भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 598, कुल 978 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 598
५९४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६

| घटाद्यपि तद्वत्सद्बुद्धेरन्यबुद्धिविषयत्वात्कार्यस्य सतोऽन्यद्वस्त्वन्तरं स्यात्कार्यजातं यथाश्वाद्गौः। <br><br> न; पिण्डघटादीनामितरेतरव्यभिचारेऽपि मृत्त्वाव्यभिचारात्। यद्यपि घटः पिण्डं व्यभिचरति पिण्डश्च घटं तथापि पिण्डघटौ मृत्त्वं न व्यभिचरतस्तस्मान्मृन्मात्रं पिण्डघटौ। व्यभिचरति त्वश्वं गौरश्वो वा गाम्। तस्मान्मृदादिसंस्थानमात्रं घटादयः। एवं सत्संस्थानमात्रमिदं सर्वमिति युक्तं प्रागुत्पत्तेः सदेवेति; वाचारम्भणमात्रत्वाद्विकारसंस्थानस्य। <br><br> ननु निरवयवं सत्, “निष्कलं निष्क्रयं शान्तं निरवद्यं निरञ्जनम्” (श्वेता०उ० ६।१९) | मृत्तिका वस्तु है उसी प्रकार पिण्ड और घटादि भी हैं। उन्हींके समान सत्‌का कार्य सद्बुद्धिसे अन्यबुद्धिका विषय होनेके कारण वह सत्‌की अपेक्षा कोई अन्य वस्तु होना चाहिये, जिस प्रकार कि अश्वसे गौ। <br><br> समाधान—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि पिण्ड और घटादिका परस्पर व्यभिचार होनेपर भी उनमें मृत्तिकात्वका व्यभिचार नहीं है। यद्यपि घट पिण्डसे पृथक् रहता है और पिण्ड घटसे, तो भी पिण्ड और घट दोनों ही मृत्तिकात्वसे कभी पृथक् नहीं होते। अतः पिण्ड और घट आदि तो मृत्तिकामात्र ही हैं। किंतु अश्व गौको और गौ अश्वको पृथक् करते हैं; इसलिये घटादि केवल मृत्तिकादिके संस्थान (आकार) मात्र हैं। इस प्रकार यह सारा जगत् सत्‌का संस्थानमात्र है। अतः उत्पत्तिसे पूर्व सत् ही था—यह कथन ठीक ही है, क्योंकि विकारसंस्थान तो केवल वाणीके ही आश्रित है। <br><br> शङ्का—किंतु “पुरुष निष्कल, निष्क्रिय, शान्त, निर्मल, निर्लेप है” तथा “दिव्य, अमूर्त, बाहर-भीतर वर्त- |