भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 664, कुल 978 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 664
६६०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६

| तदप्यौष्ण्यलिङ्गं तेज उपसंह्रियते तदा तत्तेजः परस्यां देवतायां प्रक्षाम्यति ।<br><br>तदैवं क्रमेणोपसंहृते स्वमूलं प्राप्ते च मनसि तत्स्थो जीवोऽपि सुषुप्तकालवन्निमित्तोपसंहारादुपसंह्रियमाणः सन्सत्याभिसन्धिपूर्वकं चेदुपसंह्रियते सदेव सम्पद्यते न पुनर्देहान्तराय सुषुप्तादिवोत्तिष्ठति । यथा लोके सभये देशे वर्तमानः कथञ्चिदिवाभयं देशं प्राप्तस्तद्वत् । इतरस्त्वनात्मज्ञस्तस्मादेव मुलात्सुषुप्तादिवोत्थाय मृत्वा पुनर्देहजालमाविशति यस्मान्मूलादुत्थाय देहमाविशति जीवः ॥ ६ ॥ | उष्णता ही जिसका लिङ्ग है वह तेज भी उपसंहृत हो जाता है तब वह तेज परदेवतामें प्रशान्त होता है ।<br><br>तब इस प्रकार क्रमशः उपसंहृत होकर मनके अपने मूलभूत पर देवताको प्राप्त होनेपर उसमें स्थिर जीव भी सुषुप्तकालके समान अपने निमित्त [ मन ] का उपसंहार हो जानेके कारण उपसंहृत होता हुआ यदि सत्यानुसंधानपूर्वक उपसंहृत होता है तो सत्‌को ही प्राप्त हो जाता है; सोनेसे जगे हुए पुरुषके समान फिर देहान्तरको प्राप्त नहीं होता; जिस प्रकार कि लोकमें भयपूर्ण देशमें रहनेवाला कोई प्राणी किसी प्रकार अभय देशमें पहुँच जानेपर [ फिर उससे नहीं लौटता ] उसी प्रकार [यह भी नहीं लौटता] । किंतु अन्य जो अनात्मज्ञ है वह सोनेसे जगे हुए पुरुषके समान मरनेके अनन्तर उस अपने मूलसे, जिस मूलसे कि जीव उठकर देहमें प्रवेश करता है, उठकर फिर देहपाशमें प्रवेश करता है ॥ ६ ॥ |


— : ० : —