छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 674, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३७० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| आगच्छामह आगता इति वा । त इह व्याघ्र इत्यादि समानमन्यत् । दृष्टं लोके जले वीचितरङ्गफेनबुद्बुदादय उत्थिताः पुनस्तद्भावं गता विनष्टा इति । जीवास्तु तत्कारणभावं प्रत्यहं गच्छन्तोऽपि सुषुप्ते मरणप्रलययोश्च न विनश्यन्तीत्येतद् । भूय एव मा भगवान्विज्ञापयतु दृष्टान्तेन । तथा सोम्येति होवाच पिता ॥ २-३ ॥ | लौटनेपर यह नहीं जानतीं कि हम सत्के पाससे आयी हैं । 'ते इह व्याघ्रः' इत्यादि शेष वाक्यका अर्थ पूर्ववत् है । [श्वेतकेतु बोला—] लोकमें यह देखा गया है कि जलमें उठे हुए भँवर, तरंग, फेन एवं बुद्बुद आदि पुनः जलरूप हो जानेपर नष्ट हो जाते हैं; किंतु जीव तो प्रतिदिन सुषुप्तावस्थामें तथा मरण और प्रलयके समय अपने कारणभावको प्राप्त होकर भी नष्ट नहीं होते—सो हे भगवन् ! इस बातको मुझे दृष्टान्तद्वारा फिर समझाइये । तब पिताने कहा—'सोम्य ! अच्छा' ॥ २-३ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठाध्याये दशमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १० ॥