भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 603, कुल 978 में से

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पृष्ठ 603

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५९९


| तत्सत्सृष्टं तेज ऐक्षत तेजोरूपसंस्थितं सदैक्षतेत्यर्थः । बहु स्यां प्रजायेयेति पूर्ववत् । तदपोऽसृजत । आपो द्रवाः स्निग्धाः स्यन्दिन्यः शुक्लाश्चेति प्रसिद्धा लोके । यस्मात्तेजसः कार्यभूता आपस्तस्माद्यत्र क्व च देशे काले वा शोचति संतप्यते स्वेदते प्रस्विद्यते वा पुरुषस्तेजस एव तत्तदापोऽधिजायन्ते ॥ ३ ॥ | सत्के रचे हुए उस तेजने ईक्षण किया; अर्थात् तेजके रूपमें स्थित सत्ने ‘मैं बहुत हो जाऊँ—अनेक प्रकारसे उत्पन्न होऊँ’, इस प्रकार पूर्ववत् ईक्षण किया । उसने जलकी रचना की । जल द्रवरूप, स्निग्ध, बहनेवाला और शुक्ल वर्ण इस प्रकार लोकमें प्रसिद्ध है । क्योंकि जल तेजका कार्यभूत है, इसलिये जब कहीं किसी देश या कालमें पुरुष शोक-संताप करता है तो पसीनेसे युक्त हो जाता है । उस समय तेजसे ही जलकी उत्पत्ति होती है ॥ ३ ॥ |

—: ० :—

ता आप ऐक्षन्त बह्व्यः स्याम प्रजायेमहीति ता अन्नमसृजन्त । तस्माद्यत्र क्व च वर्षति तदेव भूयिष्ठमन्नं भवत्यद्भ्य एव तदध्यन्नाद्यं जायते ॥ ४ ॥

उस जलने ईक्षण किया 'हम बहुत हो जायँ—अनेक रूपसे उत्पन्न हों।' उसने अन्नकी रचना की । इससे जहाँ कहीं वर्षा होती है वहीं बहुत-सा अन्न होता है । वह अन्नाद्य जलसे ही उत्पन्न होता है ॥ ४ ॥

| ता आप ऐक्षन्त पूर्ववदेवापाकारसंस्थितं सदैक्षतेत्यर्थः । बह्व्यः प्रभूताः स्याम भवेम प्रजायेमोत्पद्येमहीति । ता अन्न- | उस जलने ईक्षण किया, अर्थात् पहलेहीके समान जलरूपमें स्थित सत्ने ईक्षण किया । 'हम बहुत—अधिक हो जायँ, प्रकर्षसे उत्पन्न हों ।' उसने पृथिवीरूप अन्नकी |

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