छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 302, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| २९८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| गोचरमापादयितव्यम्, यथाग्न्यादि धूमादिलिङ्गेन । तथा ह्येवमेवेदमिति यथोक्तेऽर्थे दृढा प्रतीतिः स्यात् । अनन्यत्वेन च निश्चय इति । अत आह— | बनाना है जिस प्रकार कि धूमादि लिङ्गसे अग्नि आदिकी प्रतीति करायी जाती है । ऐसा होनेपर ही उपर्युक्त पदार्थके विषयमें "यह ऐसा ही है" ऐसी दृढ़ प्रतीति हो सकती है और इसी प्रकार उसका अभेद-रूपसे निश्चय भी हो सकता है । इसीलिये श्रुति कहती है— |
हृदयस्थित मुख्य ब्रह्मकी उपासना
अथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते विश्वतः पृष्ठेषु सर्वतः पृष्ठेष्वनुत्तमेषूत्तमेषु लोकेष्विदं वाव तद्यदिदमस्मिन्नन्तः पुरुषे ज्योतिः ॥ ७ ॥
तथा इस द्युलोकसे परे जो परम ज्योति विश्वके पृष्ठपर यानी सबके ऊपर, जिनसे उत्तम कोई दूसरा लोक नहीं है ऐसे उत्तम लोकोंमें प्रकाशित हो रही है वह निश्चय यही है जो कि इस पुरुषके भीतर ज्योति है ॥७॥
| यदतोऽमुष्माद्दिवो द्युलोकात्, परः परमिति लिङ्गव्यत्ययेन, ज्योतिर्दीप्यते, स्वयंप्रभं सदाप्रकाशत्वाद्दीप्तत इव दीप्यत इत्युच्यते; अग्न्यादिवज्ज्वलनलक्षणाया दीप्तेरसम्भवात् । | इस दिव अर्थात् द्युलोकसे परे—यहाँ 'परः' इस पुँल्लिङ्ग पदको नपुंसकलिङ्गमें बदलकर 'परम्' समझना चाहिये—जो ज्योति दीप्त है; नित्य प्रकाशमान होनेसे वह ज्योति स्वयं-प्रकाश है, अतः 'दीप्यते' इस पदसे वह मानो दीप्त होती है—इस प्रकार कहा जाता है, क्योंकि अग्नि आदिके समान उसमें प्रज्वलित होनारूप दीप्तिकी कोई सम्भावना नहीं है । |