भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 665, कुल 978 में से

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पृष्ठ 665

खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ६६१


स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदꣳसर्वं तत्सत्यꣳस आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवा-न्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ७ ॥

वह जो यह अणिमा है एतद्रूप ही यह सब है। वह सत्य है, वह आत्मा है और हे श्वेतकेतो ! वही तू है [ आरुणिके इस प्रकार कहने-पर श्वेतकेतु बोला— ] 'भगवन् ! मुझे फिर समझाइये।' [ तब आरुणिने ] 'अच्छा, सोम्य !' ऐसा कहा ॥ ७ ॥


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
स यः सदाख्य एष उक्तोऽणिमाणुभावो जगतो मूलमैतदात्म्यमेतत्सदात्मा यस्य सर्वस्य तदेतदात्म तस्य भाव ऐतदात्म्यम् । एतेन सदाख्येनात्मनात्मवत्सर्वमिदं जगत् । नान्योऽस्त्यस्यात्मा संसारी, “नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ नान्यदतोऽस्ति श्रोतृ” (बृ०उ० ३ । ८ । ११) इत्यादिश्रुत्यन्तरात् ।<br><br>येन चात्मनात्मवत्सर्वमिदं जगत्तदेव सदाख्यं कारणं सत्यं परमार्थसत् । अतः स एवात्मा जगतः प्रत्यक्स्वरूपं सतत्त्वं याथात्म्यम् । आत्मशब्दस्य निरुपपदस्य प्रत्यगा-यह जो सत्संज्ञक अणिमा—अणुता जगत्का मूल बतलायी गयी है 'ऐतदात्म्य' यह सब है—जिस सबकी एतत् (यह) सत् आत्मा है उसे 'एतदात्म' कहते हैं उसका भाव 'ऐतदात्म्य' है; अर्थात् इस सत्संज्ञक आत्मासे यह सारा जगत् आत्मवान् है। इसका आत्मा कोई और संसारी नहीं है; जैसा कि “इससे अन्य कोई द्रष्टा नहीं है, इससे अन्य कोई श्रोता नहीं है” इस अन्य श्रुतिसे प्रमाणित होता है।<br><br>जिस आत्मासे यह सारा जगत् आत्मवान् है वही सत्संज्ञक कारण सत्य अर्थात् परमार्थ सत् है। अतः वह आत्मा ही जगत्का प्रत्यक् स्वरूप—सतत्त्व अर्थात् याथात्म्य है, क्योंकि जिस प्रकार गो आदि शब्द बैल, गाय आदि अर्थमें रूढ़
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