भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 660

६५६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ६


तस्य क्व मूलँस्यादन्यत्राद्भ्योऽद्भिः सोम्य शुङ्गेन तेजो मूलमन्विच्छ तेजसा सोम्य शुङ्गेन सन्मूलमन्विच्छ सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठा यथा नु खलु सोम्येमास्तिस्रो देवताः पुरुषं प्राप्य त्रिवृत्त्रिवृदेकैका भवति तदुक्तं पुरस्तादेव भवत्यस्य सोम्य पुरुषस्य प्रयतो वाङ्मनसि सम्पद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायाम् ॥ ६ ॥

हे सोम्य ! उस (जलके परिणामभूत शरीर) का जलके सिवा और कहाँ मूल हो सकता है ? हे प्रियदर्शन ! जलरूप अङ्कुरके द्वारा तू तेजोरूप मूलकी खोज कर और हे सोम्य ! तेजोरूप अङ्कुरके द्वारा सदरूप मूलकी शोध कर । हे सोम्य ! यह सम्पूर्ण प्रजा सन्मूलक तथा सदरूप आयतन और सदरूप प्रतिष्ठा (लयस्थान) वाली है । हे सोम्य ! जिस प्रकार ये तीनों देवता पुरुषको प्राप्त होकर उनमेंसे प्रत्येक त्रिवृत्-त्रिवृत् हो जाता है वह मैंने पहले ही कह दिया । हे सोम्य मरणको प्राप्त होते हुए इस पुरुषकी वाक् मनमें लीन हो जाती है तथा मन प्राणमें, प्राण तेजमें और तेज परदेवतामें लीन हो जाता है ॥ ६ ॥


| सामर्थ्यात्तेजसोऽप्येतदेव शरीराख्यं शुङ्गम् । अतोऽप्शुङ्गेन देहेनापो मूलं गम्यते । अद्भिः शुङ्गेन तेजो मूलं गम्यते । तेजसा शुङ्गेन सन्मूलं गम्यते पूर्ववत् । एवं हि तेजोऽबन्नमयस्य | त्रिवृत्करणके सामर्थ्यसे यह ज्ञात होता है कि तेजका भी यही शरीर-संज्ञक शुङ्ग (कार्य) है ? अतः जलके कार्यभूत देहद्वारा उसके मूल जलका ज्ञान होता है, जलरूप कार्यसे उसके मूल तेजका पता लगता है तथा तेजोरूप कार्यसे उसके मूल सतका ज्ञान होता है—ऐसा पूर्ववत समझना चाहिये । इस प्रकार तेज, जल और अन्नके |