छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 292, कुल 978 में से
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| २८८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| मनुच्छेदात्मिकां श्रियं विभूतिं गुणफलं लभते दृष्टम्; य एवं यथोक्तं पूर्णाप्रवर्तिगुणं ब्रह्म वेद जानातीहैव जीवंस्तद्भावं प्रतिपद्यत इत्यर्थः ॥ ९ ॥ | गुणविशिष्ट ब्रह्मको जानता है वह पूर्ण और अप्रवर्तिनी-कभी नष्ट न होनेवाली श्री-विभूति इस दृष्ट गौण फलको प्राप्त करता है । अर्थात् इसी लोकमें यानी जीवित रहते हुए ही तद्रूपताको प्राप्त हो जाता है ॥९॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये द्वादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १२ ॥