छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
६५६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ६
६५६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ६
तस्य क्व मूलँस्यादन्यत्राद्भ्योऽद्भिः सोम्य शुङ्गेन तेजो मूलमन्विच्छ तेजसा सोम्य शुङ्गेन सन्मूलमन्विच्छ सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठा यथा नु खलु सोम्येमास्तिस्रो देवताः पुरुषं प्राप्य त्रिवृत्त्रिवृदेकैका भवति तदुक्तं पुरस्तादेव भवत्यस्य सोम्य पुरुषस्य प्रयतो वाङ्मनसि सम्पद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायाम् ॥ ६ ॥
हे सोम्य ! उस (जलके परिणामभूत शरीर) का जलके सिवा और कहाँ मूल हो सकता है ? हे प्रियदर्शन ! जलरूप अङ्कुरके द्वारा तू तेजोरूप मूलकी खोज कर और हे सोम्य ! तेजोरूप अङ्कुरके द्वारा सदरूप मूलकी शोध कर । हे सोम्य ! यह सम्पूर्ण प्रजा सन्मूलक तथा सदरूप आयतन और सदरूप प्रतिष्ठा (लयस्थान) वाली है । हे सोम्य ! जिस प्रकार ये तीनों देवता पुरुषको प्राप्त होकर उनमेंसे प्रत्येक त्रिवृत्-त्रिवृत् हो जाता है वह मैंने पहले ही कह दिया । हे सोम्य मरणको प्राप्त होते हुए इस पुरुषकी वाक् मनमें लीन हो जाती है तथा मन प्राणमें, प्राण तेजमें और तेज परदेवतामें लीन हो जाता है ॥ ६ ॥
| सामर्थ्यात्तेजसोऽप्येतदेव शरीराख्यं शुङ्गम् । अतोऽप्शुङ्गेन देहेनापो मूलं गम्यते । अद्भिः शुङ्गेन तेजो मूलं गम्यते । तेजसा शुङ्गेन सन्मूलं गम्यते पूर्ववत् । एवं हि तेजोऽबन्नमयस्य | त्रिवृत्करणके सामर्थ्यसे यह ज्ञात होता है कि तेजका भी यही शरीर-संज्ञक शुङ्ग (कार्य) है ? अतः जलके कार्यभूत देहद्वारा उसके मूल जलका ज्ञान होता है, जलरूप कार्यसे उसके मूल तेजका पता लगता है तथा तेजोरूप कार्यसे उसके मूल सतका ज्ञान होता है—ऐसा पूर्ववत समझना चाहिये । इस प्रकार तेज, जल और अन्नके |
खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५७
| देहशुङ्गस्य वाचारम्भणमात्रस्यान्नादिपरम्परया परमार्थसत्यं सन्मूलमभयमसंत्रासं निरायासं सन्मूलमन्विच्छेति पुत्रं गमयित्वाऽशिशिषति पिपासतीति नामप्रसिद्धिद्वारेण यदन्यदिहास्मिन्प्रकरणे तेजोऽबन्नानां पुरुषेणोपयुज्यमानानां कार्यकारणसंघातस्य देहशुङ्गस्य स्वजात्यसाङ्कर्येणोपचयकरत्वं वक्तव्यं प्राप्तं तदिहोक्तमेव द्रष्टव्यमिति पूर्वोक्तं व्यपदिशति । | विकार वाचारम्भणमात्र देहरूप कार्यके परमार्थ सत्य निर्भय निस्त्रास और निरायास सद्रूप मूलको अन्नादि परम्परासे जान—ऐसा पुत्रको समझाकर और इसके सिवा ‘अशिशिषति’ और ‘पिपासति’ इन नामोंकी प्रसिद्धिके द्वारा इस प्रकरणमें जो पुरुषद्वारा उपभोगमें लाये जानेवाले तेज, जल और अन्नका अपनी जातिका सांकर्य न करते हुए भूत और इन्द्रियोंके संघातभूत इस शरीरका पोषकत्व बतलाना प्राप्त होता था वह भी ऊपर बतला ही दिया गया है—ऐसा जानना चाहिये—यह बतलानेके लिये आरुणि पहले कहे हुए प्रसंगका ही निर्देश करता है। |
| यथा नु खलु येन प्रकारेणेमास्तेजोऽबन्नाख्यास्तिस्रो देवताः पुरुषं प्राप्य त्रिवृत्त्रिवृदेकैका भवति तदुक्तं पुरस्तादेव भवत्यन्नमशितं त्रेधा विधीयत इत्यादि तत्रैवोक्तम् । अन्नादीनामशितानां ये मध्यमा धातवस्ते सप्तधातुकं | हे सोम्य ! जिस प्रकार ये तेज, जल और अन्नसंज्ञक तीनों देवता पुरुषको प्राप्त होकर इनमेंसे प्रत्येक त्रिवृत-त्रिवृत् हो जाता है वह पहले ही कहा जा चुका है। ‘खाया हुआ अन्न तीन प्रकारका हो जाता है’ यह बात वहीं कही गयी है। वहीं यह भी बतलाया गया है कि भक्षण किये हुए अन्नादिका जो |
३५८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ३५८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| शरीरमुपचिन्वन्तीत्युक्तम्। मांसं भवति लोहितं भवति मज्जा भवत्यस्थि भवतीति। ये त्वणिष्ठा धातवो मनः प्राणं वाचं देहस्यान्तःकरण संघातमुपचिन्वन्तीति चोक्तम्—तन्मनो भवति स प्राणो भवति सा वाग्भवतीति। | मध्यम भाग होता है वह सात धातुओंवाले*शरीरका पोषण करता है; यथा—'मांस होता है', 'लोहित होता है', 'मज्जा होता है', 'अस्थि होता है' इत्यादि। तथा यह भी बतलाया गया है कि उनका जो सूक्ष्मतम भाग होता है वह मन, प्राण और वाक् इस देहके अन्तःकरणसंघातका पोषण करता है। यथा—'वह मन होता है', 'वह प्राण होता है' 'वह वाक होती है' इत्यादि। | | सोऽयं प्राणकरणसंघातो देहे विशीर्णे देहान्तरं जीवाधिष्ठितो येन क्रमेण पूर्वदेहात्प्रच्युतो गच्छति तदाहास्य हे सोम्य पुरुषस्य प्रयतो म्रियमाणस्य वाङ्मनसि सम्पद्यते मनस्युपसंह्रियते। अथ तदाहुर्ज्ञातयो न वदतीति। मनःपूर्वो हि वाग्व्यापारः, "यद्धै मनसा ध्यायति | वह यह प्राण और इन्द्रियोंका संघात देहके नष्ट होनेपर जीवसे अधिष्ठित हुआ जिस क्रमसे पूर्व देहसे च्युत होकर अन्य देहको प्राप्त होता है उसका वर्णन आरुणि करता है—'हे सोम्य ! इस पुरुषके मरते समय वाणी मनको प्राप्त हो जाती है अर्थात् वाणीका मनमें उपसंहार हो जाता है। उस समय जातिवाले कहा करते हैं कि 'यह नहीं बोलता' क्योंकि वाणीका व्यापार तो मनःपूर्वक ही होता है; जैसा कि "जो बात मनसे सोचता |
* शरीरके आधारभूत सात धातु ये हैं-त्वचा, रक्त, मांस, मेद, मज्जा, अस्थि और वीर्य।
खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ६५९
| संस्कृत-मूल | हिन्दी-भाष्यार्थ |
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| तद्वाचा वदति" (नृ० पू० ता० उ० १ । १) इति श्रुतेः । | है वही वाणीसे बोलता है" इस श्रुतिसे सिद्ध होता है । |
| वाच्युपसंहृतायां मनसि मनो मननव्यापारेण केवलेन वर्तते । | वाणीका मनमें उपसंहार हो जानेपर मन केवल मननव्यापार करता हुआ वर्तमान रहता है । |
| मनोऽपि यदोपसंह्रियते तदा मनः प्राणे सम्बद्धं भवति-सुषुप्तकाल इव; तदा पार्श्वस्था ज्ञातयो न विजानातीत्याहुः । प्राणश्च तदोर्ध्वोच्छवासी स्वात्मन्युपसंहृतबाह्यकरणः संवर्गविद्यायां दर्शनाद्धस्तपादादीन्विक्षिपन्मर्मस्थानानि निकृन्तन्निव उत्सृजन्क्रमेणोपसंहृतस्तेजसि सम्पद्यते । तदाहुर्ज्ञातयो न चलतीति । मृतो नेति वा विचिकित्सन्तो देहमालभमाना उष्णं चोपलभमाना देह उष्णो जीवतीति । यदा | जिस समय मनका भी उपसंहार होता है उस समय मन प्राणमें लीन हो जाता है । तब आस-पास बैठे हुए जातिवाले कहते हैं—'अब यह पहचानता नहीं है' उस समय, जिसने बाह्य इन्द्रियोंका अपनेमें उपसंहार कर लिया है वह प्राण ऊर्ध्वोच्छ्वासी होकर—क्योंकि संवर्ग विद्यामें※ [ प्राण, वागादिको अपनेमें लीन कर लेता है—ऐसा ] दिखलाया गया है—हाथ-पाँव पटकता हुआ मानो मर्मस्थानोंका छेदन करता बहिर्गत होनेके लिये क्रमशः उपसंहृत होकर तेजमें लीन हो जाता है । तब जातिवाले कहते हैं—'अब हिल-डुल नहीं सकता' । फिर यह शङ्का करते हुए कि अभी मरा है या नहीं वे देहका स्पर्श करते हैं और देहमें उष्णता देखकर कहते हैं 'अभी शरीर उष्ण है, अतः जीता है' । जिस समय |
※ देखिये छान्दोग्य० ४ । ३ । ३ ।
६६० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ६६० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| तदप्यौष्ण्यलिङ्गं तेज उपसंह्रियते तदा तत्तेजः परस्यां देवतायां प्रक्षाम्यति ।<br><br>तदैवं क्रमेणोपसंहृते स्वमूलं प्राप्ते च मनसि तत्स्थो जीवोऽपि सुषुप्तकालवन्निमित्तोपसंहारादुपसंह्रियमाणः सन्सत्याभिसन्धिपूर्वकं चेदुपसंह्रियते सदेव सम्पद्यते न पुनर्देहान्तराय सुषुप्तादिवोत्तिष्ठति । यथा लोके सभये देशे वर्तमानः कथञ्चिदिवाभयं देशं प्राप्तस्तद्वत् । इतरस्त्वनात्मज्ञस्तस्मादेव मुलात्सुषुप्तादिवोत्थाय मृत्वा पुनर्देहजालमाविशति यस्मान्मूलादुत्थाय देहमाविशति जीवः ॥ ६ ॥ | उष्णता ही जिसका लिङ्ग है वह तेज भी उपसंहृत हो जाता है तब वह तेज परदेवतामें प्रशान्त होता है ।<br><br>तब इस प्रकार क्रमशः उपसंहृत होकर मनके अपने मूलभूत पर देवताको प्राप्त होनेपर उसमें स्थिर जीव भी सुषुप्तकालके समान अपने निमित्त [ मन ] का उपसंहार हो जानेके कारण उपसंहृत होता हुआ यदि सत्यानुसंधानपूर्वक उपसंहृत होता है तो सत्को ही प्राप्त हो जाता है; सोनेसे जगे हुए पुरुषके समान फिर देहान्तरको प्राप्त नहीं होता; जिस प्रकार कि लोकमें भयपूर्ण देशमें रहनेवाला कोई प्राणी किसी प्रकार अभय देशमें पहुँच जानेपर [ फिर उससे नहीं लौटता ] उसी प्रकार [यह भी नहीं लौटता] । किंतु अन्य जो अनात्मज्ञ है वह सोनेसे जगे हुए पुरुषके समान मरनेके अनन्तर उस अपने मूलसे, जिस मूलसे कि जीव उठकर देहमें प्रवेश करता है, उठकर फिर देहपाशमें प्रवेश करता है ॥ ६ ॥ |
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खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ६६१
स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदꣳसर्वं तत्सत्यꣳस आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवा-न्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ७ ॥
वह जो यह अणिमा है एतद्रूप ही यह सब है। वह सत्य है, वह आत्मा है और हे श्वेतकेतो ! वही तू है [ आरुणिके इस प्रकार कहने-पर श्वेतकेतु बोला— ] 'भगवन् ! मुझे फिर समझाइये।' [ तब आरुणिने ] 'अच्छा, सोम्य !' ऐसा कहा ॥ ७ ॥
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| स यः सदाख्य एष उक्तोऽणिमाणुभावो जगतो मूलमैतदात्म्यमेतत्सदात्मा यस्य सर्वस्य तदेतदात्म तस्य भाव ऐतदात्म्यम् । एतेन सदाख्येनात्मनात्मवत्सर्वमिदं जगत् । नान्योऽस्त्यस्यात्मा संसारी, “नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ नान्यदतोऽस्ति श्रोतृ” (बृ०उ० ३ । ८ । ११) इत्यादिश्रुत्यन्तरात् ।<br><br>येन चात्मनात्मवत्सर्वमिदं जगत्तदेव सदाख्यं कारणं सत्यं परमार्थसत् । अतः स एवात्मा जगतः प्रत्यक्स्वरूपं सतत्त्वं याथात्म्यम् । आत्मशब्दस्य निरुपपदस्य प्रत्यगा- | यह जो सत्संज्ञक अणिमा—अणुता जगत्का मूल बतलायी गयी है 'ऐतदात्म्य' यह सब है—जिस सबकी एतत् (यह) सत् आत्मा है उसे 'एतदात्म' कहते हैं उसका भाव 'ऐतदात्म्य' है; अर्थात् इस सत्संज्ञक आत्मासे यह सारा जगत् आत्मवान् है। इसका आत्मा कोई और संसारी नहीं है; जैसा कि “इससे अन्य कोई द्रष्टा नहीं है, इससे अन्य कोई श्रोता नहीं है” इस अन्य श्रुतिसे प्रमाणित होता है।<br><br>जिस आत्मासे यह सारा जगत् आत्मवान् है वही सत्संज्ञक कारण सत्य अर्थात् परमार्थ सत् है। अतः वह आत्मा ही जगत्का प्रत्यक् स्वरूप—सतत्त्व अर्थात् याथात्म्य है, क्योंकि जिस प्रकार गो आदि शब्द बैल, गाय आदि अर्थमें रूढ़ |
३६२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ३६२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| त्मनि गवादिशब्दवन्निरूढत्वात् । अतस्तत्त्वमसीति हे श्वेतकेतो । <br><br> इत्येवं प्रत्यायितः पुत्र आह भूय एव मा भगवान्विज्ञापयतु यद्भवदुक्तं तत्संदिग्धं ममाहन्यहनि सर्वाः प्रजाः सुषुप्ते सत्संपद्यन्त इत्येतद्येन सत्सम्पद्य न विदुः सत्सम्पन्ना वयमिति । अतो दृष्टान्तेन मां प्रत्यायत्वित्यर्थः । एवमुक्तस्तथास्तु सोम्येति होवाच पिता ॥ ७ ॥ | हैं उसी प्रकार उपपदरहित 'आत्मा शब्द प्रत्यगात्मामें रूढ है । अतः हे श्वेतकेतो ! वह् सत् तू है । <br><br> इस प्रकार प्रतीति कराये हुए पुत्रने फिर कहा—'भगवन् ! आप मुझे फिर समझाइये । आपने जो कहा है उससे अभी मुझे संदेह ही है—सम्पूर्ण प्रजा रोज-रोज सुषुप्तिमें सत्को प्राप्त होती है; अतः इस विषयमें मुझे संदेह ही है कि वह यह कैसे नहीं जानती कि हम सत्को प्राप्त हो गये हैं । इसलिये तात्पर्य यह है कि आप मुझे दृष्टान्त देकर समझाइये' इस प्रकार कहे जानेपर पिताने 'सौम्य ! अच्छा' ऐसा कहा ॥ ७ ॥ |
<div align="center">इतिच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठाध्याये
अष्टमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ८ ॥
नवम खण्ड
सुषुप्तिमें 'सत्'की प्राप्तिका ज्ञान न होनेमें मधुमक्खियोंका दृष्टान्त
| यत्पृच्छस्यहन्यहनि सत्सम्पद्य <br><br> न विदुः सत्सम्पन्नाः स्म इति <br><br> तत्कस्मादित्यत्र शृणु दृष्टान्तम्— | तू जो पूछता है कि प्रजा जो प्रतिदिन सत्को प्राप्त होकर भी यह नहीं जानती कि हम सत्को प्राप्त हो गये हैं, सो उसका यह अज्ञान किस कारणसे है ?—इस विषयमें दृष्टान्त श्रवण कर— |
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यथा सोम्य मधु मधुकृतो निस्तिष्ठन्ति नानात्ययानां वृक्षाणाँरसान्समवहारमेकताँरसं गमयन्ति ॥ १ ॥
हे सोम्य ! जिस प्रकार मधुमक्खियाँ मधु निष्पन्न (तैयार) करती हैं तो नाना दिशाओंके वृक्षोंका रस लाकर एकताको प्राप्त करा देती हैं ॥१॥
| यथा लोके हे सोम्य मधुकृतो मधु कुर्वन्तीति मधुकृतो मधुकरमक्षिका मधु निस्तिष्ठन्ति मधु निष्पादयन्ति तत्पराः सन्तः । कथम् ? नानात्ययानां नानागतीनां नानादिक्कानां वृक्षाणां रसान्समवहारं समाहृत्यैकतामेकभावं मधुत्वेन रसान्गमयन्ति मधुत्वमापादयन्ति ॥ १ ॥ | हे सोम्य ! जिस प्रकार लोकमें मधुकृत--मधु करती हैं इसलिये जो मधुकृत कही जाती हैं। वे मधुमक्खियाँ तत्पर होकर मधु तैयार करती हैं । किस प्रकार तैयार करती हैं ? नानात्यय नाना गतियोंवाले ( नाना प्रकारके ) विविध दिशाओंमें स्थित वृक्षोंके रस लाकर उन रसोंको मधुरूपसे एकताको प्राप्त करा देती हैं अर्थात् मधुत्वको प्राप्त करा देती हैं ॥ १ ॥ |
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६६४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ६६४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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ते तथा तत्र न विवेकं लभन्तेऽमुष्याहं वृक्षस्य रसोऽस्म्यमुष्याहं वृक्षस्य रसोऽस्मीत्येव खलु सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सति सम्पद्य न विदुः सति सम्पद्यामह इति ॥ २ ॥
वे रस जिस प्रकार उस मधुमें इस प्रकारका विवेक प्राप्त नहीं कर सकते कि 'मैं इस वृक्षका रस हूँ और मैं इस वृक्षका रस हूँ' हे सोम्य! ठीक इसी प्रकार यह सम्पूर्ण प्रजा सत्को प्राप्त होकर यह नहीं जानती कि हम सत्को प्राप्त हो गये ॥ २ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
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| ते रसा यथा मधुत्वेनैकतां गतास्तत्र मधुनि विवेकं न लभन्ते। कथममुष्याहमाम्रस्य पनसस्य वा वृक्षस्य रसोऽस्मीति यथा हि लोके बहूनां चेतनावतां समेतानां प्राणिनां विवेकलाभो भवत्यमुष्याहं पुत्रोऽमुष्याहं नप्तास्मीति। ते च लब्धविवेकाः सन्तो न संकीर्यन्ते न तथेहानेकप्रकारवृक्षरसानामपि मधुराम्लतिक्तकटुकादीनां मधुत्वेनैकतां गतानां मधुरादिभावेन विवेको गृह्यत इत्यभिप्रायः। | मधुरूपसे एकताको प्राप्त हुए वे रस जिस प्रकार उस मधुमें [ इस प्रकारका ] विवेक प्राप्त नहीं करते—किस प्रकारका ?—कि मैं इस आम अथवा कटहलके वृक्षका रस हूँ, जिस प्रकार कि लोकमें बहुत-से चेतन प्राणियोंके एकत्रित होनेपर इस प्रकार विवेक हुआ करता है कि 'मैं इसका पुत्र हूँ, इसका नाती हूँ' इत्यादि और इस प्रकार विवेक रखनेके कारण वे आपसमें नहीं मिलते, उसी प्रकार यहाँ मधुरूपसे एकताको प्राप्त हुए अनेकों वृक्षोंके मीठे, खट्टे, तीखे अथवा कड़वे रसोंका मधुर आदि रूपसे विवेक ग्रहण नहीं किया जाता—ऐसा इसका अभिप्राय है। |
| यथायं दृष्टान्त इत्येवमेव खलु सोम्येमाः सर्वाः प्रजा | जैसा कि यह दृष्टान्त है ठीक इसी प्रकार हे सोम्य ! यह सम्पूर्ण प्रजा |
खण्ड ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६६५
| अहन्यहनि सति सम्पद्य सुषुप्तिकाले मरणप्रलययोश्च न विदुर्न विजानीयुः—सति सम्पद्यामह इति सम्पन्ना इति वा ॥ २ ॥ | नित्य प्रति सुषुप्ति, मृत्यु तथा प्रलयकालमें सत्को प्राप्त होकर यह नहीं जानती कि हम सत्को प्राप्त हो रहे हैं अथवा हो गये हैं ॥ २ ॥ |
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| यस्माच्चैवमात्मनः सद्रूपतामज्ञात्वैव सत्सम्पद्यते, अतः— | क्योंकि इस प्रकार वे अपनी सद्रूपताको बिना जाने ही सत्को प्राप्त होते हैं; इसलिये— |
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त इह व्याघ्रो वा सिꣳहो वा वृको वा वराहो वा कीटो वा पतङ्गो वा दꣳशो वा मशको यद्यद्भवन्ति तदाभवन्ति ॥ ३ ॥
वे इस लोकमें व्याघ्र, सिंह, भेड़िया, शूकर, कीट, पतङ्ग, डाँस अथवा मच्छर जो-जो भी [ सुषुप्ति आदिसे पूर्व ] होते हैं वे ही पुनः हो जाते हैं ॥ ३ ॥
| त इह लोके यत्कर्मनिमित्तां यां यां जातिं प्रतिपन्ना आसुर्व्याघ्रादीनां व्याघ्रोऽहं सिंहोऽहमित्येवं ते तत्कर्मज्ञानवासनाङ्किताः सन्तः सत्प्रविष्टा अपि तद्भावेनैव पुनराभवन्ति पुनः सत आगत्य व्याघ्रो वा सिंहो वा वृको वा वराहो वा कीटो वा पतङ्गो वा दंशो वा मशको वा | वे इस लोकमें जिस-जिस कर्मके कारण व्याघ्रादिमेंसे जिस-जिस जातिको 'मैं व्याघ्र हूँ, मैं सिंह हूँ' इस प्रकारके अभिनिवेशसे प्राप्त हुए थे उस कर्म और ज्ञानकी वासनासे अङ्कित हुए वे सत्में प्रविष्ट होनेपर भी उसी भावसे फिर उत्पन्न हो जाते हैं; अर्थात् सत्से पुनः लौटकर व्याघ्र, सिंह, वृक, वराह, कीट, पतंग, डाँस अथवा मच्छर जो कुछ वे पहले इस लोकमें |
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६६६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ६६६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| यद्यत्पूर्वमिह लोके भवन्ति बभू- | ये वही फिर लौटकर हो जाते हैं। |
|---|---|
| वुरित्यर्थः, तदेव पुनरागत्य | तात्पर्य यह है कि सहस्रों कोटि |
| भवन्ति युगसहस्रकोट्यन्तरि- | युगोंका अन्तर पड़ जानेपर भी |
| तापि संसारिणो जन्तोर्या पुरा | संसारी जीवोंकी जो पूर्वभावित |
| भाविता वासना सा न नश्य- | वासना होती है वह नष्ट नहीं |
| तीत्यर्थः । “यथाप्रज्ञं हि स- | होती । “जन्म पूर्व वासनाके अनुसार |
| म्मवाः” इति श्रुत्यन्तरात् ॥३॥ | ही होते हैं” ऐसी एक दूसरी श्रुतिसे भी यही सिद्ध होता है ॥३॥ |
| बाः प्रजा यस्मिन्प्रविश्य | जिसमें प्रवेश करके वह प्रजा |
|---|---|
| पुनराविर्भवन्ति ये त्वितोऽन्ये | पुनः आविर्भूत होती है, तथा उनसे |
| सत्यत्यात्माभिसन्धा यमणुभावं | अन्य जो सद्रूप सत्यात्मामें अभि- |
| सदात्मानं प्रविश्य नावर्तन्ते | निवेश रखनेवाले हैं वे जिस अणु- |
| भाव अर्थात् सत्यात्मामें प्रवेश करके फिर नहीं लौटते— |
स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदꣳसर्वं तत्सत्यꣳस आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवा-न्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ४ ॥
वह जो यह अणिमा है एतद्रूप ही यह सब है । वह सत्य है, वह आत्मा है और हे श्वेतकेतो ! वही तू है । [ आरुणि के इस प्रकार कहनेपर श्वेतकेतु बोला— ] 'भगवन् ! मुझे फिर समझाइये ।' [ तब आरुणिने ] 'अच्छा, सोम्य !' ऐसा कहा ॥ ४ ॥
| स य एषोऽणिमेत्यादि व्या- | 'स य एषोऽणिमा' इत्यादि मन्त्रकी व्याख्या पहले की जा चुकी |
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| ख्यातम् । तथा लोके स्वकीये | है । [ श्वेतकेतु बोला— ] जिस प्रकार लोकमें अपने घरमें सोया |
| गृहे सुप्त उत्थाय ग्रामान्तरं गतो | हुआ पुरुष उठकर ग्रामान्तरमें |
खण्ड ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६६७
| जानाति स्वगृहादागतोऽस्मी- | जानेपर यह जानता है कि मैं अपने | | त्येवं सत आगतोऽस्मीति च | घरसे आया हूँ, इसी प्रकार जीवोंको | | जन्तूनां कस्माद्विज्ञानं न भव- | ऐसा ज्ञान क्यों नहीं होता कि मैं | | तीति भूय एव मा भगवान्वि- | सत्के पाससे आया हूँ, अतः हे | | ज्ञापयत्वित्युक्तस्तथा सोम्येति | भगवन् ! मुझे फिर समझाइये । | | होवाच पिता ॥ ४ ॥ | इस प्रकार कहे जानेपर पिताने कहा—'सोम्य ! अच्छा' ॥४॥ |
<br>इतिच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठाध्याये नवमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ९ ॥
दशम खण्ड
नदीके दृष्टान्तद्वारा उपदेश
| शृणु तत्र दृष्टान्तं यथा— | इस विषयमें दृष्टान्त श्रवण कर।<br>जिस प्रकार— |
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इमाः सोम्य नद्यः पुरस्तात्प्राच्यः स्यन्दन्ते पश्चात्प्रतीच्यस्ताः समुद्रात्समुद्रमेवापियन्ति स समुद्र एव भवति ता यथा तत्र न विदुरियमहमस्मियमहमस्मीति ॥ १ ॥
हे सोम्य ! ये नदियाँ पूर्ववाहिनी होकर पूर्वकी ओर बहती हैं तथा पश्चिमवाहिनी होकर पश्चिमकी ओर । वे समुद्रसे निकलकर फिर समुद्रमें ही मिल जाती हैं और वह समुद्र ही हो जाता है । वे सब जिस प्रकार वहाँ ( समुद्रमें ) यह नहीं जानतीं कि ‘यह मैं हूँ, यह मैं हूँ’ ॥ १ ॥
| सोम्येमा नद्यो गङ्गाद्याः पुरस्तात्पूर्वां दिशं प्रति प्राच्यः प्रागञ्चनाः स्यन्दन्ते स्रवन्ति । पश्चात्प्रतीचीं दिशं प्रति सिन्ध्वाद्याः प्रतीचीमञ्चन्ति गच्छन्तीति प्रतीच्यस्ताः समुद्रादम्भोनिधेर्जलधरैराक्षिप्ताः पुनर्वृष्टिरूपेण पतिता गङ्गादिनदीरूपिण्यः पुनः समुद्रमम्भोनिधिमेवापियन्ति स समुद्र एव भवति । ता नद्यो यथा तत्र समुद्रे समुद्रात्मनैकतां | हे सोम्य ! ये गङ्गा आदि नदियाँ प्राच्य पूर्ववाहिनी होकर पुरस्तात् पूर्व दिशाकी ही ओर बहती हैं तथा सिन्धु आदि, जो पश्चिमको ओर जाती हैं अतः प्रतीच्य (पश्चिमवाहिनी) हैं, पश्चिम दिशाके प्रति बहती हैं । वे समुद्र—जलनिधिसे मेघोंद्वारा आकृष्ट होकर वृष्टिरूपसे बरसकर गङ्गादिरूपमें फिर समुद्रमें ही मिल जाती हैं और वह समुद्र ही हो जाता है । जिस प्रकार समुद्रमें समुद्ररूपसे एकताको प्राप्त हुई वे |
खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ ६६९
| गता न विदुर्न जानन्तीयं गङ्गाहमस्मियं यमुनाहमस्मीति च ॥ १ ॥ | नदियाँ यह नहीं जानतीं कि 'यह मैं गङ्गा हूँ; यह मैं यमुना हूँ' इत्यादि ॥ १ ॥ |
एवमेव खलु सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सत आगम्य न विदुः सत आगच्छामह इति त इह व्याघ्रो वा सिꣳहो वा वराहो वा कीटो वा पतङ्गो वा दꣳशो वा मशको वा यद्यद्भवन्ति तदाभवन्ति ॥ २ ॥ स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदꣳसर्वं तत्सत्यꣳस आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥
ठीक इसी प्रकार हे सोम्य ! ये सम्पूर्ण प्रजाएँ सत्से आनेपर यह नहीं जानतीं कि हम सत्के पाससे आयी हैं। इस लोकमें वे व्याघ्र, सिंह, शूकर, कीट, पतङ्ग, डाँस अथवा मच्छर जो-जो भी होते हैं वे हो फिर हो जाते हैं ॥ २ ॥ वह जो यह अणिमा है, एतद्रूप ही यह सब है। वह सत्य है, वह आत्मा है और हे श्वेतकेतो ! वही तू है। [आरुणिके इस प्रकार कहनेपर श्वेतकेतु बोला—] 'भगवन् ! मुझे फिर समझाइये।' [तब आरुणिने] 'अच्छा, सोम्य !' ऐसा कहा ॥ ३ ॥
| एवमेव खलु सोम्येमाः सर्वाः प्रजा यस्मात्सति सम्पद्य न विदु- स्तस्मात्सत्त आगम्य न विदुः सत | ठीक इसी प्रकार हे सोम्य ! ये सम्पूर्ण प्रजाएँ क्योंकि सत्में लीन होकर [अपना पार्थक्यज्ञान नहीं रहता, इसलिये] उस सत्से |
३७० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ३७० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| आगच्छामह आगता इति वा । त इह व्याघ्र इत्यादि समानमन्यत् । दृष्टं लोके जले वीचितरङ्गफेनबुद्बुदादय उत्थिताः पुनस्तद्भावं गता विनष्टा इति । जीवास्तु तत्कारणभावं प्रत्यहं गच्छन्तोऽपि सुषुप्ते मरणप्रलययोश्च न विनश्यन्तीत्येतद् । भूय एव मा भगवान्विज्ञापयतु दृष्टान्तेन । तथा सोम्येति होवाच पिता ॥ २-३ ॥ | लौटनेपर यह नहीं जानतीं कि हम सत्के पाससे आयी हैं । 'ते इह व्याघ्रः' इत्यादि शेष वाक्यका अर्थ पूर्ववत् है । [श्वेतकेतु बोला—] लोकमें यह देखा गया है कि जलमें उठे हुए भँवर, तरंग, फेन एवं बुद्बुद आदि पुनः जलरूप हो जानेपर नष्ट हो जाते हैं; किंतु जीव तो प्रतिदिन सुषुप्तावस्थामें तथा मरण और प्रलयके समय अपने कारणभावको प्राप्त होकर भी नष्ट नहीं होते—सो हे भगवन् ! इस बातको मुझे दृष्टान्तद्वारा फिर समझाइये । तब पिताने कहा—'सोम्य ! अच्छा' ॥ २-३ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठाध्याये दशमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १० ॥
एकादश खण्ड
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वृक्षके दृष्टान्तद्वारा उपदेश
| शृणु दृष्टान्तमस्य— | [ इस विषयमें ] एक दृष्टान्त सुनो— |
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अस्य सोम्य महतो वृक्षस्य यो मूलेऽभ्याहन्या-
जीवन्स्रवेद्यो मध्येऽभ्याहन्याजीवन्स्रवेद्याऽग्रेऽभ्याह-
न्याजीवन्स्रवेत्स एष जीवेनात्मनानुप्रभूतः पेपीयमानो
मोदमानस्तिष्ठति ॥ १ ॥
हे सोम्य ! यदि कोई इस महान् वृक्षके मूलमें आघात करे तो यह जीवित रहते हुए ही केवल रसस्राव करेगा, यदि मध्यमें आघात करे तो भी यह जीवित रहते हुए केवल रसस्राव करेगा और यदि इसके अग्रभागमें आघात करे तो भी यह जीवित रहते हुए ही रसस्राव करेगा । यह वृक्ष जीव—आत्मासे ओतप्रोत है और जलपान करता हुआ आनन्दपूर्वक स्थित है ॥ १ ॥
| संस्कृत व्याख्या | हिन्दी अनुवाद |
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| हे सोम्य महतोऽनेकशाखा-दियुक्तस्य वृक्षस्यास्येत्यग्रतः स्थितं वृक्षं दर्शयन्नाह—यदि यः कश्चिदस्य मूलेऽभ्याहन्यात्परश्वादिना सकृद्घातमात्रेण न शुष्यतीति जीवन्नेव भवति तदा तस्य रसः स्रवेत् । तथा यो | हे सोम्य ! [इस प्रकार सम्बोधित करके] सामने स्थित वृक्षको दिखलाते हुए कहते हैं—इस महान्—अनेक शाखादिसे युक्त वृक्षके मूलमें यदि कोई कुल्हाड़ी आदिसे आघात करे तो एक ही आघातसे यह सूख नहीं जाता, बल्कि जीवित ही रहता है; उस समय केवल इसका कुछ रस निकल जाता है । तथा यदि कोई मध्यमें आघात करे तो भी यह |
६७२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ६७२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| मध्येऽभ्याहन्याज्जीवन्स्रवेत्तथा योऽग्रेऽभ्याहन्याज्जीवन्स्रवेतस एष वृक्ष इदानीं जीवेनात्मनानुप्रभूतोऽनुव्याप्तः पेपीयमानोऽत्यर्थं पिबन्नुदकं भौमांश्च रसान्मूलैर्गृह्णन्मोदमानो हर्षं प्राप्नुवंस्तिष्ठति ॥ १ ॥ | जीवित रहते हुए ही रसस्राव कर देता है और यदि अग्रभागमें आघात करे तो भी यह जीवित रहते हुए ही रसस्राव करता है। इस समय यह वृक्ष जीव-आत्मासे अनुप्रभूत—पूर्णतः व्याप्त है और अत्यन्त जलपान करता हुआ तथा अपनी जड़द्वारा पृथिवीके रसोंको ग्रहण करता हुआ—मोदमान होता—हर्ष पाता हुआ स्थित है ॥ १ ॥ |
अस्य यदेकाँ शाखां जीवो जहात्यथ सा शुष्यति द्वितीयां जहात्यथ सा शुष्यति तृतीयां जहात्यथ सा शुष्यति सर्वं जहाति सर्वः शुष्यति ॥ २ ॥
यदि इस वृक्षकी एक शाखाको जीव छोड़ देता है तो वह सूख जाती है; यदि दूसरीको छोड़ देता है तो वह सूख जाती है और तीसरीको छोड़ देता है तो वह भी सूख जाती है, इसी प्रकार यदि सारे वृक्षको छोड़ देता है तो सारा वृक्ष सूख जाता है ॥ २ ॥
| तस्यास्य यदेकां शाखां रोगग्रस्तामाहतां वा जीवो जहात्युपसंहरति शाखायां विप्रसृतमात्मांशम्, अथ सा शुष्यति। वाङ्मनःप्राणकरणग्रामानुप्रविष्टो | उस इस वृक्षकी यदि एक रोगग्रस्त अथवा आहत शाखाको जीव छोड़ देता है—उस शाखामें व्याप्त जीवांश उपसंहृत हो जाता है तो वह सूख जाती है; क्योंकि वाणी, मन, प्राण तथा इन्द्रियग्राममें जीव अनुप्रविष्ट है इसलिये |
खण्ड ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६७३
| शाङ्करभाष्य | भाुष्यार्थ |
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| हि जीव इति तदुपसंहार उपसंह्रियते । जीवेन च प्राणयुक्तेनाशितं पीतं च रसतां गतं जीववच्छरीरं वृक्षं च वर्धयद्रसरूपेण जीवस्य सद्भावे लिङ्गं भवति । अशितपीताभ्यां हि देहे जीवस्तिष्ठति ते चाशितपीते जीवकर्मानुसारिणी इति । तस्यैकाङ्गवैकल्यनिमित्तं कर्म यदोपस्थितं भवति तदा जीव एकां शाखां जहाति शाखाया आत्मानमुपसंहरति । अथ तदा सा शाखा शुष्यति । | उनका उपसंहार होनेपर वह भी उपसंहृत हो जाता है । प्राणयुक्त जीवके द्वारा भी भक्षण तथा पान किया हुआ अन्न-जल रसभावको प्राप्त होता है; वह रसरूपसे जीवयुक्त शरीर तथा सजीव वृक्षकी वृद्धि करता हुआ जीवके सद्भावमें लिङ्ग है । खाये-पीये हुए अन्न-जलसे ही जीव देहमें रहता है । वे खानपान जीवके कर्मानुसार होते हैं । जिस समय उसके एक अङ्गकी विकलताका निमित्तभूत कर्म उपस्थित होता है उस समय जीव एक शाखाको छोड़ देता है—उस एक शाखासे अपना उपसंहार कर लेता है । इसके पश्चात् तब वह शाखा सूख जाती है । |
| जीवस्थितिनिमित्तो रसो जीवकर्माक्षिप्तो जीवोपसंहारे न तिष्ठति । रसापगमे च शाखा शोषमुपैति तथा सर्वं वृक्षमेव यदायं जहाति तदा सर्वोऽपि वृक्षः शुष्यति । वृक्षस्य रसस्रवणशोषणादिलिङ्गाज्जीववत्त्वं दृष्ट्वा- | जीवके कर्मानुसार प्राप्त हुआ तथा जीवकी स्थितिके कारण रहनेवाला रस जीवका उपसंहार होनेपर नहीं रहता; और रसके निकल जानेपर शाखा सूख जाती है । इसी प्रकार जब यह सारे वृक्षको छोड़ देता है तो सारा ही वृक्ष सूख जाता है । वृक्षके रसस्राव एवं शोषण आदि लिङ्गसे उसकी सजीवता सिद्ध होती है तथा [ 'स एष वृक्षः जीवेन आत्मना अनु- |
६७४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ६७४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| न्तश्रुतेश्च चेतनावन्तः स्थावरा इति बौद्धकाणादमतमचेतनाः स्थावरा इत्येतदसारमिति दर्शितं भवति ॥ २ ॥ | प्रभूतः'] इस दृष्टान्तश्रुतिसे यह निश्चित होता है कि स्थावर चेतनायुक्त होते हैं और इससे यह भी प्रदर्शित हो जाता है कि 'स्थावर चेतनाशून्य होते हैं' ऐसा बौद्ध और काणादमत सारहीन है ॥ २ ॥ |
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| यथास्मिन्वृक्षदृष्टान्ते दर्शितं जीवेन युक्तो वृक्षोऽशुष्को रसपानादियुक्तो जीवतीत्युच्यते तदपेतश्च म्रियत इत्युच्यते — | जिस प्रकार कि इस वृक्षके दृष्टान्तमें यह दिखलाया गया है कि जीवसे युक्त वृक्ष अशुष्क और रसपानादिसे युक्त रहता है; इसलिये 'वह जीवित है'—ऐसा कहा जाता है तथा उस (जीव) से रहित हो जानेपर 'मर जाता है' ऐसा कहा जाता है— |
एवमेव खलु सोम्य विद्धीति होवाच जीवापेतं वाव किलेदं म्रियते न जीवो म्रियत इति स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदꣳसर्वं तत्सत्यꣳस आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥
'हे सोम्य ! ठीक इसी प्रकार तू जान कि जीवसे रहित होनेपर यह शरीर मर जाता है, जीव नहीं मरता'—ऐसा [ आरुणिने ] कहा, 'वह जो यह अणिमा है एतद्रूप ही यह सब है । वह सत्य है, वह आत्मा है और हे श्वेतकेतो ! वही तू है ।' [ आरुणिके इस प्रकार कहनेपर श्वेतकेतु बोला— ] 'भगवन् ! मुझे फिर समझाइये ।' [ तब आरुणिने ] 'अच्छा, सोम्य !' ऐसा कहा ॥ ३ ॥
खण्ड ११] शाङ्करभाष्यार्थ ६७५
| एवमेव खलु सोम्य विद्धीति होवाच। जीवापेतं जीववियुक्तं वाव किलेदं शरीरं म्रियते न जीवो म्रियत इति। कार्यशेषे च सुप्तोत्थितस्य ममेदं कार्यशेषमपरिसमाप्तमिति स्मृत्वा समापनदर्शनात्। जातमात्राणां च जन्तूनां स्तन्याभिलाषभयादिदर्शनाच्चातीतजन्मान्तरानुभूतस्तनपानदुःखानुभवस्मृतिर्गम्यते अग्निहोत्रादीनां च वैदिकानां कर्मणामर्थवत्त्वान्न जीवो म्रियत इति। स य एषोऽणिमेत्यादि समानम्। <br><br> कथं पुनरिदमत्यन्तस्थूलं पृथिव्यादि नामरूपवज्जगदत्यन्तसूक्ष्मात्सद्रूपान्नामरूपरहितात् सतो जायत इत्येतद्दृष्टान्तेन भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति। तथा सोम्येति होवाच पिता ॥ ३ ॥ | 'हे सोम्य ! ठीक इसी प्रकार तू जान कि जीवापेत—जीवसे वियुक्त हुआ यह शरीर ही मरता है जीव नहीं मरता' ऐसा [आरुणिने] कहा, क्योंकि कार्य शेष रहनेपर ही सोकर उठे हुए पुरुषको 'मेरा यह काम शेष रह गया था' ऐसा स्मरण करके उसे समाप्त करते देखा जाता है। तथा तत्काल उत्पन्न हुए जीवोंको स्तनपानकी अभिलाषा और भय आदि होते देखे जानेसे पूर्वजन्मोंमें अनुभव किये हुए स्तनपान तथा दुःखानुभवकी स्मृतिका ज्ञान होता है। इसके सिवा अग्निहोत्र आदि वैदिक कर्मोंकी सार्थकता होनेके कारण भी जीव नहीं मरता।' 'स य एषोऽणिमा' इत्यादि वाक्यका अर्थ पूर्ववत् है। <br><br> 'किंतु यह अत्यन्त स्थूल 'पृथिवी' आदि नाम और रूपोंवाला संसार अत्यन्त सूक्ष्म, सद्रूप, नामरूपरहित सत्से किस प्रकार उत्पन्न होता है ? इस बातको हे भगवन् ! मुझे दृष्टान्तद्वारा फिर समझाइये'—ऐसा श्वेतकेतुने कहा । तब पिताने कहा—'सोम्य ! अच्छा' ॥ ३ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठाध्याये एकादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ११ ॥
छा० उ० २२—