छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 312, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 312
| ३०८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३ |
|---|
| आकाशात्मा, आकाश इवात्मा स्वरूपं यस्य स आकाशात्मा। सर्वगतत्वं सूक्ष्मत्वं रूपादिहीनत्वं चाकाशतुल्यतेश्वरस्य। सर्वकर्मा, सर्वं विश्वं तेनेश्वरेण क्रियत इति जगत्सर्वं कर्मास्य स सर्वकर्मा; "स हि सर्वस्य कर्ता" (बृ० उ० ४।४।१३) इति श्रुतेः। सर्वकामः सर्वे कामा दोषरहिता अस्येति सर्वकामः; "धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि" (गीता ७।११) इति स्मृतेः। | आकाशात्मा—जिसका आत्मा यानी स्वरूप आकाशके समान हो उसे 'आकाशात्मा' कहते हैं। सर्वत्र व्यापक, सूक्ष्म तथा रूप आदिसे रहित होना ही ईश्वरका आकाशके समान होना है। सर्वकर्मा--उस ईश्वरके द्वारा सर्व यानी विश्वका निर्माण किया जाता है—इसलिये यह सारा जगत् उसका कर्म है; अतः वह ईश्वर सर्वकर्मा है, जैसा कि "वही सबका कर्ता है" इस श्रुतिसे सिद्ध होता है। सर्वकाम—सम्पूर्ण दोषरहित काम उस परमात्माके ही हैं इसलिये वह सर्वकाम है; जैसा कि "मैं प्राणियोंमें धर्मसे अविरुद्ध काम हूँ" इस स्मृतिसे प्रमाणित होता है। |
| ननु कामोऽस्मीति वचनादिह बहुव्रीहिर्न संभवति सर्वकाम इति। | शङ्का—किंतु 'कामोऽस्मि' (मैं काम हूँ) ऐसा वचन होनेके कारण 'सर्वकाम' इस पदमें बहुव्रीहिसमास नहीं हो सकता ? |
| न; कामस्य कर्तव्यत्वाच्छब्दादिवत्पारार्थ्यप्रसङ्गाच्च | समाधान—नहीं, क्योंकि काम का कार्यत्व स्वीकृत किया गया है*; इसलिये शब्दादिके समान भगवान्की भी |
* अतः यदि बहुव्रीहि न मानकर कर्मधारय मानें तो समस्त काम (कार्य) और ब्रह्म एकरूप सिद्ध होंगे, ऐसी दशामें जैसे कार्य अनादि नहीं है उसी प्रकार ब्रह्म भी अनादि नहीं माना जा सकेगा। इसके अतिरिक्त जैसे सभी कार्य किसी चेतन कर्ताके अधीन होते हैं उसी तरह ब्रह्ममें भी पराधीनताका दोष उपस्थित होगा। इतना ही नहीं, शब्दादिके समान काम भी पदार्थ है अतः काम और ब्रह्मकी एकता माननेपर ब्रह्ममें भी पदार्थताकी आपत्ति होने लगेगी; इसलिये यहाँ बहुव्रीहिसमास ही ठीक है।