भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 301, कुल 978 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 301

खण्ड १३ ] शाङ्करभाष्यार्थ २९७


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
अतः स य एतानेवं यथोक्तगुणविशिष्टान् स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपान् वेद उपास्त उपासनया वशीकरोति स राजद्वारपालानिवोपासनेन वशीकृत्य तैरनिवारितः प्रतिपद्यते स्वर्गं लोकं राजानमिव हार्दं ब्रह्म ।अतएव जो कोई इन उपर्युक्त गुणविशिष्ट स्वर्गलोकके द्वारपालोंको इस प्रकार जानता है—उपासना करता है अर्थात् उपासनाद्वारा अपने अधीन करता है, वह राजाके द्वारपालोंके समान इन्हें उपासनाद्वारा वशीभूत कर इनसे निवारित न होता हुआ राजाको प्राप्त होनेके समान स्वर्गलोक यानी हृदयस्थित ब्रह्मको प्राप्त होता है।
किं चास्य विदुषः कुले वीरः पुत्रो जायते वीरपुरुषसेवनात् । तस्य चर्णापाकरणेन ब्रह्मोपासनप्रवृत्तिहेतुत्वम् । ततश्च स्वर्गलोकप्रतिपत्तये पारम्पर्येण भवतीति स्वर्गलोकप्रतिपत्तिरेवैकं फलम् ॥ ६ ॥तथा वीर पुरुषका सेवन करनेके कारण इस विद्वान्के कुलमें वीर पुत्र उत्पन्न होता है । वह पुत्र पितृऋणकी निवृत्ति करके उसे ब्रह्मकी उपासनामें प्रवृत्त करनेका हेतु होता है । अतः वह परम्परासे उसकी स्वर्गलोकप्राप्तिका भी कारण होता है; इसलिये स्वर्गलोककी प्राप्ति ही इसका एकमात्र फल है ॥ ६ ॥
अथ यदसौ विद्वान्स्वर्गं लोकं वीरपुरुषसेवनात्प्रतिपद्यते, यच्चोक्तं "त्रिपादस्यामृतं दिवि" इति तदिदं लिङ्गेन चक्षुःश्रोत्रेन्द्रिय-तथा वह विद्वान् वीर पुरुषका सेवन करनेसे जिस स्वर्गलोकको प्राप्त होता है और जिस स्वर्गका "इसका तीन पादरूप अमृत द्युलोकमें है" इस प्रकार वर्णन किया गया है उसीको अब अनुमापक लिङ्गद्वारा चक्षु और श्रोत्रेन्द्रियका विषय