br><br>उन दिशाओंका वायु वत्स है, क्योंकि वायु दिशाओंसे ही उत्पन्न होनेवाला है। जैसा कि पूर्वीय वायु आदि प्रयोगोंसे देखा जाता है। वह कोई भी पुरुष, जो कि पुत्रके दीर्घजीवनकी कामनावाला है, यदि इस प्रकार पूर्वोक्त गुणवाले दिशाओंके वत्स अमृतरूप वायुको जानता है वह पुत्ररोद—पुत्रनिमित्तक रोदन नहीं करता। अर्थात् उसका पुत्र नहीं मरता, क्योंकि कोश और दिशाओंके वत्ससे सम्बन्ध रखनेवाला विज्ञान ऐसे गुणवाला है अतः अपने पुत्रके जीवनकी कामनावाला मैं दिशाओंके वत्सरूप इस वायुको इस प्रकार जानता हूँ; इसलिये पुत्ररोद—पुत्रके मरणसे होनेवाला रोदन न करूँ। अर्थात् मुझे पुत्रके लिये रोनेका प्रसङ्ग प्राप्त न हो॥ २ ॥

३२० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३

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३२०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ३

अरिष्टं कोशं प्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना प्राणं प्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना भूः प्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना भुवः प्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना स्वः प्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना ॥ ३ ॥

मैं अमुक अमुक अमुकके सहित अविनाशी कोशकी शरण हूँ; अमुक अमुक अमुकके सहित प्राणकी शरण हूँ; अमुक अमुक अमुकके सहित भूःकी शरण हूँ; अमुक-अमुक अमुकके सहित भुवःकी शरण हूँ; अमुक अमुक अमुकके सहित स्वःकी शरण हूँ* ॥ ३ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
अरिष्टमविनाशिनं कोशं यथोक्तं प्रपद्ये प्रपन्नोऽस्मि पुत्रायुषे । अमुनाऽमुनाऽमुनेति त्रिर्नाम गृह्णाति पुत्रस्य । तथा प्राणं प्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना, भूःप्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना, भुवःप्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना, स्वः प्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना, सर्वत्र प्रपद्य इति त्रिर्नाम गृह्णाति पुनः पुनः ॥ ३ ॥पुत्रकी दीर्घायुके लिये मैं पूर्वोक्त अरिष्ट—अविनाशी कोशकी शरण हूँ। 'अमुना अमुना अमुना' इसका यह तात्पर्य है कि तीन-तीन बार अपने पुत्रका नाम लेता है। तथा अमुक अमुक अमुकके सहित प्राणकी शरण हूँ; अमुक अमुक अमुकके सहित भूःकी शरण हूँ; अमुक अमुक अमुकके सहित भुवःकी शरण हूँ और अमुक अमुक अमुकके सहित स्वःकी शरण हूँ। सर्वत्र 'अमुक अमुक अमुकके सहित शरण हूँ' ऐसा कहकर बारम्बार तीन-तीन बार पुत्रका नाम लेता है ॥ ३ ॥

स यदवोचं प्राणं प्रपद्य इति प्राणो वा इदꣳसर्वं भूतं यदिदं किञ्च तमेव तत्प्रापत्सि ॥४॥ अथ यदवोचं


* इसमें जहाँ-जहाँ 'अमुक' शब्द आया है वहाँ अपने पुत्रके नामका उच्चारण करना चाहिये।

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खण्ड १५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३२१

भूः प्रपद्य इति पृथिवीं प्रपद्ये ऽन्तरिक्षं प्रपद्ये दिवं प्रपद्य इत्येव तदवोचम् ॥ ५ ॥ अथ यदवोचं भुवः प्रपद्य इत्यग्निं प्रपद्ये वायुं प्रपद्य आदित्यं प्रपद्य इत्येव तद्वोचम् ॥ ६ ॥ अथ यदवोचँस्वः प्रपद्य इत्यृग्वेदं प्रपद्ये यजुर्वेदं प्रपद्ये सामवेदं प्रपद्य इत्येव तदवोचं तदवोचम् ॥ ७ ॥

उस मैंने जो कहा कि 'मैं प्राणकी शरण हूँ' सो यह जो कुछ सम्पूर्ण भूतसमुदाय है प्राण ही है, उसीकी मैं शरण हूँ ॥ ४ ॥ तथा मैंने जो कहा कि 'मैं भूःकी शरण हूँ' इससे मैंने यही कहा है कि 'मैं पृथिवीकी शरण हूँ, अन्तरिक्षकी शरण हूँ और द्युलोककी शरण हूँ' ॥ ५ ॥ फिर मैंने जो कहा कि 'मैं भुवःकी शरण हूँ' इससे यह कहा गया है कि 'मैं अग्निकी शरण हूँ, वायुकी शरण हूँ और आदित्यकी शरण हूँ' ॥ ६ ॥ तथा मैंने जो कहा कि 'मैं स्वःकी शरण हूँ' इससे 'मैं ऋग्वेदकी शरण हूँ, यजुर्वेदकी शरण हूँ और सामवेदकी शरण हूँ' यही मैंने कहा है, यही मैंने कहा है ॥ ७ ॥

| स यदवोचं प्राणं प्रपद्य इति व्याख्यानार्थमुपन्यासः । प्राणो वा इदँसर्वं भूतं यदिदं जगत् । ‘यथा वारा नाभौ’ ( छा० उ० ७ । १५ । १ ) इति वक्ष्यति । अतस्तमेव सर्वं तत्त्वेन प्राणप्रतिपादनेन प्रापत्तिं प्रपन्नोऽभूवम् । तथा भूः प्रपद्य इति त्रीँल्लोकान् | 'उस मैंने जो कहा कि मैं प्राणकी शरण हूँ' इसीकी व्याख्या करनेके लिये विस्तार किया जाता है। यह जितना भी जगत् है सब प्राण ही है, 'जैसे कि नाभिमें अरे लगे रहते हैं [ उस प्रकार प्राणमें सम्पूर्ण भूत समर्पित हैं]' ऐसा आगे कहेंगे भी। अतः उस प्राणकी प्रतिपत्तिके द्वारा मैं उस सर्वभूत [विराट्] की ही शरण हूँ। मैंने जो यह कहा कि 'मैं भूः- |

३२२ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ३

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३२२ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ३


| भूरादीन्प्रपद्य इति तदवोचम् ।<br><br>अथ यदवोचं भुवः प्रपद्य इत्य-<br><br>ग्न्यादीन्प्रपद्य इति तदवोचम् ।<br><br>अथ यदवोचं स्वः प्रपद्य इत्यृ-<br><br>ग्वेदादीन्प्रपद्य इत्येव तदवोच-<br><br>मिति । उपरिष्टान्मन्त्राञ्जपेत्ततः<br><br>पूर्वोक्तमजरं कोशं सदिग्वत्सं<br><br>यथावद्ध्यात्वा । द्विर्वचनमादरा-<br><br>र्थम् ॥ ४-७ ॥ | की शरण हूँ' उससे यही कहा गया कि मैं पृथिवी आदि तीन लोकोंकी शरण हूँ । तथा मैंने जो कहा कि 'मैं भुवःकी शरण हूँ' उससे यही कहा गया है कि मैं अग्नि आदिकी शरण हूँ । और ऐसा जो कहा है कि 'मैं स्वःकी शरण हूँ' इससे यही कहा गया है कि मैं ऋग्वेदादिकी शरण हूँ । तत्पश्चात् उपर्युक्त अजर कोशका दिशाओंके वत्सके सहित विधिपूर्वक ध्यान कर ऊपरके मन्त्रों-को जपे । 'तदवोचं तदवोचम्' यह द्विरुक्ति आदरके लिये है ॥४-७॥ |


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये
पञ्चदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १५ ॥

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षोडश खण्ड

—: ० :—
आत्मयज्ञोपासना

पुत्रायुष उपासनमुक्तं जपञ्च ।<br>अथेदानीमात्मनो दीर्घजीवना-<br>येदमुपासनं जपं च विदधदाह ।<br>जीवन्हि स्वयं पुत्रादिफलेन<br>युज्यते, नान्यथा । इत्यत आ-<br>त्मानं यज्ञं संपादयति पुरुषः—पुत्रकी आयुके लिये उपासना<br>और जप कहे गये । अब अपनी<br>दीर्घायुके लिये इस जप और<br>उपासनाका विधान करता हुआ<br>वेद कहता है। पुरुष स्वयं जीवित<br>रहनेपर ही पुत्रादि फलसे युक्त<br>होता है, और किसी प्रकार नहीं;<br>इसीसे वह अपनेको यज्ञरूपसे<br>निष्पन्न करता है—

पुरुषो वाव यज्ञस्तस्य यानि चतुर्विंशतिवर्षाणि तत्प्रातःसवनं चतुर्विंशत्यक्षरा गायत्री गायत्रं प्रातःसवनं तदस्य वसवोऽन्वायत्ताः प्राणा वाव वसव एते हीदँसर्वं वासयन्ति ॥ १ ॥

निश्चय पुरुष ही यज्ञ है। उसके (उसकी आयुके) जो चौबीस वर्ष हैं, वे प्रातः सवन हैं। गायत्री चौबीस अक्षरोंवाली है; और प्रातःसवन गायत्री छन्दसे सम्बद्ध है। उस इस प्रातःसवनके वसुगण अनुगत हैं। प्राण ही वसु हैं, क्योंकि ये ही इस सबको बसाये हुए हैं ॥ १ ॥

पुरुषो जीवनविशिष्टः कार्य-<br>करणसंघातो यथाप्रसिद्ध एव ।<br>वावशव्दोऽवधारणार्थः । पुरुषजीवनसे युक्त देह और इन्द्रियोंका<br>संघात, जैसा कि प्रसिद्ध है, वही<br>‘पुरुष’ है। ‘वाव’ शब्द निश्चयार्थक<br>है। अतः तात्पर्य यह है कि पुरुष

छा० उ० ११—

३९४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३

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३९४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३


संस्कृत-भाष्यम्हिन्दी-अनुवाद
एव यज्ञ इत्यर्थः । तथा हि सामान्यैः संपादयति यज्ञत्वम् । कथम् ? तस्य पुरुषस्य यानि चतुर्विंशतिवर्षाण्यायुषस्तत्प्रातःसवनं पुरुषाख्यस्य यज्ञस्य ।ही यज्ञ है । अब श्रुति सदृशता दिखलाकर पुरुषकी यज्ञरूपता सिद्ध करती है । किस प्रकार ? (सो बतलाते हैं—) उस पुरुषकी आयुके जो चौबीस वर्ष हैं, वे उस पुरुषसंज्ञक यज्ञके प्रातःसवन हैं ।
केन सामान्येन ? इत्याह—चतुर्विंशत्यक्षरा गायत्री छन्दो गायत्रं गायत्रीछन्दस्कं हि विधियज्ञस्य प्रातःसवनम् । अतः प्रातःसवनसंपन्नेन चतुर्विंशतिवर्षायुषा युक्तः पुरुषः अतो विधियज्ञसादृश्याद्यज्ञः । तथोत्तरयोरप्यायुषोः सवनद्वयसंपत्तिस्त्रिष्टुब्जगत्यक्षरसंख्यासामान्यतो वाच्या ।वे किस समताके कारण प्रातःसवन हैं ? सो बतलाते हैं—गायत्री छन्द चौबीस अक्षरोंवाला है और विधियज्ञका प्रातःसवन भी गायत्र—गायत्रीछन्दवाला है । अतः पुरुष प्रातःसवनरूपसे निष्पन्न हुई चौबीस वर्षकी आयुसे युक्त है । इसीसे विधियज्ञसे सदृशता होनेके कारण वह यज्ञ है । इसी प्रकार पीछेकी दोनों आयुओंसे त्रिष्टुप् और जगती छन्दके अक्षरोंकी संख्यामें समानता होनेके कारण उनके द्वारा अन्य दोनों सवनोंकी निष्पत्ति बतलानी चाहिये ।
किं च तदस्य पुरुषयज्ञस्य प्रातःसवनं विधियज्ञस्येव वसवो देवा अन्वायत्ता अनुगताः, सवनदेवतात्वेन स्वामिन इत्यर्थः। पुरुषयज्ञेऽपि विधियज्ञ इवाग्न्यादयो वसवो देवाः प्राणा इत्यतोतथा विधियज्ञके समान इस पुरुषयज्ञके प्रातःसवनके भी वसु देवता अनुगत हैं । तात्पर्य यह है कि सवनदेवतारूपसे वे उसके स्वामी हैं । [इस कथनसे] विधियज्ञके समान पुरुषयज्ञमें भी अग्नि आदि ही वसुदेवता निश्चित होते हैं; अतः
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खण्ड १६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३२५


| विशिनष्टि । प्राणा वाव वसवो वागादयो वायवश्च; ते हि यस्मादिदं पुरुषादिप्राणिजातमेते वासयन्ति । प्राणेषु हि देहे वसत्सु सर्वमिदं वसति, नान्यथा; इत्यतो वसनाद्वासनाच्च वसवः ॥१॥ | श्रुति उनकी विशेषता ( विभिन्नता ) बतलाती है । [ पुरुषयज्ञमें ] वाक् आदि इन्द्रियाँ और प्राण आदि वायु ही वसु हैं, क्योंकि वे ही इस पुरुष आदि प्राणिसमुदायको वासित किये हुए हैं । देहमें प्राणोंके रहते हुए ही यह सब बसा हुआ है, और किसी प्रकार नहीं; अतः देहमें बसने अथवा उसे बसानेके कारण प्राण वसु हैं ॥ १ ॥ |

<br>

तं चेदेतस्मिन्वयसि किञ्चिदुपतपेत्स ब्रूयात्प्राणा वसव इदं मे प्रातःसवनं माध्यन्दिनꣳसवनमनुसंतनु- तेति माहं प्राणानां वसूनां मध्ये यज्ञो विलोप्सीयेत्यु- द्धैव तत एत्यगदो ह भवति ॥ २ ॥

यदि इस प्रातःसवनसम्पन्न आयुमें उसे कोई रोग आदि कष्ट पहुँचावे तो उसे इस प्रकार कहना चाहिये, 'हे प्राणरूप वसुगण ! मेरे इस प्रातःसवनको माध्यन्दिनसवनके साथ एकरूप कर दो; यज्ञस्वरूप मैं आप प्राणरूप वसुओंके मध्यमें विलुप्त ( नष्ट ) न होऊँ' तब उस कष्टसे मुक्त होकर वह नीरोग हो जाता है ॥ २ ॥

| तं चेद्यज्ञसंपादिनमेतस्मिन्प्रातःसवनसंपन्ने वयसि किञ्चिद्गदाध्यादि मरणशङ्काकारणमुपतपेद्दुःखमुत्पादयेत्स तदा यज्ञसंपादी | उस यज्ञसम्पादकको यदि प्रातःसवनरूपसे निष्पन्न हुई इस आयुमें मरणकी शङ्काकी कारणभूत कोई व्याधि आदि कष्ट पहुँचावे तो वह यज्ञसम्पादन करनेवाला पुरुष |