छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
२८४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३
| २८४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| मृचापि मन्त्रेणाभ्यनूक्तं प्रकाशितम् ॥ ५ ॥ | अनुगत और गायत्रीद्वारा ही प्रतिपादित है, ऋचा यानी मन्त्रसे भी प्रकाशित किया गया है ॥ ५ ॥ |
कार्यब्रह्म और शुद्ध ब्रह्मका भेद
तावानस्य महिमा ततो ज्यायाँश्च पूरुषः। पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवीति ॥ ६ ॥
[ ऊपर जो कुछ कहा गया है ] उतनी ही इस (गायत्र्याख्य ब्रह्म) की महिमा है; तथा [ निर्विकार ] पुरुष इससे भी उत्कृष्ट है। सम्पूर्ण भूत इसका एक पाद हैं और इसका [ पुरुषसंज्ञक ] त्रिपाद् अमृत प्रकाशमय स्वात्मामें स्थित है ॥ ६ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| तावानस्य गायत्र्याख्यस्य ब्रह्मणः समस्तस्य महिमा विभूतिविस्तारः । यावांश्चतुष्पात्षड्विधश्च ब्रह्मणो विकारः पादो गायत्रीति व्याख्यातः । अतस्तस्माद्विकारलक्षणाद्गायत्र्याख्याद्वाचारम्भणमात्रात्ततो ज्यायान्महत्तरश्च परमार्थसत्यरूपोऽविकारः पूरुषः पुरुषः सर्वपूरणात्पुरिशयनाच्च । | इस गायत्रीसंज्ञक समस्त (पादविभागविशिष्ट) ब्रह्मकी उतनी ही महिमा—विभूतिविस्तार है, जितना कि चार पादवाला और छः प्रकारका ब्रह्मका विकारभूत एक पाद गायत्री है; ऐसा कहकर निरूपण किया गया है। अतः उस विकारभूत वाचारम्भणमात्र गायत्रीसंज्ञक ब्रह्मसे परमार्थ सत्यस्वरूप निर्विकार पुरुष उत्कृष्ट महत्तर है; जो सबको पूरित करने तथा शरीररूप पुरमें शयन करनेके कारण पुरुष कहलाता है। |
खण्ड १२ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ २८५
| तस्यास्य पादः सर्वा सर्वाणि भूतानि तेजोऽबन्नादीनि सस्थावरजङ्गमानि । त्रिपात्त्रयः पादा अस्य सोऽयं त्रिपात् । त्रिपादामृतं पुरुषाख्यं समस्तस्य गायत्र्यात्मनो दिवि द्योतनवति स्वात्मन्यवस्थितमित्यर्थ इति ॥ ६ ॥ | तेज, अन्न और अप् आदि सम्पूर्ण स्थावर-जङ्गम प्राणी उस इस पुरुषका एक पाद हैं । तथा वह त्रिपात्—जिसके तीन पाद हों उसे 'त्रिपात्' कहते हैं—समस्त गायत्रीरूप पुरुषका पुरुषसंज्ञक त्रिपादामृत दिवि—द्युतिमान्में यानी प्रकाशस्वरूप स्वात्मामें स्थित है—ऐसा इसका तात्पर्य है॥६॥ |
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भूताकाश, देहाकाश और हृदयाकाशका अभेद
यद्वै तद्ब्रह्मेतीदं वाव तद्योऽयं बहिर्धा पुरुषादाकाशो यो वै स बहिर्धा पुरुषादाकाशः ॥ ७॥ अयं वाव स योऽयमन्त पुरुष आकाशो यो वै सोऽन्तः पुरुष आकाशः ॥ ८ ॥ अयं वाव स योऽयमन्तर्हृदय आकाशस्तदेतत्पूर्णमप्रवर्ति पूर्णामप्रवर्तिनों२श्रियं लभते य एवं वेद ॥ ९ ॥
जो भी वह [त्रिपाद् अमृतरूप] ब्रह्म है वह यही है, जो कि यह पुरुषसे बाहर आकाश है; और जो भी यह पुरुषसे बाहर आकाश है। वह यही है जो कि यह पुरुषके भीतर आकाश है; तथा जो भी यह पुरुषके भीतर आकाश है। वह यही है जो कि हृदयके अन्तर्गत आकाश है। वह यह हृदयाकाश पूर्ण और कहीं भी प्रवृत्त न होनेवाला है। जो पुरुष ऐसा जानता है वह पूर्ण और कहीं प्रवृत्त न होनेवाली सम्पत्ति प्राप्त करता है ॥ ७–९ ॥
२८६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३
| २८६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| यद्वै तत्त्रिपादमृतं गायत्रीमुखेनोक्तं ब्रह्मेतीदं वाव तदिदमेव तयोऽयं प्रसिद्धो बहिर्धा बहिः पुरुषादाकाशो भौतिको यो वै स बहिर्धा पुरुषादाकाश उक्तः ॥७॥ अयं वाव स योऽयमन्तः पुरुषे शरीर आकाशः । | जो कभी गायत्रीके द्वारा कहा हुआ वह त्रिपाद् अमृत ब्रह्म है वह यही है—वह निश्चय यही है जो कि यह बाहरकी ओर—पुरुषसे बाहर प्रसिद्ध भौतिक आकाश है । तथा जो भी यह पुरुषसे बाहर आकाश बतलाया गया है ॥७॥ वह यही है जो पुरुष अर्थात् शरीरके भीतर आकाश है । | | यो वै सोऽन्तःपुरुष आकाशः ॥८॥ अयं वाव स योऽयमन्तर्हृदये हृदयपुण्डरीक आकाशः । | जो भी वह पुरुषके भीतर आकाश है ॥८॥ वह यही है जो यह हृदयके भीतर अर्थात् हृदयपुण्डरीकमें आकाश है । | | कथमेकस्य सत आकाशस्य त्रिधा भेद इति ? उच्यते— बाह्येन्द्रियविषये जागरितस्थाने नभसि दुःखबाहुल्यं दृश्यते ततोऽन्तःशरीरे स्वप्नस्थानभूते मन्दतरं दुःखं भवति स्वप्नान् पश्यतः । हृदयस्थे पुनर्नभसि न कञ्चन कामं कामयते न कञ्चन स्वप्नं पश्यति । अतः सर्वदुःखनिवृत्तिरूपमाकाशं सुषुप्तस्थानम् । | एक होनेपर भी आकाशका तीन प्रकारका भेद क्यों है ? ऐसा प्रश्न होनेपर कहा जाता है—जो बाह्य इन्द्रियोंका विषय है और जिसकी जाग्रत् अवस्थामें उपलब्धि होती है ऐसे इस आकाशमें दुःखकी बहुलता देखी जाती है । उसकी अपेक्षा स्वप्नमें उपलब्ध होनेवाले शरीरान्तर्गत आकाशमें स्वप्न देखनेवाले पुरुषको मन्दतर दुःख होता है । किन्तु हृदयस्थ आकाशमें जीव न तो किसी भोगकी इच्छा करता है और न कोई स्वप्न ही देखता है; अतः सुषुप्तिमें उपलब्ध होनेवाला आकाश सम्पूर्ण दुःखोंका निवृत्तिरूप है । |
खण्ड १२] शाङ्करभाष्यार्थ २८७
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| अतो युक्तमेकस्यापि त्रिधा भेदान्वाख्यानम् । | इसलिये एक ही आकाशके तीन भेदोंका कथन उचित ही है। |
| बहिर्धा पुरुषादारभ्याकाशस्य हृदये संकोचकरणं चेतःसमाधानस्थानस्तुतये यथा “त्रयाणामपि लोकानां कुरुक्षेत्रं विशिष्यते । अर्धतस्तु कुरुक्षेत्रमर्धतस्तु पृथूदकम्” इति तद्वत् । | पुरुषके बहिःस्थित आकाशसे लेकर जो हृदयदेशमें आकाशका संकोच किया गया है वह चित्तकी एकाग्रताके स्थानकी स्तुतिके लिये है; जिस प्रकार [ स्थानकी स्तुतिके लिये ही ऐसा कहा जाता है—]“तीनों लोकोंमें कुरुक्षेत्र उत्कृष्ट है तथा [ द्विदल धान्यके समान ] आधेमें कुरुक्षेत्र है और आधेमें 'पृथूदक' है” उसी प्रकार [ यहाँ हृदयाकाशकी स्तुति समझनी चाहिये ] । |
| तदेतद्धार्दाकाशाख्यं ब्रह्म पूर्णं सर्वगतं न हृदयमात्रपरिच्छिन्नमिति मन्तव्यम्, यद्यपि हृदयाकाशे चेतः समाधीयते । अप्रवर्ति न कुतश्चित्क्वचित्प्रवर्तितं शीलमस्येत्यप्रवर्ति तदनुच्छित्तिधर्मकम् । यथान्यानि भूतानि परिच्छिन्नान्युच्छित्तिधर्मकाणि न तथा हार्दं नभः। पूर्णमप्रवर्तिनी- | वह यह हृदयाकाशसंज्ञक ब्रह्म पूर्ण—सर्वगत है, वह केवल हृदयमात्रमें ही परिच्छिन्न है—ऐसा नहीं मानना चाहिये; यद्यपि चित्त केवल हृदयाकाशमें ही समाहित किया जाता है । वह अप्रवर्ति अर्थात् अविनाशी स्वभाववाला है—जिसका कभी कहीं प्रवृत्त होनेका स्वभाव न हो उसे अप्रवर्ति कहते हैं । जिस प्रकार अन्य परिच्छिन्न भूत उच्छित्ति(विनाश) धर्मवाले हैं उसी प्रकार हृदयाकाश नाशवान् नहीं है । जो पुरुष इस प्रकार उपर्युक्त पूर्ण और अविनाशी |
२८८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३
| २८८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| मनुच्छेदात्मिकां श्रियं विभूतिं गुणफलं लभते दृष्टम्; य एवं यथोक्तं पूर्णाप्रवर्तिगुणं ब्रह्म वेद जानातीहैव जीवंस्तद्भावं प्रतिपद्यत इत्यर्थः ॥ ९ ॥ | गुणविशिष्ट ब्रह्मको जानता है वह पूर्ण और अप्रवर्तिनी-कभी नष्ट न होनेवाली श्री-विभूति इस दृष्ट गौण फलको प्राप्त करता है । अर्थात् इसी लोकमें यानी जीवित रहते हुए ही तद्रूपताको प्राप्त हो जाता है ॥९॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये द्वादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १२ ॥
त्रयोदश खण्ड
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हृदयान्तर्गत पूर्वसुषिभूत प्राणकी उपासना
तस्य ह वा एतस्य हृदयस्य पञ्च देवसुषयः स योऽस्य प्राङ् सुषिः स प्राणस्तच्चक्षुः स आदित्यस्तदेतत्तेजोऽन्नाद्यमित्युपासीत तेजस्व्यन्नादो भवति य एवं वेद ॥ १ ॥
उस इस प्रसिद्ध हृदयके पाँच देवसुषि हैं । इसका जो पूर्वदिशावर्ती सुषि ( छिद्र ) है वह प्राण है; वह चक्षु है, वह आदित्य है, वही यह तेज और अन्नाद्य है—इस प्रकार उपासना करे । जो इस प्रकार जानता है [ अर्थात् इस प्रकार इनकी उपासना करता है ] वह तेजस्वी और अन्नका भोक्ता होता है ॥ १ ॥
| तस्य ह वा इत्यादिना गायत्र्याख्यस्य ब्रह्मण उपासनाङ्गत्वेन द्वारपालादिगुणविधानार्थमारभ्यते । यथा लोके द्वारपाला राज्ञ उपासनेन वशीकृता राजप्राप्त्यर्था भवन्ति तथेहापीति । | इस ‘तस्य ह वा’ इत्यादि खण्डद्वारा गायत्रीसंज्ञक ब्रह्मकी उपासनाके अङ्गरूपसे द्वारपालादि गुणोंका विधान करनेके लिये [ यह उत्तर ग्रन्थ ] आरम्भ किया जाता है । क्योंकि जिस प्रकार लोकमें राजाके द्वारपाल उपासनासे ( भेंट आदि देकर ) अपने अधीन कर लिये जानेपर राजासे भेंट करनेमें उपयोगी होते हैं उसी प्रकार यहाँ भी [ इन उपासनाङ्गोंका उपयोग होता है ] । |
२९० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३
| २९० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| तस्येति प्रकृतस्य हृदयस्येत्यर्थः। एतस्यानन्तरनिर्दिष्टस्य पञ्च पञ्चसंख्याका देवानां सुषयो देवसुषयः स्वर्गलोकप्राप्तिद्वारच्छिद्राणि, देवैः प्राणादित्यादिभी रक्ष्यमाणानीत्यतो देवसुषयः। तस्य स्वर्गलोकभवनस्य हृदयस्यास्य यः प्राङ् सुषिः पूर्वाभिमुखस्य प्राग्गतं यच्छिद्रं द्वारं स प्राणः, तत्स्थस्तेन द्वारेण यः संचरति वायुविशेषः स प्रागनितीति प्राणः। | ‘तस्य’ अर्थात् उस प्रकृत हृदयके, एतस्य—जिसका अव्यवहित पूर्वमें ही वर्णन किया गया है, पाँच-पाँच संख्यावाले देवसुषि—देवताओंके सुषि अर्थात् स्वर्गलोककी प्राप्तिके द्वारभूत पाँच छिद्र हैं। वे प्राण और आदित्य आदि देवताओंसे सुरक्षित हैं इसलिये देवसुषि कहलाते हैं। स्वर्गलोकके भवनरूप उस इस हृदयका जो प्राङ् सुषि है—पूर्वाभिमुख हृदयका जो पूर्वदिशावर्ती छिद्र यानी द्वार है वह प्राण है। जो उस हृदयमें ही स्थित है और उसीके द्वारा संचार करता है वह वायुविशेष ‘प्राक् अनिति’ इस व्युत्पत्तिके अनुसार प्राण कहलाता है। |
| तेनैव संबद्धमव्यतिरिक्तं तच्चक्षुः, तथैव स आदित्यः “आदित्यो ह वै बाह्यः प्राणः” (प्र० उ० ३।८) इति श्रुतेश्चक्षूरूपप्रतिष्ठाक्रमेण हृदि स्थितः “स आदित्यः कस्मिन्प्रतिष्ठित इति चक्षुषी” (बृ० उ० ३।९।२०) इत्यादि हि वाजसनेयके। | उस (प्राण) हीसे सम्बद्ध और अभिन्न चक्षु है। इसी प्रकार वह आदित्य भी है, जैसा कि “आदित्य निश्चय ही बाह्य प्राण है” इस श्रुतिसे प्रमाणित होता है। वह चक्षु और रूपके प्रतिष्ठाक्रमसे हृदयमें स्थित है। “वह आदित्य किसमें स्थित है ? चक्षुमें” इत्यादि वाजसनेय-श्रुतिमें कहा है। प्राण- |
खण्ड १३ ] शाङ्करभाष्यार्थ २९१
| प्राणवायुदेवतेव ह्येका चक्षुरादित्यश्च सहाश्रयेण। वक्ष्यति च 'प्राणाय स्वाहेति हुतं हविः सर्वमेतत्तर्पयतीति। <br><br> तदेतत्प्राणाख्यं स्वर्गलोकद्वारपालत्वाद्व्रह्म स्वर्गलोकं प्रतिपित्सुस्तेजश्चैतच्चक्षुरादित्यस्वरूपेणान्नाद्यत्वाच्च सवितुस्तेजोऽन्नाद्यमित्याभ्यां गुणाभ्यामुपासीत। ततस्तेजस्व्यन्नादश्चामयावित्वरहितो भवति य एवं वेद तस्यैतद्गुणफलम्। उपासनेन वशीकृतो द्वारपः स्वर्गलोकप्राप्तिहेतुर्भवतीति मुख्यं च फलम्॥१॥ | वायुरूप एक ही देवता एक ही आश्रयमें स्थित होनेके कारण चक्षु और आदित्य नामसे कहे जाते हैं। 'प्राणाय स्वाहा' ऐसा कहकर दिया हुआ हवि चक्षुरादि सम्पूर्ण इन्द्रियोंकी तृप्ति करता है—ऐसा आगे कहेंगे भी। <br><br> वह यह प्राणाख्य ब्रह्म स्वर्गलोकका द्वारपाल है अतः स्वर्गप्राप्तिकी इच्छावाला पुरुष, यह चक्षु और आदित्यरूपसे तथा अन्नाद्यरूपसे सविताका तेज और अन्नाद्य है—इस प्रकार इन दो गुणोंसे इसकी उपासना करे। इससे वह तेजस्वी और अन्नाद अर्थात् रुग्णत्वादिसे रहित होता है। जो ऐसा जानता है उसे यह गौण फल प्राप्त होता है; किन्तु मुख्य फल तो यही है कि उपासनाद्वारा अपने अधीन किया हुआ वह द्वारपाल स्वर्गलोकप्राप्तिका कारण होता है ॥ १ ॥ |
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हृदयान्तर्गत दक्षिणसुषिभूत व्यानकी उपासना
अथ योऽस्य दक्षिणः सुषिः स व्यानस्तच्छ्रोत्रꣳ स चन्द्रमास्तदेतच्छ्रीश्च यशश्चेत्युपासीत श्रीमान्यशस्वी भवति य एवं वेद ॥ २ ॥
छा० उ० १०—
२९२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३
| २९२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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तथा इसका जो दक्षिण छिद्र है वह व्यान है, वह श्रोत्र है, वह चन्द्रमा है और वही यह श्री एवं यश है—इस प्रकार उसकी उपासना करे। जो ऐसा जानता है वह श्रीमान् और यशस्वी होता है ॥ २ ॥
| अथ योऽस्य दक्षिणः सुषिरस्तत्स्थो वायुविशेषः स वीर्यवत्कर्म कुर्वन्विगृह्य वा प्राणापानौ नाना वानीतीति व्यानस्तत्संबद्धमेव च तच्छ्रोत्रमिन्द्रियं तथा स चन्द्रमाः- “श्रोत्रेण सृष्टा दिशश्च चन्द्रमाश्च” इति श्रुतेः। सहाश्रयौ पूर्ववत्। <br><br> तदेतच्छ्रीश्च विभूतिः श्रोत्रचन्द्रमसोर्ज्ञानान्नहेतुत्वम् अतस्ताभ्यां श्रीत्वम्। ज्ञानान्नवतश्च यशः ख्यातिर्भवतीति यशोहेतुत्वाद्यशस्त्वम्, अतस्ताभ्यां गुणाभ्यामुपासीतेत्यादि समानम् ॥ २ ॥ | तथा इसका जो दक्षिण छिद्र है उसमें स्थित जो वायुविशेष है वह वीर्यवान् कर्म करता हुआ गमन करता है या प्राण और अपानसे विरोध करके अथवा नाना प्रकारसे गमन करता है, इस कारण 'व्यान' कहलाता है। उससे सम्बद्ध जो श्रोत्र है वह इन्द्रिय है। तथा उसीसे सम्बद्ध वह चन्द्रमा है, जैसा कि “[ विराट्के ] श्रोत्रद्वारा दिशा और चन्द्रमा रचे गये हैं” इस श्रुतिसे सिद्ध होता है। पूर्ववत् ( चक्षु और आदित्यके समान ) ये भी एक ही आश्रयवाले हैं। <br><br> वह यह [ व्यानसंज्ञक ब्रह्म ] श्री यानी विभूति है। श्रोत्र और चन्द्रमा क्रमशः ज्ञान और अन्नके हेतु हैं; इसलिये उनके द्वारा व्यानका श्रीत्व माना गया है। ज्ञानवान् और अन्नवान्का यश अर्थात् प्रसिद्धि होती है; अतः यशका हेतु होनेसे उसकी यशःस्वरूपता है। अतः उन दो गुणोंसे युक्त उसकी उपासना करे—इत्यादि शेष अर्थ पूर्ववत् है ॥ २ ॥ |
खण्ड १३ ] शाङ्करभाष्यार्थ २९३ ※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※
हृदयान्तर्गत पश्चिमसुषिभूत अपानकी उपासना
अथ योऽस्य प्रत्यङ् सुषिः सोऽपानः सा वाक्सो-
ऽग्निस्तदेतद्ब्रह्मवर्चसमन्नाद्यमित्युपासीत ब्रह्मवर्चस्य-
न्नादो भवति य एवं वेद ॥ ३ ॥
तथा इसका जो पश्चिम छिद्र है वह अपान है, वह वाक् है, वह अग्नि है और वही वह ब्रह्मतेज एवं अन्नाद्य है—इस प्रकार उसकी उपासना करे। जो ऐसा जानता है वह ब्रह्मतेजस्वी और अन्नका भोक्ता होता है ॥ ३ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी भाष्यार्थ |
|---|---|
| अथ योऽस्य प्रत्यङ् सुषिः पश्चिमस्तत्स्थो वायुविशेषः स मूत्रपुरीषाद्यपनयन्नधोऽनितीत्य-पानः सा तथा वाक्; तत्संबन्धात्, तथाग्निः तदेतद्ब्रह्मवर्चसं वृत्तस्वाध्यायनिमित्तं तेजो ब्रह्म-वर्चसम्; अग्निसंबन्धाद् वृत्तस्वाध्यायस्य। अन्नग्रसनहेतुत्वाद-पानस्यान्नाद्यत्वम्। समानमन्यत् ॥ ३ ॥ | तथा इसका जो प्रत्यङ् सुषि—प्रत्यङ् यानी पश्चिम उसमें स्थित जो वायुविशेष है वह मलमूत्रादिको दूर करता हुआ नीचेकी ओर ले जाता है। इसलिये 'अपान' कहलाता है। तथा वही वाक् और अग्नि है, क्योंकि इनका उस (समष्टि अपान) से सम्बन्ध है। वह यह ब्रह्मतेज है—सदाचार और स्वाध्यायके कारण होनेवाले तेजका नाम ब्रह्मवर्चस है, क्योंकि सदाचार और स्वाध्याय अग्निसे सम्बद्ध हैं। अन्न निगलनेमें हेतु होनेके कारण अपानका अन्नभोक्तृत्व स्वीकृत किया गया है। शेष अर्थ पूर्ववत् है ॥ ३ ॥ |
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१६४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३
१६४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३
हृदयान्तर्गत उत्तरसुषिभूत समानकी उपासना
अथ योऽस्योदङ् सुषिः स समानस्तन्मनः स पर्जन्यस्तदेतत्कीर्तिश्च व्युष्टिश्चेत्युपासीत कीर्तिमान्व्युष्टिमान् भवति य एवं वेद ॥ ४ ॥
तथा इसका जो उत्तरीय छिद्र है वह समान है, वह मन है, वह मेघ है और वही यह कीर्ति और व्युष्टि (देहका लावण्य) है—इस प्रकार उसकी उपासना करे। जो इस प्रकार जानता है वह कीर्तिमान् और व्युष्टिमान् होता है ॥ ४ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| अथ योऽस्योदङ् सुषिरुदग्गतः सुषिस्तत्स्थो वायुविशेषः सोऽशितपीते समं नयतीति समानः। तत्संबद्धं मनोऽन्तःकरणं स पर्जन्यो वृष्ट्यात्मको देवः पर्जन्यनिमित्ताश्चाप इति, "मनसा सृष्टा आपश्च वरुणश्च" इति श्रुतेः। | तथा इसका जो उदङ् सुषि—उत्तरवर्ती छिद्र है, उसमें स्थित हुआ जो वायुविशेष है वह खाये-पिये अन्न-जलको समानरूपसे [सम्पूर्ण शरीरमें] ले जाता है, इसलिये 'समान' है। उसीसे सम्बन्ध रखनेवाला मन—अन्तःकरण और वह पर्जन्य यानी वृष्टिरूप देव है, क्योंकि "[विराट् पुरुषके] मनसे अप् और वरुण रचे गये हैं" इस श्रुतिके अनुसार अप् (जल) मेघहीसे होनेवाले हैं। |
| तदेतत्कीर्तिश्च, मनसो ज्ञानस्य कीर्तिहेतुत्वात्; आत्मपरोक्षं विश्रुतत्वं कीर्तिः; यशः स्वकरण- | तथा यह (समाननामक ब्रह्म) ही कीर्ति है, क्योंकि मन यानी ज्ञान ही कीर्तिका हेतु है। अपने पीछे जो विख्यात होती है उसे कीर्ति कहते हैं। जो ख्याति अपनी |
खण्ड १३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ २९५
| संवेद्यं विश्रुतत्वम् । व्युष्टिः कान्तिर्देहगतं लावण्यम् । ततश्च कीर्तिसंभवात्कीर्तिश्चेति । समानमन्यत् ॥ ४ ॥ | इन्द्रियोंसे गृहीत की जा सकती है उसे यश कहते हैं। व्युष्टि—कान्ति यानी देहगत सुन्दरताको कहते हैं। उससे भी कीर्तिकी उत्पत्ति होती है अतः वह भी कीर्ति ही है। शेष अर्थ पूर्ववत् है ॥ ४ ॥ |
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हृदयान्तर्गत ऊर्ध्वसुषिभूत उदानकी उपासना
अथ योऽस्योर्ध्वः सुषिः स उदानः स वायुः स आकाशस्तदेतदोजश्च महश्चेत्युपासीतौजस्वी महस्वान्भवति य एवं वेद ॥ ५ ॥
तथा इसका जो ऊर्ध्व छिद्र है वह उदान है, वह वायु है, वह आकाश है और वही यह ओज और महः है—इस प्रकार उसकी उपासना करे। जो इस प्रकार जानता है वह ओजस्वी (बलवान्) और महस्वान् (तेजस्वी) होता है ॥ ५ ॥
| अथ योऽस्योर्ध्वः सुषिः स उदान आ पादतलादारभ्योर्ध्वमुत्क्रमणादुत्कर्षार्थं च कर्म कुर्वन्ननितीत्युदानः स वायुस्तदाधारश्चाकाशः। तदेतद् वाय्वाकाशयोरोजोहेतुत्वादोजो बलं महत्त्वाच्च मह इति समानमन्यत् ॥५॥ | तथा इसका जो ऊर्ध्व-छिद्र है वह उदान है। पैरके तलुएसे लेकर ऊपरकी ओर उत्क्रमण करनेके कारण और उत्कर्षके लिये कर्म करता हुआ चेष्टा करता है—इसलिये वह 'उदान' है। वही वायु और उसका आधारभूत आकाश भी है। वायु और आकाश ओजके हेतु हैं अतः यह (उदानसंज्ञक ब्रह्म) ही ओज—बल है और महत्ताके कारण महः भी है। शेष अर्थ पूर्ववत् है॥५॥ |
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२९६ | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय ३
| २९६ | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय ३ |
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उपर्युक्त प्राणादि द्वारपालोंकी उपासनाका फल
ते वा एते पञ्च ब्रह्मपुरुषाः स्वर्गस्य लोकस्य द्वार-
पाः स य एतानेवं पञ्च ब्रह्मपुरुषान्स्वर्गस्य लोकस्य द्वार-
पान्वेदास्य कुले वीरो जायते प्रतिपद्यते स्वर्गं लोकं य
एतानेवं पञ्च ब्रह्मपुरुषान्स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपान्वेद॥६॥
वे ये पाँच ब्रह्मपुरुष स्वर्गलोकके द्वारपाल हैं। वह जो कोई भी स्वर्गलोकके द्वारपाल इन पाँच ब्रह्मपुरुषोंको जानता है उसके कुलमें वीर उत्पन्न होता है। जो इस प्रकार स्वर्गलोकके द्वारपाल इन पाँच पुरुषोंको जानता है वह स्वर्गलोकको प्राप्त होता है ॥ ६ ॥
| ते वा एते यथोक्ताः पञ्चसुषिसंबन्धात्पञ्च ब्रह्मणो हार्दस्य पुरुषा राजपुरुषा इव द्वारस्थाः स्वर्गस्य हार्दस्य लोकस्य द्वारपा द्वारपालाः। एतैर्हि चक्षुःश्रोत्रवाङ्मनः प्राणैर्बहिर्मुखप्रवृत्तैर्ब्रह्मणो हार्दस्य प्राप्तिद्वाराणि निरुद्धानि। प्रत्यक्षं ह्येतदजितकरणतया बाह्यविषयासङ्गानृतप्ररूढत्वान्न हार्दे ब्रह्मणि मनस्तिष्ठति। तस्मात्सत्यमुक्तमेते पञ्च ब्रह्मपुरुषाः स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपा इति। | वे ही ये, जैसे कि ऊपर बतलाये गये हैं, पाँच सुषियोंके सम्बन्धके कारण हृदयस्थ ब्रह्मके पाँच पुरुष हैं, अर्थात् द्वारस्थ राजपुरुषोंके समान हृदयस्थ स्वर्गलोकके द्वारपाल हैं। चक्षु, श्रोत्र, वाक्, मन और प्राणोंके द्वारा बाहरकी ओर प्रवृत्त हुए इन्हींके द्वारा हृदयस्थित ब्रह्मकी प्राप्तिके द्वार रुके हुए हैं। यह बात प्रत्यक्ष ही है कि अजितेन्द्रियताके कारण बाह्य विषयोंकी आसक्तिरूप अनृतसे व्याप्त रहनेके कारण मन हृदयस्थित ब्रह्ममें स्थित नहीं होता। अतः यह ठीक ही कहा है कि ये पाँच ब्रह्मपुरुष स्वर्गलोकके द्वारपाल हैं। |
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खण्ड १३ ] शाङ्करभाष्यार्थ २९७
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| अतः स य एतानेवं यथोक्तगुणविशिष्टान् स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपान् वेद उपास्त उपासनया वशीकरोति स राजद्वारपालानिवोपासनेन वशीकृत्य तैरनिवारितः प्रतिपद्यते स्वर्गं लोकं राजानमिव हार्दं ब्रह्म । | अतएव जो कोई इन उपर्युक्त गुणविशिष्ट स्वर्गलोकके द्वारपालोंको इस प्रकार जानता है—उपासना करता है अर्थात् उपासनाद्वारा अपने अधीन करता है, वह राजाके द्वारपालोंके समान इन्हें उपासनाद्वारा वशीभूत कर इनसे निवारित न होता हुआ राजाको प्राप्त होनेके समान स्वर्गलोक यानी हृदयस्थित ब्रह्मको प्राप्त होता है। |
| किं चास्य विदुषः कुले वीरः पुत्रो जायते वीरपुरुषसेवनात् । तस्य चर्णापाकरणेन ब्रह्मोपासनप्रवृत्तिहेतुत्वम् । ततश्च स्वर्गलोकप्रतिपत्तये पारम्पर्येण भवतीति स्वर्गलोकप्रतिपत्तिरेवैकं फलम् ॥ ६ ॥ | तथा वीर पुरुषका सेवन करनेके कारण इस विद्वान्के कुलमें वीर पुत्र उत्पन्न होता है । वह पुत्र पितृऋणकी निवृत्ति करके उसे ब्रह्मकी उपासनामें प्रवृत्त करनेका हेतु होता है । अतः वह परम्परासे उसकी स्वर्गलोकप्राप्तिका भी कारण होता है; इसलिये स्वर्गलोककी प्राप्ति ही इसका एकमात्र फल है ॥ ६ ॥ |
| अथ यदसौ विद्वान्स्वर्गं लोकं वीरपुरुषसेवनात्प्रतिपद्यते, यच्चोक्तं "त्रिपादस्यामृतं दिवि" इति तदिदं लिङ्गेन चक्षुःश्रोत्रेन्द्रिय- | तथा वह विद्वान् वीर पुरुषका सेवन करनेसे जिस स्वर्गलोकको प्राप्त होता है और जिस स्वर्गका "इसका तीन पादरूप अमृत द्युलोकमें है" इस प्रकार वर्णन किया गया है उसीको अब अनुमापक लिङ्गद्वारा चक्षु और श्रोत्रेन्द्रियका विषय |
२९८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३
| २९८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| गोचरमापादयितव्यम्, यथाग्न्यादि धूमादिलिङ्गेन । तथा ह्येवमेवेदमिति यथोक्तेऽर्थे दृढा प्रतीतिः स्यात् । अनन्यत्वेन च निश्चय इति । अत आह— | बनाना है जिस प्रकार कि धूमादि लिङ्गसे अग्नि आदिकी प्रतीति करायी जाती है । ऐसा होनेपर ही उपर्युक्त पदार्थके विषयमें "यह ऐसा ही है" ऐसी दृढ़ प्रतीति हो सकती है और इसी प्रकार उसका अभेद-रूपसे निश्चय भी हो सकता है । इसीलिये श्रुति कहती है— |
हृदयस्थित मुख्य ब्रह्मकी उपासना
अथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते विश्वतः पृष्ठेषु सर्वतः पृष्ठेष्वनुत्तमेषूत्तमेषु लोकेष्विदं वाव तद्यदिदमस्मिन्नन्तः पुरुषे ज्योतिः ॥ ७ ॥
तथा इस द्युलोकसे परे जो परम ज्योति विश्वके पृष्ठपर यानी सबके ऊपर, जिनसे उत्तम कोई दूसरा लोक नहीं है ऐसे उत्तम लोकोंमें प्रकाशित हो रही है वह निश्चय यही है जो कि इस पुरुषके भीतर ज्योति है ॥७॥
| यदतोऽमुष्माद्दिवो द्युलोकात्, परः परमिति लिङ्गव्यत्ययेन, ज्योतिर्दीप्यते, स्वयंप्रभं सदाप्रकाशत्वाद्दीप्तत इव दीप्यत इत्युच्यते; अग्न्यादिवज्ज्वलनलक्षणाया दीप्तेरसम्भवात् । | इस दिव अर्थात् द्युलोकसे परे—यहाँ 'परः' इस पुँल्लिङ्ग पदको नपुंसकलिङ्गमें बदलकर 'परम्' समझना चाहिये—जो ज्योति दीप्त है; नित्य प्रकाशमान होनेसे वह ज्योति स्वयं-प्रकाश है, अतः 'दीप्यते' इस पदसे वह मानो दीप्त होती है—इस प्रकार कहा जाता है, क्योंकि अग्नि आदिके समान उसमें प्रज्वलित होनारूप दीप्तिकी कोई सम्भावना नहीं है । |
खण्ड १३ ] शाङ्करभाष्यार्थं २९९
| विश्वतः पृष्ठेष्वित्येतस्य व्याख्यानं सर्वतः पृष्ठेष्विति, संसारादुपरीत्यर्थः, संसार एव हि सर्वः, असंसारिण एकत्वान्निर्भेदत्वाच्च। अनुत्तमेषु, तत्पुरुषसमासाशङ्कानिवृत्तय आह, उत्तमेषु लोकेष्विति, सत्यलोकादिषु हिरण्यगर्भादिकार्यरूपस्य परस्येश्वरस्यासम्भवादुच्यते, उत्तमेषु लोकेष्विति । | 'विश्वतः पृष्ठेषु' इसीकी व्याख्या 'सर्वतः पृष्ठेषु' ये पद हैं; अर्थात् संसारसे ऊपर, क्योंकि संसार ही सब है; असंसारी ब्रह्म तो एक और भेदरहित है। 'अनुत्तमेषु' इस पदमें [ जो उत्तम न हो—ऐसा अर्थ करके होनेवाली ] तत्पुरुषसमासकी शङ्काको निवृत्त करनेके लिये 'उत्तमेषु लोकेषु' ऐसा कहा है। सत्यलोकादिमें हिरण्यगर्भादि कार्यरूप ब्रह्म समीप रहता है, इसलिये उनके विषयमें 'उत्तमेषु लोकेषु' ऐसा कहा गया है। |
| इदं वावेदमेव तद्यदिदमस्मिन् पुरुषेऽन्तर्मध्ये ज्योतिश्चक्षुःश्रोत्रग्राह्येण लिङ्गेनोष्णिम्ना शब्देन चावगम्यते। यत्त्वचा स्पर्शरूपेण गृह्यते तच्चक्षुषैव; दृढप्रतीतिकरत्वात्त्वचः, अविनाभूतत्वाच्च रूपस्पर्शयोः ॥ ७ ॥ | वह निश्चय यही है जो कि यह इस पुरुषके भीतर ज्योति है, जो क्रमशः चक्षु और श्रोत्रसे ग्रहण किये जाने योग्य उष्णता और शब्दरूप लिङ्गसे जानी जाती है। त्वचाद्वारा स्पर्शरूपसे जिसका ग्रहण किया जाता है उस वस्तुका मानो चक्षुसे ही ग्रहण होता है, क्योंकि त्वचा तो केवल उसकी दृढ़ प्रतीति करानेवाली है, तथा रूप और स्पर्श ये एक-दूसरेके बिना रह नहीं सकते ॥७॥ |
हृदयस्थित परमज्योतिका अनुमापक लिङ्ग
</div>| कथं पुनस्तस्य ज्योतिषो लिङ्गं त्वग्दृष्टिगोचरत्वमापद्यते ? इत्याह— | किंतु उस ज्योतिका अनुमापक लिङ्ग त्वगिन्द्रियकी विषयताको किस प्रकार प्राप्त होता है ? इस विषयमें श्रुति कहती है— |
३०० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ३
३०० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ३
तस्यैषा दृष्टिर्यत्रैतदस्मिञ्शरीरे संस्पर्शैनोष्णि- मानं विजानाति तस्यैषा श्रुतिर्यत्रैतत्कर्णावपिगृह्य निनद- मिव नदथुरिवाग्नेरिव ज्वलत उपशृणोति तदेतद्दृष्टं च श्रुतं चेत्युपासीत चक्षुष्यः श्रुतो भवति य एवं वेद य एवं वेद ॥ ८ ॥
उस इस (हृदयस्थित पुरुष) का यही दर्शनोपाय है जब कि [मनुष्य] इस शरीरमें स्पर्शद्वारा उष्णताको जानता है तथा यही उसका श्रवणोपाय है जब कि यह कानोंको मूँदकर निनद (रथके घोष), नदथु (बैलके डकराने) और जलते हुए अग्निके शब्दके समान श्रवण करता है, वह यह ज्योति दृष्ट और श्रुत है—इस प्रकार इसकी उपासना करे। जो उपासक ऐसा जानता है [इस प्रकार उपासना करता है] वह दर्शनीय और विश्रुत (विख्यात) होता है ॥ ८ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| यत्र यस्मिन्काले, एतदिति क्रियाविशेषणम्, अस्मिञ्शरीरे हस्तेनालभ्य संस्पर्शैनोष्णिमानं रूपसहभाविनमुष्णस्पर्शभावं विजानाति, स ह्युष्णिमा नामरूपव्याकरणाय देहमनुप्रविष्टस्य चैतन्यात्मज्योतिषो लिङ्गमव्यभिचारात् । न हि जीवन्तमात्मान- | ‘यत्र’—जिस समय, ‘एतत्’ यह ‘विजानाति’ इस क्रियाका विशेषण है, इस शरीरमें हाथसे स्पर्श करके उस स्पर्शद्वारा रूपके साथ रहनेवाली उष्णताको जानता है; वह उष्णिमा ही नामरूपका विभाग करनेके लिये देहमें अनुप्रविष्ट हुए चैतन्यात्मज्योतिका अनुमान करानेवाला लिङ्ग है, क्योंकि उसका कभी व्यभिचार नहीं होता । जीवित शरीरको उष्णता कभी नहीं |
खण्ड १३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३०१
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
|---|---|
| मुष्णिमा व्यभिचरति । 'उष्ण एव जीविष्यञ्छीतो मरिष्यन्' इति हि विज्ञायते । मरणकाले च तेजः परस्यां देवतायामिति परेणाविभागत्वोपगमात् । अतोऽसाधारणं लिङ्गमौष्ण्यमग्नेरिव धूमः । अतस्तस्य परस्यैषा दृष्टिः साक्षादिव दर्शनं दर्शनोपाय इत्यर्थः । | त्यागती । जीवित रहनेवाला उष्ण ही होता है और मरनेवाला शीत होता है—ऐसा ही जाना जाता है। मरण-कालमें तेज पर देवतामें लीन हो जाता है, क्योंकि उस समय पर देवताके साथ उसका अभेद हो जाता है। अतः धूम जिस प्रकार अग्निका अनुमापक है उसी प्रकार उष्णता जीवनका असाधारण लिङ्ग है। इसलिये उस पर देवताकी यह दृष्टि यानी साक्षात् दर्शनके समान उसके दर्शनका साधन है—ऐसा इसका तात्पर्य है। |
| तथा तस्य ज्योतिष एषा श्रुतिः श्रवणं श्रवणोपायोऽप्युच्यमानः । यत्र यदा पुरुषो ज्योतिषो लिङ्गं शुश्रूषति तदेतत्कर्णावपिगृह्यैतच्छब्दः क्रियाविशेषणम् । अपिगृह्यापिधायेत्यर्थोऽङ्गुलिभ्यां प्रोर्णुत्य निनदमिव रथस्येव घोषो निनदस्तमिव शृणोति नदथुरिव ऋषभकूजितमिव शब्दो यथा चाग्ने- | तथा यह उस ज्योतिकी श्रुति—श्रवण यानी सुननेका आगे कहा जानेवाला उपाय है। जहाँ—जिस समय पुरुष इस ज्योतिके लिङ्गको सुनना चाहता है उस समय, 'एतत् कर्णावपिगृह्य' यहाँ 'एतत्' शब्द 'अपिगृह्य' क्रियाका विशेषण है, अर्थात् कानोंको इस प्रकार मूँदकर—अङ्गुलियोंसे बंदकर निनदके समान—रथके घोषको 'निनद' कहते हैं, उसके समान शब्द सुनता है तथा नदथु—बैलके डकराने-के समान और जिस प्रकार बाहर |
३०२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३
| ३०२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| बहिर्ज्वलत एवं शब्दमन्तःशरीर उपशृणोति । <br><br> यदेतज्ज्योतिर्दृष्टश्रुतलिङ्गत्वाद् दृष्टं च श्रुतं चेत्युपासीत । यथोपासनाच्चक्षुष्यो दर्शनीयः श्रुतो विश्रुतश्च । यत्स्पर्शगुणोपासननिमित्तं फलं तद्रूपे संपादयति चक्षुष्य इति, रूपस्पर्शयोः सहभावित्वात्, इष्टत्वाच्च दर्शनीयतायाः । एवं च विद्यायाः फलमुपपन्नं स्यान्न तु मृदुत्वादिस्पर्शवत्त्वे । य एवं यथोक्तौ गुणौ वेद । स्वर्गलोकप्रतिपत्तिस्तूक्तमदृष्टं फलम् । द्विरभ्यास आदरार्थः ॥ ८ ॥ | जलते हुए अग्निका शब्द होता है उस प्रकारके शब्दका अपने शरीरके भीतर श्रवण करता है। <br><br> इस प्रकार यह ज्योति दृष्ट और श्रुत लिङ्गयुक्त होनेसे दृष्ट और श्रुत है—इस तरह इसकी उपासना करे। इस प्रकार उपासना करनेसे वह उपासक चक्षुष्य—दर्शनीय और श्रुत—विख्यात हो जाता है। स्पर्शगुणसम्बन्धिनी उपासनासे जो फल होता है उसीको श्रुति 'चक्षुष्य' ऐसा कहकर रूपमें सम्पादन करती है, क्योंकि रूप और स्पर्श ये दोनों साथ-साथ रहनेवाले हैं और दर्शनीयता सबको इष्ट भी है। इस प्रकार [ दर्शनीयताके मिलनेसे ] ही इस विद्याका दृष्ट फल उत्पन्न हो सकता है, मृदुत्वादि स्पर्शयुक्त होनेसे नहीं। इस प्रकार जो इन दोनों गुणोंको जानता है [ उसे इस फलकी प्राप्ति होती है ]। स्वर्गलोककी प्राप्ति तो इसका अदृष्ट फल बतलाया गया है। 'य एवं वेद—य एवं वेद' यह द्विरुक्ति आदरके लिये है॥८॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये त्रयोदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १३ ॥
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चतुर्दश खण्ड
शाण्डिल्यविद्या
सर्वदृष्टिसे ब्रह्मोपासना
| पुनस्तस्यैव त्रिपादमृतस्य ब्रह्मणोऽनन्तगुणवतोऽनन्तशक्तेरनेकभेदोपास्यस्य विशिष्टगुणशक्तिमत्त्वेनोपासनं विधित्सन्नाह— | अब फिर उसी त्रिपादमृत, अनन्तगुणवान्, अनन्तशक्ति और अनेक प्रकारसे उपासनीय ब्रह्मकी विशिष्टगुणयुक्त और शक्तिमान् रूपसे उपासनाका विधान करनेकी इच्छासे श्रुति कहती है— |
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सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत ।
अथ खलु क्रतुमयः पुरुषो यथाक्रतुरस्मँल्लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति स क्रतुं कुर्वीत ॥ १ ॥
यह सारा जगत् निश्चय ब्रह्म ही है, यह उसीसे उत्पन्न होनेवाला, उसीमें लीन होनेवाला और उसीमें चेष्टा करनेवाला है—इस प्रकार शान्त [रागद्वेषरहित] होकर उपासना करे, क्योंकि पुरुष निश्चय ही क्रतुमय—निश्चयात्मक है; इस लोकमें पुरुष जैसे निश्चयवाला होता है वैसा ही यहाँसे मरकर जानेपर होता है । अतः उस पुरुषको निश्चय करना चाहिये ॥१॥
| सर्वं समस्तं खल्विति वाक्यालङ्कारार्थो निपातः । इदं जगन्नामरूपविकृतं प्रत्यक्षादिविषयं ब्रह्म कारणं वृद्धतमत्वादूब्रह्म । | सर्व—समस्त 'खलु' यह निपात वाक्यकी शोभा बढ़ानेके लिये है । यह अर्थात् नाम-रूपमय विकारको प्राप्त होनेवाला और प्रत्यक्षादि प्रमाणोंका विषयभूत जगत् ब्रह्म—कारणरूप ही है । वृद्धतम [ सबसे बड़ा ] होनेके कारण वह [ जगत्-का कारण ] ब्रह्म कहलाता है । |
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