छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 599, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखंड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ ५९५
| “दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः” (मु० उ० २।१।२) इत्यादिश्रुतिभ्यो निरवयवस्य सतः कथं विकारसंस्थानमुपपद्यते ।<br><br>नैष दोषः, रज्ज्वाद्यवयवेभ्यः सर्पादिसंस्थानवद्बुद्धिपरिकल्पितेभ्यः सदवयवेभ्यो विकारसंस्थानोपपत्तेः “वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्” (छा० उ० ६।१।४) एवम् ‘सदेव सत्यम्’ इति श्रुतेः । एकमेवाद्वितीयं परमार्थत इदंबुद्धिकालेऽपि ॥ २ ॥ | मान और अजन्मा है” इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार सत् निरवयव है। उस निरवयव सत्का विकार संस्थान होना कैसे सम्भव है?<br><br>समाधान—इसमें कोई दोष नहीं है, क्योंकि रज्जु आदिके अवयवोंसे सर्पादि आकारकी प्रतीतिके समान बुद्धिसे कल्पना किये हुए सत्के अवयवोंसे विकारसंस्थानका प्रतीत होना सम्भव है; जैसा कि कहा है— “विकार वाणीके आश्रित केवल नाममात्र है, मृत्तिका ही सत्य है”। इसी प्रकार ‘सत् ही सत्य है’ इस श्रुतिसे प्रमाणित होता है। वस्तुतः इदंबुद्धिके समय भी वह एकमात्र अद्वितीय ही है ॥ २ ॥ |
तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति तत्तेजोऽसृजत । तत्तेज ऐक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति तदपोऽसृजत । तस्माद्यत्र क्व च शोचति स्वेदते वा पुरुषस्तेजस एव तदध्यापो जायन्ते ॥ ३ ॥
उस (सत्) ने ईक्षण किया ‘मैं बहुत हो जाऊँ—अनेक प्रकारसे उत्पन्न होऊँ’। इस प्रकार [ईक्षण कर] उसने तेज उत्पन्न किया। उस तेजने ईक्षण किया ‘मैं बहुत हो जाऊँ—नाना प्रकारसे उत्पन्न होऊँ’। इस प्रकार [ईक्षण कर] उसने जलकी रचना की। इसीसे जहाँ कहीं पुरुष शोक (संताप) करता है उसे पसीने आ जाते हैं। उस समय वह तेजसे ही जलकी उत्पत्ति होती है ॥ ३ ॥