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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

५८६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६

५८६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६
संस्कृत-भाष्यम्हिन्दी-अनुवाद
बौद्धाः। न तु सत्प्रतिद्वन्द्वि वस्त्वन्तरमिच्छन्ति; यथा सच्चासदिति गृह्यमाणं यथाभूतं तद्विपरीतं तत्त्वं भवतीति नैयायिकाः।ही तत्त्व मानते हैं। वे सत्की विरोधिनी कोई अन्य वस्तु नहीं मानते; जैसा कि नैयायिकोंका मत है कि गृहीत होनेवाली यथाभूत वस्तु और उससे विपरीत तत्त्व ये क्रमशः 'सत्' और 'असत्' हैं।
वैनाशिकमतसमीक्षणम्<br>ननु सदभावमात्रं प्रागुत्पत्तेश्चेदभिप्रेतं वैनाशिकैः, कथं प्रागुत्पत्तेरिदमासीदसदेकमेवाद्वितीयं चेति कालसंबन्धः संख्यासंबन्धोऽद्वितीयत्वं चोच्यते तैः।शङ्का— यदि वैनाशिक उत्पत्तिसे पूर्व सत्‌का अभावमात्र ही मानते हैं तो 'उत्पत्तिसे पूर्व यह एकमात्र अद्वितीय असत् ही था' ऐसा कहकर वे उसका कालसम्बन्ध, संख्यासम्बन्ध और अद्वितीयत्व कैसे निरूपण करते हैं ?
बाढं न युक्तं तेषां भावाभावमात्रमभ्युपगच्छताम्। असत्त्वमात्राभ्युपगमोऽप्ययुक्त एव, अभ्युपगन्तुरनभ्युपगमानुपपत्तेः। इदानीमभ्युपगन्ताभ्युपगम्यते न प्रागुत्पत्तेरिति चेत् ? न; प्रागुत्पत्तेः सद्भावस्य प्रमाणाभावात्। प्रागुत्पत्तेरसदेवेति कल्पनानुपपत्तिः।समाधान— ठीक है, सत्‌की असत्तामात्र माननेवाले उन लोगोंका ऐसा कहना उचित नहीं है। इसके सिवा उनका असत्तामात्र मानना भी अनुचित ही है; क्योंकि जो [ऐसा] माननेवाला है उसका न मानना सम्भव नहीं है। यदि कहो कि इस समय तो माननेवाला माना ही जाता है उत्पत्तिसे पूर्व ही नहीं माना जाता, तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि इस प्रकार उत्पत्तिसे पूर्व सत्‌के अभावको सिद्ध करनेवाला कोई प्रमाण नहीं रहता, और फिर 'उत्पत्तिसे पूर्व असत् ही था' ऐसी कल्पनाका होना सम्भव नहीं होता।

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५८७


संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
ननु कथं वस्त्वाकृतेः शब्दार्थ-<br>त्वेऽसदेकमेवाद्वितीयमितिपदार्थ-<br>वाक्यार्थोपपत्तिः, तदनुपपत्तौ<br>चेदं वाक्यमप्रमाणं प्रसज्येतेति<br>चेत् ?<br><br>नैष दोषः, सद्ग्रहणनिवृत्ति-<br>(मीमांसकोद्भावित-दोषनिराकरणम्) परत्वाद्वाक्यस्य ।<br>सदित्ययं तावच्छ-<br>ब्दः सदाकृतिवाचकः । एकमे-<br>वाद्वितीयमित्येतौ च सच्छब्देन<br>समानाधिकरणौ; तथेेदमासी-<br>दिति च । तत्र नञ् सद्वाक्ये प्रयुक्तः<br>सद्वाक्यमेवावलम्ब्य सद्वाक्यार्थ-<br>विषयां बुद्धिं सदेकमेवाद्वितीयमि-<br>दमासीदित्येवंलक्षणां ततः सद्वा-<br>क्यार्थान्निवर्तयत्यश्वारूढ इवाश्वा-<br>लम्बनोऽश्वं तदभिमुखविषयान्नि-<br>वर्तयति तद्वत् । न तु पुनः सद-मीमांसक— किंतु शब्दका अर्थ तो वस्तुकी आकृति ही होती है, ऐसी अवस्थामें एकमात्र अद्वितीय असत् ही था, इन पदोंका अथवा इस वाक्यका अर्थ कैसे ठीक हो सकता है ? और ठीक न हो सकनेपर तो यह [ श्रुतिका ] वाक्य ही अप्रामाणिक सिद्ध होगा ।<br><br>सिद्धान्ती— यहाँ यह दोष नहीं आता; क्योंकि यह वाक्य केवल सत्‌को ग्रहण करनेकी निवृत्ति करने मात्रमें ही तात्पर्य रखता है। 'सत्' यह शब्द तो सत्‌की आकृतिका वाचक है ही । 'एकमात्र अद्वितीय' ये दोनों शब्द 'सत्' शब्दके साथ समानाधिकरणरूपसे प्रयुक्त हैं । इसी प्रकार 'इदम्' और 'आसीत्' शब्द भी समानाधिकरण हैं । ऐसी अवस्थामें सद्-वाक्यमें प्रयोग किया हुआ 'नञ्¹' सद्-वाक्यको ही आलम्बन करके 'एकमात्र अद्वितीय सत् ही था' ऐसी सद्-वाक्यार्थसम्बन्धिनी बुद्धिको, जिस प्रकार कि घोड़ेपर चढ़ा हुआ पुरुष घोड़ेका ही आश्रय लेकर उसे उसके अभिमुख विषयोंसे फेर देता है उसी प्रकार, सद्-वाक्यके अर्थसे निवृत्त कर देता है । वह

१. 'असत्' शब्दमें जो 'अ' है उसीको 'नञ्' कहा गया है ।

५८८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६

५८८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६

| भावमेवाभिधत्ते । अतः पुरुषस्य विपरीतग्रहणनिवृत्त्यर्थपरमिदमसदेवेत्यादि वाक्यं प्रयुज्यते । दर्शयित्वा हि विपरीतग्रहणं ततो निवर्तयितुं शक्यत इत्यर्थवत्त्वादसदादिवाक्यस्य श्रौतत्वं प्रामाण्यं च सिद्धमित्यदोषः । तस्मादसतस्सर्वाभावरूपात्सद्विद्यमानं जायत समुत्पन्नम् । अडभावश्छान्दसः ॥ १ ॥ | सत्‌के अभावका ही निरूपण नहीं करता अतः पुरुषके विपरीत ग्रहणकी निवृत्तिके लिये ही 'यह असत् ही था' इत्यादि वाक्यका प्रयोग किया गया है। विपरीतग्रहणको दिखलाकर ही उससे निवृत्त करना सम्भव है। इस प्रकार असत् आदि वाक्य सार्थक होनेके कारण उसका श्रौतत्व और प्रामाण्य सिद्ध ही है। अतः इसमें कोई दोष नहीं है। उस सर्वाभावरूप असत्‌से सत् अर्थात् विद्यमान कार्यजात उत्पन्न हुआ। [मूलमें 'सज्जायत' के स्थानमें 'सत् अजायत' ऐसा होना चाहिये था, सो 'जायत' इस क्रियापदमें ] अट्‌का अभाव वैदिक है ॥ १ ॥ |


| तदेतद्विपरीतग्रहणं महावैनाशिकपक्षं दर्शयित्वा प्रतिषेधति— | इस प्रकार यह विपरीतग्रहणरूप महावैनाशिकका पक्ष दिखलाकर अब [ आरुणि ] उसका प्रतिषेध करता है- |

कुतस्तु खलु सोम्यैवं स्यादिति होवाच कथमसतः सज्जायेतेति । सत्त्वेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् ॥ २ ॥

"किंतु हे सोम्य ! ऐसा कैसे हो सकता है, भला असत्‌से सत्‌की उत्पत्ति कैसे हो सकती है ? अतः हे सोम्य ! आरम्भमें यह एकमात्र अद्वितीय सत् ही था' ऐसा [ आरुणिने ] कहा ॥ २ ॥

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५८९


| [वैनाशिकमत-खण्डनम्]<br>कुतस्तु प्रमाणात्खलु हे सोम्यैवं स्यात्, असतः सज्जायेतेत्येवं कुतो भवेत् ? न कुतश्चित्प्रमाणादेवं संभवतीत्यर्थः । यदपि बीजोपमर्देऽङ्कुरो जायमानो दृष्टोऽभावादेवेति, तदप्यभ्युपगमविरुद्धं तेषाम् । कथम् ? ये तावद्बीजावयवा बीजसंस्थानविशिष्टास्तेऽङ्कुरेऽप्यनुवर्तन्त एव, न तेषामुपमर्दोऽङ्कुरजन्मनि । यत्पुनर्बीजाकारसंस्थानम्, तद्बीजावयवव्यतिरेकेण वस्तुभूतं न वैनाशिकैरभ्युपगम्यते, यदङ्कुरजन्मन्युपमृद्येत । अथ तदस्त्यवयवव्यतिरिक्तं वस्तुभूतम्, तथा च सत्यभ्युपगमविरोधः । | किंतु हे सोम्य ! ऐसा किस प्रमाणसे हो सकता है ? अर्थात् असत्से सत् उत्पन्न हो—ऐसा कैसे हो सकता है ? तात्पर्य यह है कि ऐसा होना किसी भी प्रमाणसे सम्भव नहीं है तथा वे लोग जो यह मानते हैं कि बीजका नाश होनेपर अभावहीसे अङ्कुर उत्पन्न होता देखा गया है वह भी उनके ही सिद्धान्तके विरुद्ध है । किस प्रकार विरुद्ध है ? बीजके आकारसे युक्त जो बीजके अवयव हैं उनकी अनुवृत्ति अङ्कुरमें भी होती ही है; अङ्कुरके उत्पन्न होनेपर उनका नाश नहीं हो जाता । तथा जो बीजाकारका संस्थान है उसे तो वैनाशिक भी बीजके अवयवोंसे भिन्न कोई वस्तु नहीं मानते; जिसका कि अङ्कुरकी उत्पत्ति होनेपर नाश हो । यदि कहो कि बीजावयवोंसे व्यतिरिक्त वह वास्तविक स्वरूपसे है तो यह उनकी ही मान्यताके विरुद्ध होगा। | | अथ संवृत्याभ्युपगतं बीजसंस्थानरूपमुपमृद्यत इति चेत् ? | यदि कहो कि संवृति (लौकिक व्यवहार) द्वारा माना गया बीजसंस्थानका रूप नष्ट होता है तो यह बतलाओ कि यह संवृति क्या |

५९० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ६

५९० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ६

संस्कृतहिन्दी
केयं संवृतिर्नाम-किमसावभाव उत भाव इति ? यद्यभावः, दृष्टान्ताभावः । अथ भावः, तथापि नाभावादङ्कुरोत्पत्तिः, बीजावयवेभ्यो ह्यङ्कुरोत्पत्तिः ।<br><br>अवयवा अप्युपमृद्यन्त इति चेत् ? न; तदवयवेषु तुल्यत्वात् । यथा वैनाशिकानां बीजसंस्थानरूपोऽवयवी नास्ति, तथावयवा अपीति तेषामप्युपमर्दानुपपत्तिः । बीजावयवानामपि सूक्ष्मावयवास्तदवयवानामप्यन्ये सूक्ष्मतरावयवा इत्येवं प्रसङ्गस्यानिवृत्तेः सर्वत्रोपमर्दानुपपत्तिः । सद्बुद्ध्यनुवृत्तेः सत्त्वानिवृत्तिश्चेति तद्वादिनां सतचीज है। यह भाव है या अभाव ? यदि अभाव है तो [अभावसे भावकी उत्पत्ति होनेमें ] कोई दृष्टान्त नहीं है। [ अतः अभावरूपा संवृत्ति बीजकी सत्ताकी साधिका नहीं हो सकती ] और यदि भाव है तो भी अभावसे अङ्कुरकी उत्पत्ति होना सिद्ध नहीं होता, क्योंकि अङ्कुरकी उत्पत्ति तो बीजके अवयवोंसे ही होती है ।<br><br>और यदि ऐसा मानें कि अवयवोंका भी नाश हो जाता है तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि यह दोष अवयवीके समान ही उसके अवयवोंमें भी है । जिस प्रकार वैनाशिकोंके मतमें बीजसंस्थानरूप अवयवी नहीं है उसी प्रकार अवयव भी नहीं हैं; अतः उनका नाश होना सम्भव नहीं है । बीजावयवोंके भी सूक्ष्म अवयव होने चाहिये और उन अवयवोंके भी दूसरे सूक्ष्मतर अवयव होने चाहिये-इस प्रकार प्रसङ्गकी अनिवृत्ति ( अनवस्था दोष ) होनेके कारण सर्वत्र नाश होना सम्भव नहीं है । तथा सर्वत्र सद्बुद्धिकी अनुवृत्ति होनेके कारण सत्त्वकी निवृत्ति नहीं होगी । इस प्रकार सद्वादियोंकी मानी हुई सत्से सत्की उत्पत्ति

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्याथ ५९१


संस्कृतहिन्दी अनुवाद
एव सदुत्पत्तिः सेत्स्यति। न त्वसद्वादिनां दृष्टान्तोऽस्त्यसतः सदुत्पत्तेः। मृत्पिण्डाद्घटोत्पत्तिर्दृश्यते सद्वादिनां तद्भावे भावात्तदभावे चाभावात्।ही सिद्ध होगी। असत्से सत्की उत्पत्ति होनेमें असद्वादियोंके पास कोई दृष्टान्त भी नहीं है। सद्वादियोंके मतमें मृत्तिकाके पिण्डसे घटकी उत्पत्ति होती देखी गयी है; क्योंकि उसकी सत्ताके रहते हुए घटकी भी सत्ता है और उसका अभाव होनेपर घटका भी अभाव हो जाता है।
यद्यभावादेव घट उत्पद्येत घटार्थिना मृत्पिण्डो नोपादीयेत। अभावशब्दबुद्ध्यनुवृत्तिश्च घटादौ प्रसज्येत न त्वेतदस्त्यतो नासतः सदुत्पत्तिः।यदि अभावसे ही घटकी उत्पत्ति होती तो घट बनानेकी इच्छावालेको मृत्तिकाका पिण्ड लेनेकी आवश्यकता न होती तथा घटादिमें 'अभाव' शब्द और अभाव-बुद्धिकी अनुवृत्तिका भी प्रसंग उपस्थित होता। किंतु ऐसा नहीं। इसलिये असत्से सत्की उत्पत्ति नहीं हो सकती।
यदप्याहुर्मृद्बुद्धिर्घटबुद्धेर्निमित्तमिति मृद्बुद्धिर्घटबुद्धेः कारणमुच्यते, न तु परमार्थत एव मृद्घटो वास्तीति; तदपि मृद्बुद्धिर्विद्यमाना विद्यमानाया एव घटबुद्धेः कारणमिति नासतः सदुत्पत्तिः।इसके सिवा वे लोग जो ऐसा कहते हैं कि 'मृत्तिकाबुद्धि घटबुद्धिका निमित्त है; अतः मृद्बुद्धि ही घटबुद्धिका कारण कही जाती है, वस्तुतः मृत्तिका अथवा घट कुछ भी नहीं है' इसके अनुसार भी विद्यमान मृद्बुद्धि ही विद्यमान घटबुद्धिका कारण है; अतः असत्से सत्की उत्पत्ति सिद्ध नहीं होती।

५९२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ६

५९२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ६


| मृद्घटबुद्ध्योर्निमित्तनैमित्तिकतयानन्तर्यमात्रं न तु कार्यकारणत्वमिति चेत् ? न; बुद्धीनां नैरन्तर्ये गम्यमाने वैनाशिकानां बहिर्दृष्टान्ताभावात् । | यदि कहो कि मृद्बुद्धि तथा घटबुद्धिका निमित्त और नैमित्तिकरूपसे आनन्तर्यमात्र* है; कार्य कारण भाव नहीं है तो ऐसा कहना भी ठीक नहीं; क्योंकि इन बुद्धियोंकी निरन्तरताका ज्ञान करानेमें वैनाशिकोंके पास कोई बाह्य दृष्टान्त नहीं है ।‡ | | अतः कुतस्तु खलु सोम्यैवं स्यादिति होवाच कथं केन प्रकारेणासतः सज्जायेतेति । असतः सदुत्पत्तौ न कश्चिदपि दृष्टान्तप्रकारोऽस्तीत्यभिप्रायः । एवमसद्वादिपक्षमन्मथ्योपसंहरति सदेव सोम्येदमग्र आसीदिति स्वपक्षसिद्धिम् । | 'अतः हे सोम्य ! ऐसा कैसे हो सकता है ?' ऐसा आरुणिने कहा । अर्थात् असत्से सत्की उत्पत्ति कैसे—किस प्रकार हो सकती है । तात्पर्य यह है कि असत्से सत्की उत्पत्ति होनेमें कोई भी दृष्टान्तका प्रकार नहीं है । इस तरह असद्वादीके पक्षका उन्मन्थन (निरसन) कर आरुणि 'हे सोम्य ! आरम्भमें यह सत् ही था' इस प्रकार अपने पक्षकी सिद्धिका उपसंहार करता है । | | ननु सद्वादिनोऽपि सतः सदुत्पद्यत इति नैव दृष्टान्तोऽस्ति । घटाद्धटान्तरोत्पत्त्यदर्शनात् । | शङ्का—किंतु सद्वादीके मतानुसार सत्से सत्की उत्पत्ति होती है इसमें भी तो कोई दृष्टान्त नहीं है, क्योंकि एक घटसे दूसरे घटकी उत्पत्ति होती नहीं देखी जाती । |


* अर्थात् पहले मृद्बुद्धि होती है उसके बाद घटबुद्धि—यही सूचित करता है ।
‡ बौद्धमतावलम्बी बाह्य पदार्थोंकी सत्ता नहीं मानते; अतः उनके सिद्धान्तानुसार मृद्बुद्धि, घटबुद्धि आदि भी असत् ही है । इसलिये इनका नैरन्तर्य अथवा निमित्त-नैमित्तिकत्व बतलाना भी असंगत ही है ।

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५९३

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संस्कृतहिन्दी
सत्यमेवं न सतः सदन्तर-<br>मुत्पद्यते किं तर्हि ? सदेव संस्था-<br>नान्तरेणावतिष्ठते । यथा सर्पः<br>कुण्डलीभवति । यथा च मृच्चूर्ण-<br>पिण्डघटकपालादिप्रभेदैः ।समाधान— यह ठीक है, एक सत्से दूसरे सत्की उत्पत्ति नहीं होती। तो फिर क्या होता है?—सत् ही एक दूसरे आकारमें स्थित हो जाता है, जिस प्रकार कि सर्प ही कुण्डली हो जाता है और जैसे मृत्तिका ही चूर्ण, पिण्ड, घट, कपालादि भेदोंसे स्थित हो जाती है।
यद्येवं सदेव सर्वप्रकारावस्थं कथं प्रागुत्पत्तेरिदमासीदित्युच्यते ।शङ्का— यदि ऐसी बात है तो सम्पूर्ण प्रकारोंमें स्थित सत् ही है फिर यह क्यों कहा जाता है कि यह उत्पत्तिसे पूर्व था ?
ननु न श्रुतं त्वया सदेवेत्यवधारणमिदंशब्दवाच्यस्य ?समाधान— अरे ! क्या तूने नहीं सुना कि ‘सदेव’ यह पद इदंशब्दवाच्यका निश्चय करानेके लिये है।
प्राप्तं तर्हि प्रागुत्पत्तेरसदेवासीन्नेदंशब्दवाच्यमिदानीमिदं जातमिति ।शङ्का— तब तो यह सिद्ध होता है कि उत्पत्तिसे पूर्व असत् ही था, इदंशब्दवाच्य नहीं था, यह अभी उत्पन्न हुआ है।
न; सत एवेदंशब्दबुद्धिविषयतयावस्थानाद्यथा मृदेव पिण्डघटादिशब्दबुद्धिविषयत्वेनावतिष्ठते तद्वत् ।समाधान— ऐसी बात नहीं है, क्योंकि जिस प्रकार मृत्तिका ही पिण्ड एवं घटादि शब्द और बुद्धिका विषय होकर सिद्ध होती है उसी प्रकार सत् ही इदंशब्द और इदंबुद्धिके विषयरूपसे स्थित होता है।
ननु यथा मृद्वस्त्वेवं पिण्ड-शङ्का— किंतु जिस प्रकार

५९४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६

५९४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६

| घटाद्यपि तद्वत्सद्बुद्धेरन्यबुद्धिविषयत्वात्कार्यस्य सतोऽन्यद्वस्त्वन्तरं स्यात्कार्यजातं यथाश्वाद्गौः। <br><br> न; पिण्डघटादीनामितरेतरव्यभिचारेऽपि मृत्त्वाव्यभिचारात्। यद्यपि घटः पिण्डं व्यभिचरति पिण्डश्च घटं तथापि पिण्डघटौ मृत्त्वं न व्यभिचरतस्तस्मान्मृन्मात्रं पिण्डघटौ। व्यभिचरति त्वश्वं गौरश्वो वा गाम्। तस्मान्मृदादिसंस्थानमात्रं घटादयः। एवं सत्संस्थानमात्रमिदं सर्वमिति युक्तं प्रागुत्पत्तेः सदेवेति; वाचारम्भणमात्रत्वाद्विकारसंस्थानस्य। <br><br> ननु निरवयवं सत्, “निष्कलं निष्क्रयं शान्तं निरवद्यं निरञ्जनम्” (श्वेता०उ० ६।१९) | मृत्तिका वस्तु है उसी प्रकार पिण्ड और घटादि भी हैं। उन्हींके समान सत्‌का कार्य सद्बुद्धिसे अन्यबुद्धिका विषय होनेके कारण वह सत्‌की अपेक्षा कोई अन्य वस्तु होना चाहिये, जिस प्रकार कि अश्वसे गौ। <br><br> समाधान—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि पिण्ड और घटादिका परस्पर व्यभिचार होनेपर भी उनमें मृत्तिकात्वका व्यभिचार नहीं है। यद्यपि घट पिण्डसे पृथक् रहता है और पिण्ड घटसे, तो भी पिण्ड और घट दोनों ही मृत्तिकात्वसे कभी पृथक् नहीं होते। अतः पिण्ड और घट आदि तो मृत्तिकामात्र ही हैं। किंतु अश्व गौको और गौ अश्वको पृथक् करते हैं; इसलिये घटादि केवल मृत्तिकादिके संस्थान (आकार) मात्र हैं। इस प्रकार यह सारा जगत् सत्‌का संस्थानमात्र है। अतः उत्पत्तिसे पूर्व सत् ही था—यह कथन ठीक ही है, क्योंकि विकारसंस्थान तो केवल वाणीके ही आश्रित है। <br><br> शङ्का—किंतु “पुरुष निष्कल, निष्क्रिय, शान्त, निर्मल, निर्लेप है” तथा “दिव्य, अमूर्त, बाहर-भीतर वर्त- |

खंड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ ५९५


| “दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः” (मु० उ० २।१।२) इत्यादिश्रुतिभ्यो निरवयवस्य सतः कथं विकारसंस्थानमुपपद्यते ।<br><br>नैष दोषः, रज्ज्वाद्यवयवेभ्यः सर्पादिसंस्थानवद्बुद्धिपरिकल्पितेभ्यः सदवयवेभ्यो विकारसंस्थानोपपत्तेः “वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्” (छा० उ० ६।१।४) एवम् ‘सदेव सत्यम्’ इति श्रुतेः । एकमेवाद्वितीयं परमार्थत इदंबुद्धिकालेऽपि ॥ २ ॥ | मान और अजन्मा है” इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार सत् निरवयव है। उस निरवयव सत्‌का विकार संस्थान होना कैसे सम्भव है?<br><br>समाधान—इसमें कोई दोष नहीं है, क्योंकि रज्जु आदिके अवयवोंसे सर्पादि आकारकी प्रतीतिके समान बुद्धिसे कल्पना किये हुए सत्‌के अवयवोंसे विकारसंस्थानका प्रतीत होना सम्भव है; जैसा कि कहा है— “विकार वाणीके आश्रित केवल नाममात्र है, मृत्तिका ही सत्य है”। इसी प्रकार ‘सत् ही सत्य है’ इस श्रुतिसे प्रमाणित होता है। वस्तुतः इदंबुद्धिके समय भी वह एकमात्र अद्वितीय ही है ॥ २ ॥ |

तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति तत्तेजोऽसृजत । तत्तेज ऐक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति तदपोऽसृजत । तस्माद्यत्र क्व च शोचति स्वेदते वा पुरुषस्तेजस एव तदध्यापो जायन्ते ॥ ३ ॥

उस (सत्) ने ईक्षण किया ‘मैं बहुत हो जाऊँ—अनेक प्रकारसे उत्पन्न होऊँ’। इस प्रकार [ईक्षण कर] उसने तेज उत्पन्न किया। उस तेजने ईक्षण किया ‘मैं बहुत हो जाऊँ—नाना प्रकारसे उत्पन्न होऊँ’। इस प्रकार [ईक्षण कर] उसने जलकी रचना की। इसीसे जहाँ कहीं पुरुष शोक (संताप) करता है उसे पसीने आ जाते हैं। उस समय वह तेजसे ही जलकी उत्पत्ति होती है ॥ ३ ॥

५९६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६

५९६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६

| तत्सदैक्षतेक्षां दर्शनं कृतवत् । अतश्च न प्रधानं सांख्यपरिकल्पितं जगत्कारणम्; प्रधानस्याचेतनत्वाभ्युपगमात्, इदं तु सचेतनमीक्षितृत्वात्। तत्कथमैक्षत ? इत्याह—बहु प्रभूतं स्यां भवेयं प्रजायेय प्रकर्षेणोत्पद्येय । यथा मृद्घटाद्याकारेण, यथा वा रज्ज्वादि सर्पाद्याकारेण बुद्धिपरिकल्पितेन । | उस सत्‌ने ईक्षण किया, ईक्षण अर्थात् दर्शन किया। इससे सिद्ध होता है कि सांख्यका कल्पना किया हुआ प्रधान जगत्‌का कारण नहीं है, क्योंकि प्रधान अचेतन माना गया है और यह सत् ईक्षण करनेके कारण चेतन है। उसने किस प्रकार ईक्षण किया सो श्रुति बतलाती है—मैं बहु—अधिक हो जाऊँ 'प्रजायेय'—प्रकर्षसे उत्पन्न होऊँ, जिस प्रकार कि घटादि आकारसे मृत्तिका अथवा बुद्धिसे कल्पना किये हुए सर्पादि आकारसे रज्जु उत्पन्न होती है। | | असदेव तर्हि सर्वं यद्गृह्यते रज्जुरिव सर्पाद्याकारेण । | शङ्का--तब तो रज्जु जिस प्रकार सर्पादि आकारसे ग्रहण की जाती है उसी प्रकार जो कुछ ग्रहण किया जाता है वह असत् ही है। | | न; सत एव द्वैतभेदेनान्यथागृह्यमाणत्वान्नासत्त्वं कस्यचित्क्वचिदिति ब्रूमः । यथा सतोऽन्यद्वस्त्वन्तरं परिकल्प्य पुनस्तस्यैव प्रागुत्पत्तेः प्रध्वंसाच्चोर्ध्वमसत्त्वं ब्रुवते तार्किका न तथा- | समाधान--नहीं, हमारा तो यह कथन है कि द्वैतभेदसे सत् ही अन्यथारूपसे गृहीत होनेके कारण कभी किसी पदार्थकी असत्ता नहीं है। [ अब इसी बातको और अधिक स्पष्ट करते हैं-- ] जिस प्रकार तार्किक लोग सत्‌से भिन्न किसी अन्य पदार्थकी कल्पना कर फिर उत्पत्तिसे पूर्व और नाशके पश्चात् उसकी असत्ता बतलाते हैं |

खण्ड २ ]शाङ्करभाष्यार्थ५९७
संस्कृतहिन्दी
स्माभिः कदाचित्क्वचिदपि स-<br>तोऽन्यदभिधानमभिधेयं वा वस्तु<br>परिकल्प्यते । सदैव तु सर्व-<br>मभिधानमभिधीयते च यदन्य-<br>बुद्ध्या । यथा रज्जुरेव सर्प-<br>बुद्ध्या सर्प इत्यभिधीयते यथा<br>वा पिण्डघटादि मृदोऽन्यबुद्ध्या<br>पिण्डघटादिशब्देन अभिधीयते<br>लोके । रज्जुविवेकदर्शिनां तु<br>सर्पाभिधानबुद्धी निवर्तेते यथा च<br>मृद्विवेकदर्शिनां घटादिशब्द-<br>बुद्धी तद्वत्सद्विवेकदर्शिनामन्य-<br>विकारशब्दबुद्धी निवर्तेते ।<br>“यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य<br>मनसा सह” (तै० उ. २।४)<br>इति । “अनिरुक्तेऽनिलयने”<br>(तै० उ० २ । ६ । १) इत्यादि<br>श्रुतिभ्यः ।उसी प्रकार हमारेद्वारा कभी कहीं<br>भी सत्‌से भिन्न किसी नाम अथवा<br>नामकी विषयभूत वस्तुकी कल्पना<br>नहीं की जाती । सारे नाम और<br>जो अन्यबुद्धिसे कहे जाते हैं वे<br>सारे पदार्थ सत् ही हैं, जिस प्रकार<br>कि लोकमें रज्जु ही सर्पबुद्धिसे<br>‘सर्प’ इस प्रकार कही जाती है<br>अथवा जिस प्रकार मृत्तिकासे अन्य-<br>बुद्धिके कारण पिण्ड और घटादिको<br>पिण्ड एवं घट आदि शब्दोंसे पुकारा<br>जाता है । जिस प्रकार रज्जुका<br>विवेक करके देखनेवालोंकी दृष्टिमें<br>‘सर्प’ शब्द और सर्पबुद्धि निवृत्त हो<br>जाते हैं तथा मृत्तिकाका विवेक<br>करके देखनेवालोंकी दृष्टिमें घटादि-<br>शब्द और तत्सम्बन्धिनी बुद्धिका<br>निरास हो जाता है, उसी प्रकार<br>सत्‌का विवेक करके देखनेवालोंके<br>लिये अन्य विकारसम्बन्धी शब्द<br>और बुद्धि निवृत्त हो जाते हैं, जैसा<br>कि “जहाँसे मनके सहित वाणी<br>न पहुँचकर लौट आती है” “जो<br>वाणीका अविषय और अनाश्रय है<br>उसमें” इत्यादि श्रुतियोंसे प्रमाणित<br>होता है ।

५६८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ६

५६८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ६

एवमीक्षित्वा तत्तेजोऽसृजत तेजः सृष्टवत् ।इस प्रकार ईक्षण कर उसने तेजकी रचना की ।
ननु “तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः” (तै० उ० १) इति श्रुतिमिह कथं प्राथम्येन तस्मादेव तेजः सृज्यते तत एव चाकाशमिति विरुद्धम् ।शङ्का—किंतु “उस इस आत्मासे आकाश उत्पन्न हुआ [ तथा आकाशसे वायु और वायुसे तेज हुआ ]” ऐसी भी श्रुति है। फिर उसीसे सबसे पहले तेज रचा गया और उसीसे आकाश—यह विरुद्ध कथन क्यों किया जाता है ?
नैष दोषः; आकाशवायुसर्गानन्तरं तत्सत्तेजोऽसृजतेतिकल्पनोपपत्तेः । अथ वाविवक्षित इह सृष्टिक्रमः । सत्कार्यमिदं सर्वमतःसदेकमेवाद्वितीयमित्येतद्विवक्षितम्, मृदादिदृष्टान्तात् । अथवा त्रिवृत्करणस्य विवक्षितत्वात्तेजोऽबन्नानामेव सृष्टिमाचष्टे तेज इति प्रसिद्धं लोके दग्धृ पक्तृ प्रकाशकं रोहितं चेति ।समाधान—यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि यहाँ ऐसी कल्पना भी की जा सकती है कि आकाश और वायुकी रचनाके अनन्तर उस सत्‌ने तेजकी रचना की । अथवा यह भी सम्भव है कि यहाँ सृष्टिक्रम बतलाना इष्ट न हो । यह सारा जगत् सत्‌का कार्य है, इसलिये एकमात्र अद्वितीय सत् ही है—यही बतलाना इष्ट हो, क्योंकि यहाँ मृत्तिका आदिका दृष्टान्त दिया गया है ! अथवा त्रिवृत्करण विवक्षित होनेके कारण श्रुति तेज, अप् और अन्नकी ही सृष्टिका निरूपण करती है । तेज—यह दग्ध करनेवाला, पकानेवाला, प्रकाशक और कुछ लाल रंगका लोकमें प्रसिद्ध है ।

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५९९


| तत्सत्सृष्टं तेज ऐक्षत तेजोरूपसंस्थितं सदैक्षतेत्यर्थः । बहु स्यां प्रजायेयेति पूर्ववत् । तदपोऽसृजत । आपो द्रवाः स्निग्धाः स्यन्दिन्यः शुक्लाश्चेति प्रसिद्धा लोके । यस्मात्तेजसः कार्यभूता आपस्तस्माद्यत्र क्व च देशे काले वा शोचति संतप्यते स्वेदते प्रस्विद्यते वा पुरुषस्तेजस एव तत्तदापोऽधिजायन्ते ॥ ३ ॥ | सत्के रचे हुए उस तेजने ईक्षण किया; अर्थात् तेजके रूपमें स्थित सत्ने ‘मैं बहुत हो जाऊँ—अनेक प्रकारसे उत्पन्न होऊँ’, इस प्रकार पूर्ववत् ईक्षण किया । उसने जलकी रचना की । जल द्रवरूप, स्निग्ध, बहनेवाला और शुक्ल वर्ण इस प्रकार लोकमें प्रसिद्ध है । क्योंकि जल तेजका कार्यभूत है, इसलिये जब कहीं किसी देश या कालमें पुरुष शोक-संताप करता है तो पसीनेसे युक्त हो जाता है । उस समय तेजसे ही जलकी उत्पत्ति होती है ॥ ३ ॥ |

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ता आप ऐक्षन्त बह्व्यः स्याम प्रजायेमहीति ता अन्नमसृजन्त । तस्माद्यत्र क्व च वर्षति तदेव भूयिष्ठमन्नं भवत्यद्भ्य एव तदध्यन्नाद्यं जायते ॥ ४ ॥

उस जलने ईक्षण किया 'हम बहुत हो जायँ—अनेक रूपसे उत्पन्न हों।' उसने अन्नकी रचना की । इससे जहाँ कहीं वर्षा होती है वहीं बहुत-सा अन्न होता है । वह अन्नाद्य जलसे ही उत्पन्न होता है ॥ ४ ॥

| ता आप ऐक्षन्त पूर्ववदेवापाकारसंस्थितं सदैक्षतेत्यर्थः । बह्व्यः प्रभूताः स्याम भवेम प्रजायेमोत्पद्येमहीति । ता अन्न- | उस जलने ईक्षण किया, अर्थात् पहलेहीके समान जलरूपमें स्थित सत्ने ईक्षण किया । 'हम बहुत—अधिक हो जायँ, प्रकर्षसे उत्पन्न हों ।' उसने पृथिवीरूप अन्नकी |

६०० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६

६००छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६
मसृजन्त पृथिवीलक्षणम्। पार्थिवं ह्यन्नं तस्माद्यत्र क्व च वर्षति देशे तत्तत्रैव भूयिष्ठं प्रभूतमन्नं भवति। अतोऽद्द्भ्य एव तदन्नामन्नाद्यमधिजायते। ता अन्नमसृजन्तेति पृथिव्युक्ता पूर्वमिह तु दृष्टान्तेऽन्नं च तदाद्यं चेति विशेषणाद्व्रीहियवाद्या उच्यन्ते। अन्नं च गुरु स्थिरं धारणं कृष्णं च रूपतः प्रसिद्धम्।रचना की। अन्न पृथिवीका विकार है, इसलिये जहाँ कहीं वर्षा होती है वहीं बहुत-सा अन्न हो जाता है। अतः वह अन्नाद्य जलसे ही उत्पन्न होता है। 'उसने अन्नकी रचना की' ऐसा कहकर पहले तो श्रुतिने 'अन्न' शब्दसे पृथिवी कही है और अब दृष्टान्तमें 'वह अन्न और आद्य' ऐसा विशेषण देनेके कारण [ आद्य शब्दसे ] धान, जौ आदि कहे हैं। अन्न भारी, स्थिर, धारण करनेवाला और रूपसे कृष्णवर्ण होता है—ऐसा प्रसिद्ध है !
ननु तेजःप्रभृतिष्वीक्षणं न गम्यते हिंसादिप्रतिषेधाभावात्त्रासादिकार्यानुपलम्भाच्च। तत्र कथं तत्तेज ऐक्षतेत्यादि।शङ्का—किंतु तेज आदिमें तो ईक्षण होना समझमें नहीं आता; क्योंकि उनमें हिंसादिके प्रतिषेधका अभाव है और त्रास आदि कार्य भी नहीं देखे जाते। फिर श्रुतिने 'तेजने ईक्षण किया' इत्यादि कथन कैसे किया ?
नैष दोषः, ईक्षितृकारणपरिणामत्वात्तेजःप्रभृतीनां सत् एवेक्षितृनियतकर्मविशिष्टकार्योत्पादकत्वाच्च तेजःप्रभृतीक्षत इवेक्षत इत्युच्यते भूतम्।समाधान—यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि तेज आदि भूत ईक्षण करनेवाले कारणके परिणाम हैं। ईक्षण करनेवाला सत् ही नियतक्रमविशिष्ट होकर कार्यका उत्पन्न करनेवाला होनेसे तेज आदि भूतोंने 'मानो ईक्षण किया' ऐसे अर्थमें 'ईक्षण किया' ऐसा कहा जाता है।

खण्ड २] शाङ्करभाष्यार्थ ३०१


ननु सतोऽप्युपचरितमेवेक्षितृत्वम् ।शङ्का—किंतु सत्‌का ईक्षण भी तो उपचारसे ही है ?
न; सदीक्षणस्य केवलशब्दगम्यत्वान्न शक्यमुपचरितं कल्पयितुम् । तेजःप्रभृतीनां त्वनुमीयते मुख्येक्षणाभाव इति युक्तमुपचरितं कल्पयितुम् ।समाधान—नहीं, सत्‌का ईक्षण केवल शब्दगम्य है; इसलिये वह उपचारसे है—ऐसी कल्पना नहीं की जा सकती। तेज आदिके मुख्य ईक्षणका अभाव तो अनुमानसे सिद्ध है; इसलिये उसे उपचरित मानना ठीक है।
ननु सतोऽपि मृद्वत्कारणत्वादचेतनत्वं शक्यमनुमातुम् । अतः प्रधानस्यैवाचेतनस्य सचेतनार्थत्वान्नियतकालक्रमविशिष्टकार्योत्पादकत्वाच्चैक्षतेवैक्षतेति शक्यमनुमातुमुपचरितमेवेक्षणम् । दृष्टश्च लोकेऽचेतने चेतनवदुपचारः । यथा कूलं पिपतिषतीति तद्वत्सतोऽपि स्यात् ।शङ्का—परंतु मृत्तिकाके समान कारण होनेसे सत्‌के अचेतनत्वका भी अनुमान किया जा सकता है। अतः अचेतन प्रधानरूप जो सत्‌ है वह चेतनके प्रयोजनके लिये है और नियतकालक्रमसे विशिष्ट कार्यका उत्पादक है, इस कारण उसीने ईक्षण करनेके समान ईक्षण किया—इस प्रकार उसका ईक्षण उपचरित ही है, ऐसा अनुमान किया ही जा सकता है। लोकमें अचेतनमें चेतनके समान उपचार होता देखा ही जाता है, जिस प्रकार 'किनारा गिरना चाहता है' ऐसा कहा जाता है उसी प्रकार सत्‌का ईक्षण भी औपचारिक हो सकता है।
न; तत्सत्यं स आत्मेति तस्मिन्नात्मोपदेशात् ।समाधान—ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि, 'वह सत्य है' वह आत्मा है, ऐसा कहकर उसीमें आत्माका उपदेश किया गया है ।

६०२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६

६०२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
आत्मोपदेशोऽप्युपचरित इति चेद्यथा ममात्मा भद्रसेन इति सर्वार्थकारिण्यनात्मन्यात्मोपचारस्तद्वत् ।शङ्का— यदि 'भद्रसेन मेरा आत्मा है' इस वाक्यमें जिस प्रकार आत्माके सम्पूर्ण कार्य करनेवाले अनात्मामें आत्माका उपचार किया गया है उसी प्रकार यह आत्मोपदेश भी उपचारसे ही है ऐसा मानें तो ?
न; तदस्मीति सत्सत्याभिसंधस्य 'तस्य तावदेव चिरम्' इति मोक्षोपदेशात् ।समाधान— ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि 'वह सत् मैं हूँ' इस प्रकार सत्में दृढ़ अभिनिवेश करनेवालेके लिये 'उसके मोक्षमें अभीतक देरी है [ जबतक कि शरीरपात नहीं होता ]' इस प्रकार मोक्षका उपदेश किया गया है।
सोऽप्युपचार इति चेत्, प्रधानात्माभिसंधस्य मोक्षसामीप्यं वर्तत इति मोक्षोपदेशोऽप्युपचरित एव; यथा लोके ग्रामं गन्तुं प्रस्थितः प्राप्तवानहं ग्राममिति ब्रूयात्त्वरापेक्षया तद्वत् ।शङ्का— यदि यह भी उपचार ही हो तो ? जिस प्रकार लोकमें गाँवकी ओर जानेवाला पुरुष अपनी शीघ्रताकी अपेक्षासे कह देता है कि 'मैं तो गाँवमें पहुँच गया' उसी प्रकार प्रधानमें आत्मबुद्धि करनेवालेके लिये मोक्षकी समीपता होनेके कारण यह मोक्षका उपदेश भी उपचारसे ही हो तो ?
न; येन विज्ञातेनाविज्ञातं विज्ञातं भवतीत्युपक्रमात् । सत्येकस्मिन्विज्ञाते सर्वं विज्ञातं भवति तदनन्यत्वात्सर्वस्याद्वितीयवचनाच्च । न चान्यद्विज्ञा-समाधान— नहीं, क्योंकि जिसे जान लेनेपर बिना जाना हुआ भी जान लिया जाता है--ऐसा उपक्रम किया गया है। एक सत्‌के जान लेनेपर ही सब कुछ जान लिया जाता है, क्योंकि सब उससे अभिन्न है और उसे अद्वितीय भी बतलाया

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६०३


| तन्यमवशिष्टं श्रावितं श्रुत्यानुमेयं वा लिङ्गतोऽस्ति येन मोक्षोपदेश उपचारितः स्यात् । सर्वस्य च प्रपाठकार्थस्योपचरितत्वपरिकल्पनायां वृथा श्रमः परिकल्पयितुः स्यात्पुरुषार्थसाधनविज्ञानस्य तर्केणैवाधिगतत्वात्तस्य । तस्माद्वेदप्रामाण्यान्न युक्तः श्रुतार्थपरित्यागः । अचश्वेतनावत्कारणं जगत इति सिद्धम् ॥ ४ ॥ | गया है । उसके सिवा कोई और विज्ञातव्य न तो श्रुतिसे सुना गया है और न किसी लिङ्गसे ही अनुमान किया जा सकता है, जिसके कारण इस मोक्षोपदेशको उपचरित माना जाय । तथा सारे प्रपाठकका उपचरितत्व माननेमें तो इस प्रकारकी कल्पना करनेवालेका श्रम व्यर्थ ही होगा, क्योंकि उसके सिद्धान्तानुसार पुरुषार्थका साधनभूत विज्ञान तो तर्कसे ही सिद्ध हो जाता है । अतः वेदकी प्रमाणता होनेके कारण इस श्रुत (प्रसिद्ध) अर्थका त्याग करना उचित नहीं है । इसलिये यह सिद्ध हुआ कि संसारका चेतन कारण है ॥ ४ ॥ |


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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठाध्याये द्वितीयखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २ ॥

तृतीय खण्ड

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सृष्टिका क्रम

तेषां खल्वेषां भूतानां त्रीण्येव बीजानि भव-
न्त्याण्डजं जीवजमुद्भिज्जमिति ॥ १ ॥

उन इन [ पक्षी आदि ] प्रसिद्ध प्राणियोंके तीन ही बीज होते हैं—आण्डज, जीवज और उद्भिज्ज ॥ १ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
तेषां जीवाविष्टानां खल्वेषां पक्ष्यादीनां भूतानाम्, एषामिति प्रत्यक्षनिर्देशान्न तु तेजःप्रभृतीनां तेषां त्रिवृत्करणस्य वक्ष्यमाणत्वादसति त्रिवृत्करणे प्रत्यक्षनिर्देशानुपपत्तिः । देवताशब्दप्रयोगाच्च तेजःप्रभृतिष्विमास्तिस्रो देवता इति । तस्मात्तेषां खल्वेषां भूतानां पक्षिपशुस्थावरादीनां त्रीण्येव नातिरिक्तानि बीजानि कारणानि भवन्ति ।जीवोंद्वारा आविष्ट उन इन पक्षी आदि प्राणियोंके—यहाँ 'एषाम्' ऐसा प्रत्यक्ष निर्देश होनेके कारण [ 'इन पक्षी आदि भूतोंके' ऐसा अर्थ करना चाहिये ] 'उन तेजःप्रभृति भूतोंके' ऐसा अर्थ करना ठीक नहीं, क्योंकि आगे त्रिवृत्करणका वर्णन किया जानेवाला है और त्रिवृत्करणके हुए बिना ही प्रत्यक्ष निर्देश बन नहीं सकता । इसके सिवा तेजःप्रभृतिके लिये 'इमाः तिस्रो देवताः' इस प्रकार 'देवता' शब्दका प्रयोग होनेसे भी [ यहाँ 'भूत' शब्दसे पक्षी आदि ही विवक्षित हैं ]—अतः उन इन पक्षी, पशु एवं स्थावर आदि प्रसिद्ध भूतोंके तीन ही बीज हैं, इससे अधिक बीज-कारण नहीं हैं ।

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६०५


कानि तानि ? इत्युच्यन्ते, आण्डजमण्डाज्जातमण्डजम् , अण्डजमेवाण्डजं पक्ष्यादि । पक्षिसर्पादिभ्यो हि पक्षिसर्पादयो जायमाना दृश्यन्ते । तेन पक्षी पक्षिणां बीजं सर्पः सर्पाणां तथान्यदप्यण्डाज्जातं तज्जातीयानां बीजमित्यर्थः ।वे कौन-से हैं ? सो बतलाये जाते हैं—आण्डज—अण्डसे उत्पन्न हुएको अण्डज कहते हैं, अण्डज ही आण्डज हैं, अर्थात् पक्षी आदि; क्योंकि पक्षी एवं सर्पादिसे पक्षी और सर्पादि उत्पन्न होते देखे गये हैं; अतः पक्षियोंके बीज पक्षी हैं और सर्पोंके सर्प । इसी प्रकार अण्डेसे उत्पन्न हुए अन्य जीव भी अपनी-अपनी जातिके बीज हैं—ऐसा इसका तात्पर्य है ।
नन्वण्डाज्जातमण्डजमुच्यतेऽतोऽण्डमेव बीजमिति युक्तं कथमण्डजं बीजमुच्यते ।शङ्का—किंतु अण्डेसे उत्पन्न हुएको अण्डज कहते हैं; इसलिये अण्डा ही बीज है—ऐसा कहना उचित है; फिर अण्डजको बीज क्यों कहा जाता है ?
सत्यमेवं स्यात्, यदि त्वदिच्छास्तन्त्रा श्रुतिः स्यात्; स्वतन्त्रा तु श्रुतिः, यत आहाण्डजाद्येव बीजं नाण्डादीति । दृश्यते चाण्डजाद्यभावे तज्जातीयसन्तत्यभावो नाण्डाद्यभावे । अतोऽण्डजादीन्येव बीजान्यण्डजादीनाम् ।समाधान—यदि श्रुति तुम्हारी इच्छाके अधीन होती तो सचमुच ऐसा ही होता; किंतु श्रुति स्वतन्त्र है, क्योंकि उसने अण्डज आदिको बीज बतलाया है, अण्डे आदिको नहीं बतलाया। यही बात देखी भी जाती है कि अण्डज आदिका अभाव होनेपर ही उस जातिकी संततिका अभाव होता है, अण्डे आदिका अभाव होनेपर नहीं । अतः अण्डजादिके बीज अण्डजादि ही हैं ।